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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

सप्तम अध्याय

रामकथा का प्रारम्भिक विकास

बुल्के लिखित रामकथा में १२९ वें अनु० में कहा गया है "वैदिक साहित्य में आख्यान, इतिहास तथा पुराण मिलते हैं। ये ब्राह्मणों के अर्थवाद के एक आवश्यक अङ्ग समझे जाते थे। प्राचीन काल से धार्मिक संस्कारों तथा यज्ञों के अवसर पर ऐतिहासिक तथा पौराणिक इन्हें सुनाते थे। (शत० ब्रा० १३।४।३ ) तथा अर्वाचीन वैदिक साहित्य (शा० गृ० सू० १।२२।११ ) में ये पाँचवें वेद कहे जाते हैं— 'अथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमम् ।" (छा० उ० ७।१।२ ) आख्यानों के गद्य के साथ जो पद्य दिया जाता था, उसे गाथा कहा गया है। प्रारम्भ से ही दानस्तुति- स्वरूप 'नाराशंसी' गाथाओं का उल्लेख मिलता है (ऋ० सं० १०।८५।६ ) और इनके विषय में कहा जाता है कि ये सब झूठी हैं 'गाथानृतं नाराशंसी' (का० सं० १४।५) । इस नाराशंसी गाथासाहित्य के रचयिता तथा रक्षक राजदरबारों में रहनेवाले सूत थे। इनके अतिरिक्त कुशीलव जनसाधारण में इन गीतों का प्रचार करते थे।"¹

वेद और वेदान्त के रहस्य के अनभिज्ञ प्राञ्चात्यों की उक्त कल्पना अशुद्ध एवं निराधार है। वैदिक साहित्य के आख्यान तथा इतिहासपुराण अपौरुषेय वेदरूप ही हैं। ऋक्, साम, यजुः तथा अथर्व के मन्त्रों, ब्राह्मणों, आरण्यकों एवं उपनिषदों में आनेवाले आख्यान या पुराण-इतिहास सब अनादि अपौरुषेय ही हैं। वे ब्राह्मणों के नहीं किन्तु विधियों के अर्थवादरूप होते हैं; विधि-अर्थवाद स्वयं भी ब्राह्मण के अन्तर्गत हैं; इन वैदिक आख्यानों को वैदिक ही सुनाते थे, पौराणिक या ऐतिहासिक नहीं। मन्त्रों तथा ब्राह्मणों में आनेवाले आख्यान तथा इतिहास-पुराण तो वेद ही हैं, पञ्चम वेद नहीं। पञ्चम वेद तो पौरुषेय महाभारत, रामायण, इतिहास तथा पद्मपुराण, नारदीयपुराण आदि आर्ष इतिहास-पुराण ही हैं।

आख्यानों के गद्य के साथ जो पद्य दिया जाता है; उसे गाथा बौद्धों के यहाँ ही कहा जाता है। वेदों तथा पुराणों में तो पद्यों के साथ भी पद्यरूप गाथाएँ मिलती हैं। नाराशंसी गाथा वेदरूप ही हैं। मनुष्यों के स्तुतिवाले मन्त्र ही नाराशंसी कहे जाते हैं। मनुष्यों तथा उनके दान आदि के स्तुतिरूप मन्त्र नाराशंसी होते हैं। नरों की आशंसा (प्रशंसा) ही नाराशंसी है। ये सब सुखावबोधार्थ कल्पित आख्यायिका रूप होते हैं। इसी लिए स्वार्थ में अनृत कहे जाते हैं अर्थात् वस्तुतः किसी नर के वर्णन में उनका तात्पर्य नहीं होता है। सम्पूर्ण वेदों का धर्म या ब्रह्म ही मुख्य अर्थ है। परमार्थ वस्तु ब्रह्म ही सब वेदों का अर्थ है— "सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ।" "वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः ॥" इत्यादि श्रुति और स्मृति इसमें प्रमाण हैं जब कि बुल्के के कथन में कुछ भी प्रमाण नहीं है। गाथा नाराशंसी भी मन्त्र, ब्राह्मणादिरूप होते हैं। वे भी अपौरुषेय होते हैं। उनका रचयिता कोई नहीं होता। राजदरबारों के सूत आदि को तो इनके पठन का भी अधिकार नहीं है। मुख्य पुराणप्रवक्ता उग्रश्रवा सूत तथा उनके पुत्र सौति भी आर्ष इतिहास-पुराण के ही प्रवचन में अधिकृत थे। इसी लिए श्रीमद्भागवत में कहा है—


१. एम्. विंटरनित्सः हि० इं० लि० भाग १, पृष्ठ ३१४।

२२४ रामायणमीमांसा सप्तम “स्नातमन्यत्र छान्दसात् ।” अर्थात् सूत छन्दोविषय से अन्यत्र पुराणेतिहास में ही निष्णात थे, छन्द (वेद) में नहीं। यद्यपि वे मुख्य सूत जाति नहीं थे, किन्तु राजा पृथु के यज्ञ में ऐन्द्रबार्हस्पत्य हवि के विपर्यास से अग्निकुण्ड से उद्भूत हुए थे, अतः ऋषियों ने उन्हें इतिहास-पुराण का प्रवक्ता बनाया था। इसी लिए कौटिल्य ने दो प्रकार के सूतों का निर्देश किया है। कुशीलव भी लौकिक गाथाओं का ही प्रचार कर सकते थे, वैदिक गाथाओं का नहीं; क्योंकि वेदों में त्रैवर्णिक संस्कृत द्विज जाति का ही अधिकार है, अन्य का नहीं। यह पूर्वोत्तरमीमांसा अपशूद्राधिकरण में प्रसिद्ध है। “रैभ्यासीदनुदेयी नाराशंसी न्योचनी । सूर्याया भद्रमिद्वासो गाथयैति परिष्कृतम् ॥” (ऋ० सं० १०।८५।६) “सूर्या सावित्री ब्रूते रैभी रैभ्यः काश्चनर्चः ।” (रैभीः शंसति ऐ० ब्रा० ६।३२) रैभी अनुदेयी दीयमानवधूविनोदनायानुदीयमाना वयस्या आसीत् । तथा नाराशंसी मनुष्याणां स्तुतिः । न्योचनी वधूशुश्रूषार्थं दीयमाना दासी । सूर्याया मम भद्रं वासः विचित्रं दुकूलादिकं गाथया परिष्कृतम् अलङ्कृतम् । एति । उक्त मन्त्र में स्तुति की दृष्टि से कहा गया है कि सूर्या सावित्री के विवाह में रैभी संज्ञक ऋचाएँ सूर्या को वयस्या (सखी) के रूप में, नाराशंसी ऋचाएँ न्योचनी (दासी) के रूप में और गाथा उसके वस्त्र तथा अलङ्कार के रूप में दी गयी थीं। इससे स्पष्ट है कि यहाँ नाराशंसीया गाथा वेद-मन्त्र ही हैं। इनमें सूत आदि का अधिकार नहीं है। रामायण के 'कुशीलवौ' तो कुश और लव राम के पुत्र क्षत्रिय थे। वे 'कुशीलव' नृत्य-गीतोपजीवी जाति के नहीं थे। इसी लिए रामायण में 'कुशीलवः' या 'कुशीलवाः' जैसा प्रयोग कहीं नहीं मिलता; जो 'कुशीलवौ' प्रयोग मिलता है वह द्विवचनान्त ही है। अतः यह शब्द कुश और लव के अर्थ में ही प्रयुक्त हुआ है। गाथाएँ वैदिक, पौराणिक आदि अनेक प्रकार की होती हैं। लौकिक गाथाओं को सूत आदि भी गा सकते थे । अथ सायं धृतिषु हूयमानासु राजन्यो वीणागाथी दक्षिणत उत्तरमन्द्रामुदाघ्नंस्तिस्रः स्वयं संभृता गाथा गायतीत्ययुध्यतेत्यमुं संग्राममजयदिति तस्योक्तं ब्राह्मणम् ।” (श० ब्रा० १३।४।३।५) उक्त ब्राह्मण में कहा गया है कि वीणागाथी स्वयं रचित गाथा गाता है। इस राजन्य ने अमुक संग्राम जीता है। “अथाह वीणागाथिनो राजानं सङ्गायतेति ।” (शा० गृ० सू० १।२२।११) यजमान वीणागाथियों से कहता है सोमराजा की गान द्वारा स्तुति करो । “यस्यैवंविदेतद्धोता पारिप्लवमाख्यानमाचष्टे ।” (श० ब्रा० १३।४।३।१५) उक्त ब्राह्मण से प्रतीत होता है कि होता ही पारिप्लव आख्यान का वर्णन करता है। अश्वमेधादि यज्ञों में यज्ञ के विश्रामकाल में जो प्राचीन कथाएँ कही जाती हैं उन्हीं को पारिप्लव आख्यान कहा जाता है। सांग्रामिक रथ एवं अश्वों के अलङ्कारों की रक्षा का उत्तरदायित्व सूतों पर होना चाहिये । सूत और मागधों द्वारा गाने योग्य अन्य गाथाएँ होती हैं। सूतमागधाः शूराणां स्वर्गमस्वर्गं भीरूणां जातिसङ्घकुलकर्मवृत्तस्तवं च योधानां वर्णयेयुः । सूत और मागधों को चाहिये कि शूरों के लिए स्वर्ग और भीरुओं के लिए नरक प्राप्ति का गान एवं योद्धाओं के जाति, सङ्घ और कुल के कर्म तथा वृत्तान्त की स्तुति करें।

बृहदारण्यक-भाष्य में आद्य शङ्कराचार्य ने मन्त्रगत उर्वशी-पुरूरवा की कथा को ही इतिहास कहा है । "असद्वा इदमग्र आसीत्" इत्यादि ब्राह्मणों को पुराण, देवयजन-विद्या को ही विद्या, "प्रियमित्येतदुपासीत" इत्यादि ब्राह्मण को ही उपनिषद्, ब्राह्मण-प्रभव मन्त्रों को ही श्लोक, "आत्मैत्येवोपासीत" इत्यादि संग्रह वाक्यों को सूत्र, मन्त्र-विवरण को अनुव्याख्यान एवं अर्थवादों को व्याख्यान कहा है (बृ० उ० २।४।१०) । ऋग्वेद संहिता ( १०।८५।६ ) इतिहासपुराणम् ( ६।७।१२ ) गाथानृतं नाराशंसी ( का० सं० १४।५ ) गाथा अप्यत्र गायन्ति ( ह० पु० १।४१।४९ ) उपर्युक्त उद्धरणों के अनुसार गाथाएँ वैदिक तथा लौकिक भी होती हैं। विभिन्न विषयों में सिद्धान्तभूत प्रसिद्ध संग्राहक पद्य ही गाथा है । गाथासप्तशती प्राकृत भाषा का ग्रन्थ है। उसमें गाथाओं का ही उल्लेख है। “तवाभिगमनार्थं तु सर्वतो ब्राह्मणा गताः । वाक्यानि मम गाथाभिर्गायमाना दिशो दश ॥" (म० भा० ३।७६।२७) महाराज नल के द्वारा ऐसी आशङ्का अभिव्यक्त करने पर कि प्यार करनेवाले पत्नीव्रत पति को छोड़कर कोई पत्नी कभी दूसरे पति का वरण कर सकती है क्या, जैसा कि तुम करने जा रही हो ? दमयन्ती ने अपनी सफाई देते हुए नल से यह बात कही है कि महाराज, आपका पता लगाने के लिए ही चारों ओर ब्राह्मण यहाँ से भेजे गये हैं और उन लोगों ने मेरा अभिप्राय गाथारूप में गाते हुए सर्वत्र फैलाया है। "अत्राप्युदाहरन्तोमा गाथा देवैरुदाहृताः । मुनिरासीत्पुरा पुत्र बालधिर्नाम वीर्यवान् ।। लालप्यमानं तं दृष्ट्वा मुनयः परमार्तवत् । ऊचुर्वेदविदः सर्वे गाथां यां तां निबोध मे ।। न दिष्टमर्थमप्येतुमीशो मर्त्यः कथञ्चन । महिषेर्भेदयामास धनुषाक्षो महीधरान् ।।" (म० भा० ३।१३५।४५,५४,५५) दो मित्र थे रैभ्य और भरद्वाज । दोनों में बड़ा घनिष्ठ प्रेम था । रैभ्य के दो पुत्र थे तथा भरद्वाज को एक ही लड़का था यवक्रीत । रैभ्य दोनों पुत्रों सहित बहुत विद्वान् थे, इसलिये उनकी बहुत प्रशंसा थी । भरद्वाज केवलमात्र तपस्वी थे, अतः उनकी उतनी अधिक प्रशंसा ( प्रतिष्ठा ) नहीं थी । अपने पिता की ऐसी स्थिति देखकर यवक्रीत मन में जलने लगे और बिना पढ़े ही वेद-विद्या की प्राप्ति के लिए तप करने लगे । यवक्रीत का तप जब बहुत बढ़ा तब उनकी तपोवृद्धि से इन्द्र को सन्ताप हुआ। उन्होंने यवक्रीत के पास जाकर पूछा- "आप इतना कठोर तप किसलिये कर रहे हैं ?" यवक्रीत ने कहा, "बिना पढ़े ही वेदों की प्राप्ति और उनके रहस्य-ज्ञान के लिए तप कर रहा हूँ। मैं अपने तपोबल से सब कुछ जानना चाहता हूँ।" इन्द्र ने कहा, "ब्रह्मर्षे ! वेद-प्राप्ति के लिए आपका यह मार्ग ठीक नहीं है। इस मार्ग से आपके विनाश का खतरा है। आपको गुरुमुख से पढ़कर ही वेद प्राप्त करने चाहिए।" यह सुनकर भी यवक्रीत अपने निश्चय पर अडिग रहे। अन्त में इन्द्र ने वरदान दे दिया कि तुम्हें और तुम्हारे पिता भरद्वाज दोनों को ही बिना गुरुमुख से अध्ययन किये ही वेदज्ञान हो जायेगा। यवक्रीत ने वहाँ से अपने पिता के पास आकर यह समाचार सुनाया और कहा कि अब हम पिता और पुत्र दोनों के समान कोई विद्वान् न होगा । भरद्वाज ने उत्तर दिया कि पुत्र, तुमने ऐसा वरदान लेकर अच्छा नहीं किया, क्योकि ऐसा वेदज्ञान प्राप्त कर तुम अभिमानी हो जाओगे और विद्वानों का अपमान करोगे । फलतः तुम्हारा विनाश हो जायगा। देखो इस

२२६ रामायणमीमांसा सप्तम विषय में देवताओं द्वारा उदाहृत एक गाथा प्रसिद्ध है। प्राचीन काल में बालधि नामक बड़े तपस्वी हो चुके हैं। उनके लड़के हो होकर मर जाते थे। पुत्रशोक से घबराकर उन्होंने अत्यन्त दुष्कर तप किया। देवताओं की कृपा हुई। उन्होंने वरदान मांगा कि मेरा लड़का अमर्त्य (अमरणशील) हो। किन्तु देवताओं ने कहा कि मर्त्य अमरण- शील नहीं हो सकता। कुछ आयु का निमित्त स्वीकार करो। बालधि ने कहा कि ये पहाड़ कितने समय से ऐसे ही पड़े हुए हैं। जब यह नष्ट हो तब हमारे लड़के की आयु समाप्त हो। देवताओं ने इसे मान लिया। बालधि को लड़का हुआ। वह बहुत ही मेधावी और दूसरे का उत्कर्ष देखकर जलनेवाला था। बड़ा होने पर ऋषियों, महात्माओं सज्जनों और प्रतिष्ठितों का पद पद पर अपमान करने लगा। एक समय धनुषाक्ष नामक महाविद्वान् से उसकी मुठभेड़ हो गयी। अपनी प्रतिभा के बल पर उसने धनुषाक्ष को पराजित कर बहुत ही अपमानित किया। धनुषाक्ष ने उसे शाप दिया कि तुम भस्म हो जाओ। किन्तु उसका बाल भी बाँका नहीं हुआ। फिर धनुषाक्ष ने भैंसों को पाला और भैंसों से पहाड़ तुड़वा दिया। पहाड़ टूटते ही मेधावी पुत्र मर गया। बालधि बहुत रोने कलपने लगे। उन्हें इस तरह रोते-कलपते देखकर वेदवादियों ने जो गाथा कही वह सुना रहा हूँ। मनुष्य भाग्य द्वारा प्राप्त सुख या दुःख का उल्लङ्घन नहीं कर सकता। धनुषाक्ष ने महिषों (भैंसों) से पहाड़ तुड़वाकर बालधि के पुत्र को नष्ट कर दिया। तपस्वी लोग तप द्वारा देवताओं की कृपा से वरदान प्राप्त कर घमण्ड में आकर नष्ट हो जाते हैं। हे पुत्र यवक्रीत, तुम इससे बचना और रैभ्य तथा उनके पुत्रों से कभी सामना न हो, ऐसा प्रयत्न करना। "अत्राप्युदाहरन्तीमा गाथा नित्यं क्षमावताम् । गीताः क्षमावतां कृष्णे काश्यपेन महात्मना ॥" (महा० ३।२९।३५) द्रौपदी ने महाराज युधिष्ठिर से कहा था—बलि ने अपने पितामह प्रह्लादजी से पूछा कि क्षमा ठीक है या तेज, आप बतायें। प्रह्लादजी ने उत्तर दिया "न तो बराबर क्षमा ही ठीक होती है और न बराबर तेज हो। समय देख क्षमा अपनानी चाहिए और समय देखकर तेज।" सो आप इस समय दुर्योधन पर क्रोध कर युद्ध द्वारा उसे नष्ट कीजिए। महाराज युधिष्ठिर ने उत्तर दिया-हे कृष्णे, महात्मा काश्यप ने क्षमाशील लोगों में बैठकर क्षमा की प्रशंसा की है। इसके बाद ११ श्लोकों में क्षमा की प्रशंसा है। "अध्यत्र संश्रयार्थाय प्रजापतिरथो जगौ । पुष्करेषु कुरुश्रेष्ठ गाथां सुकृतिनां वर ॥ मनसाऽप्यभिकामस्य पुष्कराणि मनस्विनः । विप्रणश्यन्ति पापानि नाकपृष्ठे च मोदते ॥" महाराज युधिष्ठिर के पुरोहित धौम्य उनसे कहते हैं—हे कुरुश्रेष्ठ, पुष्कर तीर्थ के विषय में प्रजापति ने एक गाथा गायी है। पुष्कर तीर्थ में जाने की इच्छामात्र होने पर पाप दूर होते हैं और प्राणी स्वर्ग जाकर प्रसन्न होता है। "गाथामप्यत्र गायन्ति ये पुराणविदो जनाः । भीष्म यां तां च ते सम्यक् कथयिष्यामि भारत ॥ अन्तरात्मन्यभिहते रोषि पत्ररथाशुचि । अण्डभक्षणकर्मैतत् तव वाचमतीत्यते ॥" (म० भा० २।४१।३९, ४०) शिशुपाल ने भीष्म से कहा कि समुद्र के किनारे एक बूढ़ा हंस रहता था। वह सभी पक्षियों को उपदेश देता था कि धर्माचरण करना चाहिये। तथा उन पक्षियों की नजर बचाकर उनके अण्डे खा जाया करता था। पुराणविद लोग उस विषय में हे भीष्म, एक गाथा कहते हैं, सुनो। दुनियाँ में लोग परोपदेश में ही कुशल होते हैं;

किन्तु अपने व्यवहार में उसे नहीं लाते। इस बात को यह गाथा बताती है—हे हंस, तुम्हारे मन में काम, क्रोध आदि डेरा जमाये हैं और तुम धर्म का उपदेश कर रहे हो। कहाँ तुम्हारा नजर बचाकर अण्डों को खा जाना इतना अपवित्र कर्म और कहाँ यह धर्मोपदेश ! “अत्र पिङ्गलाया गीता गाथाः श्रूयन्ति पार्थिव । यथा सा कृच्छ्रकालेऽपि लेभे धर्मं सनातनम् ॥” ( म० भा० २।१७४।४६ ) कोई प्रेमी पिङ्गला वेश्या को सङ्केत देकर उसके पास नहीं पहुँचा। वह बहुत आतुरता से उसकी प्रतीक्षा करती रही। जब बहुत ही निराश हुई तो उसी दुःख के समय में उसे नित्य प्रसिद्ध योग ( आत्मज्ञान ) की प्राप्ति हो गयी। इस नैराश्य के विषय में पिङ्गला द्वारा गायी गाथा अब भी सुनी जाती है। “गाथाश्चाप्यब्रवीद् विद्वान् गौतमो मुनिसत्तमः । चिरकारिषु धीरेषु गुणोद्देशसमाश्रयाः ॥ चिरेण मित्रं बध्नीयात् चिरेण च कृतं त्यजेत् । चिरेण हि कृतं मित्रं चिरं धारणमर्हति ॥” (म० भा० १२।२६६।६८,६९) महाविद्वान् मुनिश्रेष्ठ गौतम ने चिरकारियों के गुण और कर्तव्य के विषय में गाथाएँ कही हैं। किसी को मित्रं बनाना हो तो जल्दी नहीं करनी चाहिये। मित्र बना लेने पर किसी कारण वश मित्र का परित्याग करना पड़े तो उसमें भी जल्दीबाजी नहीं करनी चाहिये। जिसके साथ मित्रता जोड़ने में विलम्ब होता है उससे जल्दी मित्रता टूटती भी नहीं। उक्त उद्धरणों में अनेक प्रकार की गाथाओं का उल्लेख है। सिद्धान्तभूत गाथाएँ अनृत नहीं हैं। वेदों में वास्तविक इतिहास या घटनोल्लेख मानने से वेद की अपौरुषेयता का भङ्ग होता है, अतः वहाँ की घटनासम्बन्धी गाथाएँ गुणवाद अर्थवादमात्र हैं। जो सुखावबोधार्था आख्यायिका हैं, उनका तात्पर्य ही सत्य होता है। उनका वाच्यार्थ अनृत है, यही ‘गाथानृतम्’ कहने का अभिप्राय है। अश्वमेधादि यज्ञों में पुत्रादि-परिवृत राजा को नाना प्रकार के आख्यान सुनाने का विधान है। पर वहाँ भी नियम है। प्रथमेऽह्नि मनुर्वैवस्वतो राजेत्याह; द्वितीयेऽह्नि यमो वैवस्वतो राजेत्याह; तृतीयेऽह्नि वरुण आदित्यो राजेत्याह आदि वाक्यों से नियत वैदिक आख्यायिकाओं का ही श्रवण कराया जाता है ( श० ब्रा० १३।४।३ का ब्र० सू० कल्पतरु ३।४।२३ में उद्धृत वचन ) । वेद का अध्यापन, श्रावण आदि वैदिक ब्राह्मण ही करा सकता है, सूत आदि नहीं। सूत, मागध, बन्दी आदि तो प्रसिद्ध लौकिक गाथाओं की सुनाते हैं । बुल्के १३०वें अनु० में लिखते हैं, “वाल्मीकि के पूर्व रामकथासम्बन्धी गाथाएँ प्रचलित हो चुकी थीं। इसका प्रमाण हमें बौद्ध त्रिपिटक में मिलता है। एक ओर रामकथासम्बन्धी गाथाएँ रामायण पर निर्भर नहीं हो सकती हैं और दूसरी ओर बौद्ध गाथाओं में जो रामकथासम्बन्धी सामग्री मिलती है वह रामायण के आधार के लिए पर्याप्त नहीं है। अतः रामायण तथा रामकथाविषयक बौद्ध गाथाएँ दोनों प्राचीन रामकथासम्बन्धी आख्यान काव्य पर निर्भर हैं। दशरथजातक की वर्तमान कथा में जो पोराण पण्डिताः शब्द आया है, इससे भी इस निर्णय की पुष्टि होती है। इसके अतिरिक्त हरिवंश के एक श्लोक में रामकथा के अत्यन्त संक्षिप्त वर्णन के पश्चात् इस प्रकार लिखा है— “गाथा अप्यत्र गायन्ति ये पुराणविदो जनाः । रामे निबद्धतत्त्वार्था माहात्म्यं तस्य धीमतः ॥” ( ह० पु० १।४१।१३९ )

२२८ रामायणमीमांसा सप्तम इसमें अवश्य रामायण की ओर निर्देश देखा जा सकता । फिर भी इसमें रामायण के पूर्व की प्राचीन गाथाओं का निर्देश देखना अधिक स्वाभाविक प्रतीत होता है ।"१ बुल्के का उक्त कथन रामायण के विरुद्ध है । रामायण में 'बालकाण्ड' में कहा गया है। वाल्मीकि ने नारद से मूलरामायण का श्रवण किया; तत्पश्चात् ब्रह्माजी के आदेशानुसार समाधिजा ऋतम्भरा प्रज्ञा द्वारा राम, लक्ष्मण, सीता आदि के सभी वृत्तान्तों का तत्त्वतः प्रत्यक्ष साक्षात्कार कर रामायण में उनका उल्लेख किया । सम्भव है कि उस समय भी रामकथा-सम्बन्धी कुछ आख्यान प्रचलित रहे हों; परन्तु वे भी आधुनिक उपाख्यानों की तरह प्रामाणिक मान्य नहीं हो सकते । अतः वे प्रामाणिक आर्ष इतिहासरूप रामायण के आधार नहीं हो सकते । रामकथासम्बन्धी गाथाओं के आधार रामायण एवं प्रचलित उपाख्यान हो सकते हैं; बौद्ध गाथाएँ तो रामायण की अपेक्षा अत्यन्त अर्वाचीन हैं, अतः वे रामायण की आधार हों यह प्रश्न ही नहीं उठता । वाल्मीकि राम के समकालिक थे यह प्रतिपादित किया जा चुका है । हरिवंशपुराण की गाथाओं का सम्बन्ध इतिहास-पुराणप्रसिद्ध गाथाओं से ही है, क्योंकि रामायण एवं पुराणों में रामसम्बन्धित अगणित गाथाएँ प्रसिद्ध हैं । उनको छोड़कर जिनका कोई प्रामाणिक रूप उपलब्ध नहीं उन उपाख्यानरूप गाथाओं का ग्रहण करना उचित नहीं है । 'पुराणविद' शब्द से भी उन गाथाओं का पुराण से ही सम्बन्ध नहीं मानना चाहिये । इसके अतिरिक्त जब बुल्के की दृष्टि में हरिवंशपुराण आदि का प्रामाण्य स्वीकृत ही नहीं, तब उनके आधारपर किसी निर्णय तक कैसे पहुँचा जा सकता है ? और वह कहाँ तक मान्य हो सकता है ? यदि ऐसा निर्णय मान्य हो तब तो बुल्के को हरिवंशपुराण के उल्लेखानुसार ही राम का विष्णु का अवतार होना निःसन्देह मान्य होना चाहिये । हरिवंशपुराण के ४१वें अध्याय में विष्णु के अवतार का उपक्रम है— “हन्त विष्णोः प्रवृत्तिं च शृणु दिव्यां मयेरिताम् ।” वहाँ विष्णु के विविध प्रभावों का वर्णन करते हुए अनेक अवतारों का वर्णन किया गया है । तदनन्तर परशुराम के अवतार का वर्णन है— “एष विष्णोः सुरेशस्य शाश्वतस्याव्ययस्य च । जामदग्न्य इति ख्यातः प्रादुर्भावो महात्मनः ॥” इसके अनन्तर विष्णु के ही रामावतार का वर्णन है— “राज्ञो दशरथस्याथ पुत्रः पद्मायतेक्षणः । कृत्वात्मानं महाबाहुश्चतुर्धा हरिरीश्वरः ॥” प्रभु ईश्वर अपने को चतुर्धा विभक्त कर राजा दशरथ के यहाँ प्रकट हुए । इस अध्याय की सम्पूर्ण कथा वाल्मीकिरामायण से ही मिलती-जुलती है । इसमें सीता को लक्ष्मी कहा गया है— “रूपिणी यस्य पार्श्वस्था सीतेति प्रथिता जनैः । पूर्वोचिता तस्य लक्ष्मीर्भर्तारमनुगच्छति ॥” क्या बुल्के उक्त श्लोकों को प्रमाण मानने का साहस करेंगे ? वस्तुतः वे किसी भी पक्ष पर टिक नहीं सकते । आर्ष ग्रन्थों में किसी को भी देखा जाय सभी में राम को विष्णुरूप अवश्य माना गया है । १. रामकथा, पृष्ठ १३८, १३९ ।

अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २२९ १३२वें अनु० में वे लिखते हैं, "इस रामसम्बन्धी गाथासाहित्य की उत्पत्ति इक्ष्वाकुवंश में हुई थी । रामायण में लिखा है— "इक्ष्वाकूणामिदं तेषां राज्ञां वंशे महात्मनाम् । महदुत्पन्नमाख्यानं रामायणमिति श्रुतम् ॥” (वा० रा० १।५।३ ) उनका यह कथन भी अशुद्ध है, क्योंकि इस श्लोक में रामकथासम्बन्धी अन्य आख्यानों की चर्चा नहीं है । इसमें तो रामायणरूप महदाख्यान की उत्पत्ति इक्ष्वाकुवंशीय महात्मा राजाओं के वंश में हुई थी यही कहा गया है, अतः इस वाक्य में इक्ष्वाकुवंश के सूतों ने इनके विषय में गाथाएँ तथा आख्यान सुनाये होंगे, बुल्के की इस अटकल के लिए कोई अवकाश ही नहीं है । वहीं, पृष्ठ १३९ की टिप्पणी में, वे लिखते हैं, "ध्यान देने योग्य है कि वाल्मीकि का आदिरामायण सूतों की सम्पत्ति न बनकर काव्योपजीवी कुशीलवों द्वारा पहले जनता में लोकप्रियता प्राप्त करने लगा और बाद में दरबारों में प्रवेश कर सका; ऐसा ही बालकाण्ड के चतुर्थ सर्ग से प्रतीत होता है ।" बुल्के स्वयं ही बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड दोनों को ही प्रक्षिप्त मानते हैं, अतः ईमानदारी की बात यह है कि उपर्युक्त काण्डों के किसी भी अंश या सन्दर्भ को अपने कथन के प्रमाण रूप में उल्लेख करने का उनको अधिकार ही नहीं है। यदि वे उन काण्डों को प्रामाणिक स्वीकार कर लेते हैं तो उन्हें उन काण्डों के ही अनुसार यह भी मानना होगा कि 'रामायण' के कुशीलव बुल्के के तथाकथित काव्योपजीवी न होकर सीता के पुत्र कुश और लव थे और समास के अनुसार कुशीलव कहे गये । यह पीछे स्पष्ट किया जा चुका है। बुल्के यह भी कहते हैं कि "महाभारत द्रोणपर्व और शान्तिपर्व में जो संक्षिप्त रामचरित्र मिलता है, वह इस प्राचीन आख्यानकाव्य पर निर्भर प्रतीत होता है ।१" बुल्के का यह कथन भी असङ्गत है—जब कि महाभारत से बहुत पहले का विस्तृत आर्ष वाल्मीकिरामायण उपस्थित है तब उसको भुलाकर अपूर्व, अनुपलब्ध तथा अप्रामाणिक आख्यानों को उनका आधार मानना तर्कविरुद्ध ही है । महाभारत निर्माणकाल में रामायण का सर्वत्र प्रसार था, साथ ही अन्य रामसम्बन्धी उपाख्यानों का भी सर्वत्र प्रसार रहा है । ऐसा मानने में सिद्धान्त में कोई हानि नहीं होती, परन्तु विस्तृत वैदिक साहित्य में रामसम्बन्धी गाथाओं का कहीं उल्लेख नहीं है, यह कहना निष्प्रमाण है। पिछले प्रकरणों में इसका विस्तार से खण्डन किया जा चुका है। बुल्के लिखते हैं, "अतः वैदिककाल के बाद और चौथी शती ई० पूर्व के पहले सम्भवतः छठी शती में इस रामकथासम्बन्धी आख्यान काव्य की उत्पत्ति हुई थी ।'२ उनके इस कथन में भी कोई प्रमाण नहीं । रामायण के अनुसार रामकाल में ही रामायण का निर्माण हुआ, परन्तु पुराणों के अनुसार तो राम के अवतार के पूर्व ही रामायण का निर्माण अतीत, अनागत तथा वर्तमान के द्रष्टा महर्षियों ने कर रखा था। वर्तमान वाल्मीकिरामायण तो शतकोटि- प्रविस्तर रामायण का सारमात्र है । 'चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।" ( रा० माहात्म्य ) १३२वें अनु० में बुल्के लिखते हैं, "जिस दिन किसी कवि ने रामकथाविषयक स्फुट आख्यान काव्य का सङ्कलन करके उसे एक ही कथासूत्र में ग्रथित करने का प्रयास किया था उस दिन रामायण उत्पन्न हुआ । वह कवि कौन था ? प्राचीनतम परम्परा वाल्मीकि को आदि कवि मानती है । युद्धकाण्ड की फलश्रुति में लिखा है— "आदिकाव्यमिदं चार्षं पुरा वाल्मीकिना कृतम् ।” ( वा० रा० ७।१२८।१०५ ) १ रामकथा. पृष्ठ १३९ । २. रामकथा, पृष्ठ १३९ ।

कालिदास ने भी वाल्मीकि को आद्यकवि की उपाधि प्रदान की है— “कवेराद्यस्य शासनात् ।” (रघु० १५।४१ ) “वाल्मीकि द्वारा श्लोक-सृष्टि की कथा (वा० रा० १।२ ) में इतना ऐतिहासिक सत्य अवश्य होगा कि वाल्मीकि ने इस छन्द को परिष्कृत किया है ।” वस्तुतः बुल्के का यह मत अधूरा ही है। कहा जा चुका है कि रामायण के पहले रामकथासम्बन्धी आख्यान भले ही रहे हों, परन्तु वाल्मीकिरामायण आर्ष-विज्ञान के आधार पर रचा गया है, स्फुट आख्यानों के आधार पर नहीं। साथ ही, वर्तमान प्रसिद्ध रामायण से भिन्न आदिरामायण नामक कोई ग्रन्थ न था और न है। प्रसिद्ध रामायण के आदिकवि वाल्मीकि रचयिता हैं; परन्तु वे आधुनिक नहीं हैं। राम के समकालीन हैं। यह भी रामायण प्रमाण से ही सिद्ध है। बालकाण्ड और रघुवंश के द्वारा प्रथम श्लोक के निर्माण की असत्यता में कोई प्रमाण नहीं, अतः उसकी सत्यता में कोई बाधा नहीं है। बुल्के १३३वें अनु० में लिखते हैं, “आदिरामायण में न तो बालकाण्ड था और न उत्तरकाण्ड और न अवतारवाद ।” परन्तु अपने कथन के प्रमाण में बुल्के के पास निराधार अनुमान के सिवा और कोई ठोस तर्क नहीं है। आदिरामायण जैसी कोई पुस्तक प्रसिद्ध नहीं है। वह बुल्के जैसे कुछ स्वतन्त्र लोगों के मस्तिष्क की उपजमात्र है। आदिरामायण के नाम पर वे अपनी स्वतन्त्र भावना के अनुसार ही मनमानी करते हुए प्रसिद्ध वाल्मीकिरामायण के विभिन्न अंशों को प्रक्षेप बताने का साहस करते हैं। इस सन्दर्भ में वे आगे कहते हैं,१ “आदिरामायण के विस्तार के विषय में बौद्धमहाविभाषा में कहा जाता है कि रामायण में १२००० श्लोक मिलते हैं। अतः आदिरामायण के विकास में एक ऐसा समय हुआ जब इसका विस्तार आजकल प्रचलित रामायण का आधा था ।” परन्तु उपर्युक्त कथन भी निराधार हैं। यह आश्चर्य है कि जो वाल्मीकिरामायण अत्यन्त प्रामाणिक है, परम्परा से जिसका पठन-पाठन और अनुष्ठान होता आया है एवं महाभारत तथा पुराणों में जिसका समर्थन मिलता है उसके स्वरूप के निर्धारण में उसका और उससे सम्बन्धित ग्रन्थों का प्रामाण्य न मानकर अनुपलब्ध, अप्रामाणिक एवं यत्र-तत्र, छिन्न-भिन्न प्रमाणाभासों का सहारा लिया गया है और उन्हीं के बल पर वाल्मीकिरामायण के वर्तमान रूप को अप्रामाणिक और अविश्वसनीय सिद्ध करने का प्रयास किया गया है। १३४वें अनु० में बुल्के लिखते हैं, “आदिरामायण क्षत्रियों की सम्पत्ति थी। उसमें आदर्श क्षत्रिय सत्यसन्ध राम की महिमा प्रतिपादित की गयी थी। मोक्ष तथा वैराग्य के स्थान पर आदर्श अन्तगति स्वर्ग माना जाता था और उसे प्राप्त करने के लिए ब्राह्मणों की सहायता की आवश्यकता नहीं होती थी। बाद में सारे काव्य को ब्राह्मण ढाँचे में ढालकर सर्वथा नवीन रूप दिया गया है। यह डा० रूबन का मत है, पर इसके लिए कोई समीचीन प्रमाण नहीं दिया गया है। डा० रूबन के उदाहरण (ऋष्यशृङ्ग तथा विश्वामित्र की कथा, उत्तरकाण्ड के अश्वमेध) स्पष्टतया प्रक्षेप हैं। इनसे इतना ही ज्ञात होता है कि रामायण के अर्वाचीन प्रक्षेप में ब्राह्मणों का प्रभाव स्पष्ट है। इस सामग्री से आदिरामायण के रूप के विषय में कोई तर्क नहीं लिया जा सकता है। फिर भी डा० रूबन के इस मत में कुछ तत्त्व है। रामकथासम्बन्धी आख्यान-काव्य क्षत्रिय इक्ष्वाकु-वंश में उत्पन्न हुआ और इसका बहुत काल तक इन क्षत्रियों के दरबारों में प्रचार रहा था। वाल्मीकि ने उस स्फुट काव्य को एक ही प्रबन्ध-काव्य में सङ्कलित करके लगभग ३०० ई० पू० आदि- रामायण की रचना की है। यह रचना बहुत कुछ प्राचीन आख्यान-काव्य से मिलती-जुलती रही होगी। बाद के प्रक्षेपों की भावधारा स्पष्टतया भिन्न है।”

अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २३१ वस्तुतः उपर्युक्त शङ्का और समाधान दोनों ही असङ्गत एवं पाश्चात्यों की दुरभिसन्धिपूर्ण दुष्ट कल्पनामात्र हैं। भारतीय संस्कृति के अनुसार वेद, मन्वादि धर्मशास्त्र, रामायण, महाभारत, अष्टादशपुराण, न्याय-वैशेषिक, सांख्य-योग, पूर्वोत्तरमीमांसा ये धर्मग्रन्थ हैं। ब्रह्म-यज्ञ में इनका अध्ययन किया जाता है। उसके लिए गुरु-परम्परा से अध्ययन आवश्यक है। मन्वादि के अनुसार गुरु या आचार्य ब्राह्मण ही होता है। इस दृष्टि से क्षत्रियादि को भी रामायण का अध्ययन ब्राह्मण गुरु से ही करना पड़ता है। जब रामायण के निर्माता महर्षि वाल्मीकि ब्राह्मण थे तो उनकी रचना रामायण क्षत्रियों की ही सम्पत्ति कैसे हो सकती थी ? हाँ, विशेषतः क्षत्रियवंशीय राम का चरित्र होने से क्षत्रियों में इसका अधिक प्रचार एवं सम्मान असम्भावित नहीं । "आदिरामायण में मोक्ष और वैराग्य के स्थान पर आदर्श गति स्वर्ग को ही माना जाता था।" यह कथन निष्प्रमाण है। कारण रामायण वर्णित अगस्त्य, सुतीक्ष्ण, शरभङ्ग आदि ऋषि अरण्यवासी वैराग्य एवं मोक्ष के ही प्रतीक थे। रामायण में परम गति स्वर्ग ही नहीं है, किन्तु ब्रह्मलोक है। सगुण ब्रह्मलोक की प्राप्ति के अनन्तर निर्गुण ब्रह्मप्राप्ति भी होती है, यह रामायण द्वारा आदृत वेदों से ही सिद्ध होता है— "शृण्वन् रामायणं भक्त्या यः पादं पदमेव वा । स याति ब्रह्मणः स्थानं ब्रह्मणा पूजितः सदा ॥" इति लवकुशयोर्मङ्गलाचरणे चतुर्दशः श्लोकः । जो रामायण को भक्ति से सुनता है वह ब्रह्म के स्थान में जाता है और ब्रह्म द्वारा आदृत हो जाता है। ब्राह्मणों की सहायता अपेक्षित नहीं थी ऐसा कहना भी असङ्गत है, क्योंकि रामायण वैदिक संस्कृति का ग्रन्थ है। जाबालि की समालोचना करते हुए राम ने वेद एवं वैदिक परम्पराओं की प्रामाणिकता को ही सिद्ध किया है। रामायण में वैदिक यज्ञों का वर्णन है और उसी से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। उन यज्ञों का अनुष्ठान ब्राह्मणों की सहायता के बिना अनुपपन्न है, क्योंकि श्रौतसूत्रों के अनुसार ऋत्विज्य ब्राह्मण के ही हाथों रहता है। ब्राह्मणेतर द्विज यजमान तो हो सकते हैं, परन्तु वे ऋत्विज नहीं होते। यही कारण है कि दशरथ के यज्ञ में भी वसिष्ठ, ऋष्यशृङ्ग आदि ब्राह्मण ऋत्विजों का ही वरण किया गया था। बालकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड प्रक्षेप हैं, यह पक्ष खण्डित ही है, अतएव ऋष्यशृङ्ग एवं विश्वामित्र की कथाओं को प्रामाणिक मानने पर भी डा० रूबेन का मत सिद्ध नहीं हो सकता। रामायण का निर्माण ई० ३०० वर्ष पूर्व हुआ यह मत भी सर्वथा उपेक्षणीय एवं रामायण के विरुद्ध है। रामायण में ही राजसिंहासनारूढ राम के समय में उसका निर्माण होने का उल्लेख है— 'प्राप्तराज्यस्य रामस्य वाल्मीकिर्भगवानृषिः । चकार चरितं कृत्स्नं विचित्रपदमर्थवत् ॥" (वा० रा० १।४।१ ) १३५वें अनु० में बुल्के लिखते हैं, "आदिरामायण की भाषा के विषय में भी सन्देह किया गया है। मूल रचना की भाषा प्राकृत रही होगी। बाद में पहली शताब्दी ई० से इनका संस्कृत रूपान्तर चल पड़ा ।" डा० याकोबी ने अकाट्य तर्कों से इस मत का खण्डन किया है। आजकल इस मत का प्रतिपादन कोई नहीं करता। डा० याकोबी का मुख्य तर्क इस प्रकार है। ( अ ) भारत में प्राकृत मूलरामायण तथा इसके संस्कृत रूपान्तर के विषय में कोई उल्लेख नहीं मिलता । ( आ ) यदि केवल पहली शती ई० में रामायण का संस्कृत अनुवाद किया गया था, तो आर्ष प्रयोग कैसे सम्भव होते ?

२३२ रामायणमीमांसा सप्तम (इ) प्राकृत साहित्य की मुख्य विशेषता है—शृङ्गार और अद्भुत रस बाहुल्य (दे० कथासरित्सागर) । इसके अतिरिक्त पाली तथा प्राकृत की शैली बहुत अपरिष्कृत है। अतः प्राकृत साहित्य उपर्युक्त कारणों से संस्कृत-काव्य का आधार तथा आदर्श होने के नितान्त अनुपयुक्त सिद्ध होता है। वस्तुतः कथासरित्सागर भी कोई नवीन रचना नहीं है। शिवजी ने ही इतिहासपुराणों की अधिकांश कथाओं का वर्णन किया है। शिव-पार्वती के संवाद का ही पिशाचभाषा में बृहत्कथा के रूप में उल्लेख हुआ है। कथासरित्सागर उसी पर आधारित है। शृङ्गार और अद्भुत रस पुराणों में कम नहीं है। वेदों में उक्त दोनों बातें हैं ही। ई० पू० दूसरी, तीसरी शताब्दी में रामायण का निर्माण मान लेने पर भी आर्ष प्रयोगों का समर्थन नहीं हो सकता, क्योंकि “लक्ष्यैकचक्षुष्क ऋषि” ही आर्ष प्रयोग करता है। लक्षणैकचक्षुष्क कोई कवि आर्ष प्रयोग करने का अधिकारी नहीं होता। समस्त शब्दों की शुद्धि और अशुद्धि जो पाणिनि आदि के समान आर्ष ज्ञान से जान सकता है वही ऋषि पाणिनि आदि के लक्षणों, सूत्रों से असिद्ध परन्तु अपने आर्ष-विज्ञान से सिद्ध शब्दों का प्रयोग कर सकता है। जो लोग समझते हैं प्राकृत का ही संस्कार कर संस्कृत निष्पन्न होता है उनका यह भ्रम है, क्योंकि वह प्राकृत-व्याकरण के विरुद्ध है। प्राकृत व्याकरण में कहा गया है— “प्रकृतिः संस्कृतं तस्माद्भवं प्राकृतम्।” संस्कृत ही प्रकृति है, उससे उद्भूत भाषा ही प्राकृत भाषा है। अतएव वेद के मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद् आदि की भाषा प्राकृत भाषा से बहुत प्राचीन है और वह संस्कृत ही है। यद्यपि संस्कृत शब्दों के साथ ही अपभ्रंश शब्द भी होते हैं; जैसे चलनी के द्वारा ग्राह्याग्राह्य पदार्थों से ग्राह्य वस्तु का पृथक्करण किया जाता है वैसे ही संस्कृत शब्दों को अपभ्रंश शब्दों से पृथक् कर देना ही शब्दों का संस्कार है। अतएव राम के समकाल में वेदार्थ उपबृंहण की दृष्टि से ही संस्कृत भाषा में ही महर्षि वाल्मीकि ने रामायण का निर्माण किया। १३६ वें अनु० के अनुसार बुल्के कहते हैं, “आठवें अध्याय में बालकाण्ड को प्रक्षिप्त सिद्ध किया गया है। डा० याकोबी के अनुसार आदिरामायण का प्रारम्भ बालकाण्ड के निम्नलिखित श्लोकों में सुरक्षित है— सर्ग ५ श्लोक १-४ रामायण की स्तुति । सर्ग ५, श्लोक ५-६ कोशल तथा अयोध्या की स्तुति । सर्ग ५, श्लोक ९ } दशरथ की स्तुति । सर्ग ६, श्लोक २-४ सर्ग १८, श्लोक १६-२१ (उत्तरार्द्ध) २२; दशरथ के पुत्रों का उल्लेख । सर्ग १८, श्लोक २५ पुत्रों की स्तुति (अथवा अयोध्याकाण्ड १, १)। सर्ग १८, श्लोक २४-१२; राम की श्रेष्ठता (अथवा अयोध्याकाण्ड १,६-८। इस भूमिका के बाद काव्य की मुख्य वस्तु का प्रारम्भ हुआ होगा। (दे० अयोध्याकाण्ड सर्ग २, श्लोक ३६ )” उपर्युक्त कल्पना के किसी आधार का बुल्के उल्लेख नहीं करते। वस्तुतः उपलब्ध सम्पूर्ण बालकाण्ड प्रामाणिक रामायण है और उसके बिना रामायण अधूरा ही रहेगा। अयोध्या तथा दशरथ का वर्णन तथा उनका अश्वमेध तथा पुत्रेष्टियज्ञ, पुत्र-जन्म, उनका संस्कार, विश्वामित्र का आगमन, राम-लक्ष्मण का उपनयन, सिद्धाश्रम- गमन, मिथिलागमन, विवाह आदि के बिना अयोध्याकाण्ड का अकस्मात् आरम्भ होना सर्वथा असङ्गत ही है। इसके अतिरिक्त बालकाण्ड को ही प्रक्षिप्त मान लेने पर उपर्युक्त तालिका के कुछ श्लोकों को ही किस आधार पर प्रामाणिक कहा जा सकता है ? निश्चय ही किसी पुष्ट प्रमाण के समर्थन के अभाव में ऐसे कथन अमान्य ही हैं।

अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २३३ १३७ वें अनु० में 'आदिरामायण के विकास के सम्बन्ध में बुल्के लिखते हैं, “आदिरामायण का विकास समझने के लिए उसके प्रचार की रीति को ध्यान में रखना परमावश्यक है। बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड में लिखा गया है कि वाल्मीकि ने अपने शिष्यों को रामायण सिखलाकर उसे राजाओं, ऋषियों तथा जनसाधारण को सुनाने का आदेश दिया— “कृत्स्नं रामायणं काव्यं गायतां परया मुदा । ऋषिवाटेषु पुण्येषु ब्राह्मणावसथेषु च ॥ रथ्यासु राजमार्गेषु पार्थिवानां गृहेषु च ॥” (वा० रा० ७।९३।४, ५) इससे ज्ञात होता है रामायण काव्य मौखिकरूप से प्रचलित था । कुशीलव सारे देश में उसे गाकर सुनाते थे और इस प्रकार अपनी जीविका चलाते थे । वे काव्योपजीवी ही थे । रामायण काव्य उनको कण्ठस्थ था और वे उसे अपने पुत्रों को सिखलाते थे । रामायण का कोई ग्रन्थ प्रचलित नहीं था और न प्राचीन फलश्रुति और श्रवणफलस्तुति ही थी । “श्रुत्वा रामायणमिदं दीर्घमायुश्च विन्दति ।” ( वा० रा० ६।१२८।१०९ ) बाद में रामायण के पढ़ने तथा लिखने का भी उल्लेख मिलता है— “रामायणमिदं कृत्स्नं शृण्वतः पठतः सदा ।” ( वा० रा० ६।११७।११८ ) "भक्त्या रामस्य ये चेमां संहितामृषिणा कृताम् । ये लिखन्तीह च नरास्तेषां वासस्त्रिविष्टपे ॥” ( वा० रा० ६।१२८।१२० ) लेकिन फलश्रुति का यह अंग गौड़ीयपाठ में नहीं मिलता । टीकाकार कतक ने भी उसे प्रक्षिप्त माना है ।" वस्तुतः ऐसे कथन उत्तरदायित्व-हीन हैं । किसी भी ठोस प्रमाण के सर्वथा अभाव में किसी भी ग्रन्थ के किसी भी अंश को प्रक्षेप कह देना और उन्हीं अंशों में से अपने स्वार्थ के अनुगुण कुछ अंशों को स्वीकार कर लेना नितान्त साभिप्राय कुतर्क ही है । यदि ऐसे लेखकों से प्रश्न किया जाय कि वे किस अधार पर यह कहते हैं कि अमुक अंश महर्षि वाल्मीकि की रचना है और अमुक प्रक्षेप है ? इसे किसने देखा है ? किस वर्ष, किस समय, किस पक्ष, किस तिथि में किसने कब इस अंश को लिखकर रामायण में जोड़ा था इसका प्रमाण क्या है ? और उस प्रमाण की प्रामाणिकता क्या है ? तो निश्चय ही वे कोई युक्तिसङ्गत उत्तर नहीं दे सकेंगे । उसी बालकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड को प्रक्षिप्त भी कहना और उसमें से ही प्रमाणरूप से श्लोक उद्धृत भी करना अर्धकुक्कुटी-न्याय है । जैसे कोई कुक्कुटी के एक अंश को पाक के लिए और दूसरे अंश को प्रजनन के लिए रखना चाहता हो । उक्त दोनों क्रियाएँ एक ही साथ कदापि सम्भव नहीं, क्योंकि यह असङ्गत है । ठीक इसी तरह बालकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड को प्रक्षेप कहते हुए उसके कुछ श्लोकों से स्वमन्तव्य की पुष्टि भी करना दोनों ही असङ्गत हैं । यह ठीक है कि उस समय कण्ठस्थ करने की पद्धति ही अधिक थी, परन्तु लेखन प्रणाली थी ही नहीं, यह कहना भी अनभिज्ञता का ही परिचय देना है । बहुत प्राचीनकाल से मन्त्रलेखन की पद्धति प्रचलित है। उसी आधार पर 'ये लिखन्तीह' यह फलश्रुति भी सङ्गत ही है । वह गौड़ीय पाठ में भले न मिलती हो, परन्तु दाक्षिणात्य आदि पाठों में तो मिलती ही है । रामायण के अनुसार वाल्मीकि ने जिन शिष्यों को रामायण पढ़ाकर राजाओं, ऋषियों तथा जनसाधारण में गाने को कहा उनमें प्रमुख कुश और लव थे, जो सीता के पुत्र थे, उन्हीं को कुशीलव भी कह दिया गया है । वे ३०

२३४ रामायणमीमांसा सप्तम काव्योपजीवी तथा उसके द्वारा जीविका चलानेवाले नहीं थे । बुल्के का उक्त कथन उपजीव्यविरोधी होने से अत्यन्त हेय है । वे जिस ( उत्तरकाण्ड सर्ग ९३ ) आधार पर रामायण के कण्ठस्थ गाने का समर्थन करते हैं और कुश एवं लव को काव्योपजीवी कुशीलव सिद्ध करने का दुःसाहस करते हैं उसी से उनका कथन विरुद्ध है । वहाँ महर्षि ने अन्य शिष्यों को नहीं, किन्तु कुश एवं लव दो ही शिष्यों को रामायण-गान का आदेश दिया— “स शिष्यावब्रवीदृष्टो युवां गत्वा समाहितौ । कृत्स्नं रामायणं काव्यं गायतां परया मुदा ॥ ऋषिवाटेपु पुण्येषु ब्राह्मणावसथेषु च । रथ्यासु राजमार्गेषु पार्थिवानां गृहेषु च ॥ रामस्य भवनद्वारे यत्र कर्म च कुर्वते । ऋत्विजामग्रतश्चैव तत्र गेयं विशेषतः ॥” ( वा० रा० ७।९३।४-६ ) अर्थात् महर्षि वाल्मीकि ने अपने दोनों शिष्यों—कुश एवं लव को, जो सीता के पुत्र थें, कहा कि तुम दोनों जाकर समाहित होकर प्रसन्नता से सम्पूर्ण रामायण का गान करो । पुण्य ऋषिवाटों ( अहातों ), ब्राह्मणों के आवासों, रथ्याओं, राजमार्गों, छोटे राजाओं के महलों और रामभवन के द्वार पर और ऋत्विज जहाँ अश्वमेधसम्बन्धी कर्म कर रहे हों विशेषतः वहाँ गान करो । बुल्के यदि उत्तरकाण्ड और बालकाण्ड को प्रमाण मान लेते हैं तो उनके कल्पना के सभी महल ढह जायँगे । इसी लिए वे उन्हें पहले से ही प्रक्षेप कहने की कल्पना करते हैं । वे काव्योपजीवी कुशीलव थे, उसके द्वारा जीविका चलाते थे उनकी यह कल्पना भी आगे के श्लोकों से समूल ध्वस्त हो जाती है । महर्षि कुश और लव को सम्बोधन कर कहते हैं । “वत्सो ! इन उत्तम स्वादवाले विविध फलों को, जो कि पर्वताग्रों में उत्पन्न हुए हैं, खाकर तुम गायन करना, इन सुमिष्ट फल-मूलों को खाने से तुम दोनों को श्रम ( थकावट ) न होगा और इनके खाने से तुम दोनों का कण्ठमाधुर्यरूप राग भी नहीं मिटेगा । महर्षि ने पुनः सावधान किया कि महीपति राम यदि तुमको श्रवण के लिए बुलायें तो जाना और उपविष्ट ऋषियों के समक्ष यथायोग्य गान करना । परन्तु धन की वाञ्छा से स्वल्प भी लोभ न करना, क्योंकि हम फलमूलाशी आश्रमवासियों के लिए धन का क्या प्रयोजन है— “लोभश्चापि न कर्तव्यः स्वल्पोऽपि धनवाञ्छया । किं धनेनाश्रमस्थानां फलमूलाशिनां सदा ॥” ( वा० रा० ७।९३।११ ) राम ने पहले ही दिन रामायण के बीस सर्ग सुनने पर प्रसन्न होकर लक्ष्मण को आदेश दिया कि अठारह- अठारह हजार सुवर्ण मुद्राएँ दोनों बालकों को पृथक्-पृथक् दी जायँ और भी जो इनकी इच्छा हो दिया जाय । लक्ष्मण ने वैसा ही किया, परन्तु दोनों ने सुवर्ण मुद्राओं को लेना अस्वीकार किया और कहा “इस सुवर्ण-राशि से हमें क्या प्रयोजन है ? हम लोग तो वनवासी हैं, वन्य फलमूल से ही तृप्त हैं ।” उनकी ऐसी बातें सुनकर सभी श्रोताओं और राम को बड़ा कौतूहल और विस्मय हुआ— “श्रुत्वा विंशतिसर्गास्तान् भ्रातरं भ्रातृवत्सलः । अष्टादशसहस्राणि सुवर्णस्य महात्मनोः ॥ प्रयच्छ शीघ्रं काकुत्स्थ यदन्यदभिकाङ्क्षितम् । ददौ स शीघ्रं काकुत्स्थो बालयोर्वे पृथक्-पृथक् ॥ दीयमानं सुवर्णं तु नागृह्णीतां कुशीलवौ । ऊचतुश्च महात्मानौ किमनेनेति विस्मितौ ॥

अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २३५ वन्येन फलमूलेन निरतौ वनवासिनौ । सुवर्णेन हिरण्येन कि करिष्यावहे वने ॥" (वा० रा० ७।९४।१७-२०) क्या ऐसी उक्ति काव्योपजीवी जाति कुशीलवों के लिए सम्भव थी ? क्या कुशीलव वनवासी होते थे ? बुल्के इस तथ्य को क्यों नहीं समझना चाह रहे हैं कि "कुशीलवौ" शब्द से प्रकृत में द्वन्द्वसमास के द्वारा कुश और लव सीता के दो पुत्र ही विवक्षित हैं, कोई कुशीलव नामक काव्योपजीवी जाति नहीं । बालकाण्ड में भी कुश-लव को 'कुशीलवौ' कहा गया गया है—यहाँ एकवचन या बहुवचन का नहीं, किन्तु अश्विनौ के समान द्विवचन का ही सर्वत्र प्रयोग हुआ है । साथ ही उन्हें मुनिवेष-धारी राजकुमार कहा गया है— "तस्य चिन्तयमानस्य महर्षेर्भावितात्मनः । अगृह्णीतां ततः पादौ मुनिवेषौ कुशीलवौ ॥ कुशीलवौ तु धर्मज्ञौ राजपुत्रौ यशस्विनौ । भ्रातरौ स्वरसम्पन्नौ ददर्शाश्रमवासिनौ ॥" ( वा० रा० १।४।४,५ ) उत्तरकाण्ड में महर्षि वाल्मीकि राम से कुश और लव के सम्बन्ध में कहते हैं, "ये दोनों जानकी से उत्पन्न तुम्हारे हो यमज पुत्र हैं, यह मैं सत्य कहता हूँ—" "इमौ तु जानकीपुत्रावुभौ च यमजातको । सुतो तवैव दुर्धर्षौ सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥" ( वा० रा० ७।९६।१७ ) बुल्के उपर्युक्त सम्पूर्ण तथ्यों की उपेक्षा कर कुश और लव को काव्योपजीवी कुशीलव कहते हैं । वस्तुतः साङ्गोपाङ्ग रामायण का प्रमाण न मानने से ऐसे ही भ्रान्तिपूर्ण अनर्थ की सम्भावना होती हैं। बुल्के के लिए यह समझना उचित है कि काव्योपजीवी कुशीलव को काव्य से जीविका चलाना होता तो वे रथ्याओं, राजमार्गों, राजाओं के महलों, ऋषिवाटों, ब्राह्मणावसथों तथा जनसाधारण में रामायण का गान करते हुए क्यों घूमते ? यदि वे सादर उत्तरकाण्ड का अध्ययन करें तो उनके लिए भी स्पष्ट हो जायगा कि वस्तुतः इस सब का उद्देश्य सीता के चरित्र की पवित्रता और निर्मलता स्थापन करना ही था । यह भी विचारणीय है कि आश्रम में सीता के आने के बाद ही रामायण के निर्माण का प्रसङ्ग क्यों आता है ? लक्ष्मण वाल्मीकि आश्रम के समीप अन्तर्वत्नी सीता को पहुँचा कर लौट गये । रुदन करती हुई सीता को देखकर मुनि-बालकों ने जाकर वाल्मीकि को बताया कि कोई अदृष्टपूर्वा श्री के समान किसी की पत्नी स्वर्गच्युत देवता के समान दुःखित है । मुनिपुङ्गव वाल्मीकि ने शोकव्याकुल सीता से मधुर एवं आह्लादिनी वाणी से कहा कि तुम दशरथ की स्नुषा और राम की पत्नी तथा जनक की पुत्री हो मैंने सब समाधि से जान लिया है । तुम्हारे त्याग का कारण भी मैंने जान लिया है । तुम निष्पाप हो यह भी मैंने तपोबललब्ध चक्षु से देख लिया है। यहीं समीप में तापसी लोग हैं, ये सब तुम्हारी रक्षा करेंगी । सीता ऋषि की आज्ञा के अनुसार आश्रम में रहने लगी । निर्वासिता सीता के करुण क्रन्दन जनित करुण रस से महर्षि का हृदय परिपूर्ण था; निषाद द्वारा क्रोञ्च के वध से संतप्त क्रौञ्ची के करुण क्रन्दन ने महर्षि के तादृश हृदय को आलोड़ित कर दिया, वही करुण रस महर्षि के हृदय से उच्छलित हो श्लोक बन गया— "शोकार्तस्य प्रवृत्तो मे श्लोको भवतु नान्यथा ।" ( वा० रा० १।२।१८) शोकाकुलित वाल्मीकि महर्षि को मार्ग-प्रदर्शन करने के लिए ब्रह्माजी आये और उन्होंने कहा कि मेरी प्रेरणा से ही सरस्वती इस श्लोक रूप में प्रकट हुई है; तुम धर्मात्मा एवं धीर राम के सम्पूर्ण चरित्र को जैसे नारद

से सुना है वैसे और भी उनके जो रहस्य और प्रकाशमय चरित्र हैं, जो अभीतक अविदित हैं वे भी तुम्हें विदित होंगे, इस काव्य में तुम्हारी कोई भी वाणी अनृत नहीं होगी— “रामस्य चरितं कृत्स्नं कुरु त्वमृषिसत्तम । धर्मात्मनो भगवतो लोके रामस्य धीमतः ॥ वृत्तं कथय धीरस्य यथा ते नारदाच्छ्रुतम् । रहस्यं च प्रकाशं च यद् वृत्तं तस्य धीमतः ॥ रामस्य सहसौमित्रे राक्षसानां च सर्वशः । वैदेह्याश्चैव यद् वृत्तं प्रकाशं यदि वा रहः ॥ तच्चाप्यविदितं सर्वं विदितं ते भविष्यति । न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति ॥ कुरु रामकथां पुण्यां श्लोकबद्धां मनोरमाम् ।” (वा० रा० १।२।३२-३५½) पुनः तीसरे सर्ग में स्पष्टतः कहा गया है— “उपस्पृश्योदकं सम्यङ्मुनिः स्थित्वा कृताञ्जलिः । प्राचीनाग्रेषु दर्भेषु धर्मेणान्वेषते गतिम् ॥ रामलक्ष्मणसीताभी राज्ञा दशरथेन च । सभार्येण सराष्ट्रेण यत् प्राप्तं तत्र तत्त्वतः ॥ हसितं भाषितं चैव गतिर्यावच्च चेष्टितम् । तत् सर्वं धर्मवीर्येण यथावत् सम्प्रपश्यति ॥ स्त्रीतृतीयेन च तथा यत् प्राप्तं चरता वने । सत्यसन्धेन रामेण तत् सर्वं चान्ववैक्षत ॥ ततः पश्यति धर्मात्मा तत् सर्वं योगमास्थितः । पुरा यत् तत्र निर्वृत्तं पाणावामलकं यथा ॥ तत् सर्वं तत्त्वतो दृष्ट्वा धर्मेण स महामतिः । अभिरामस्य रामस्य तत् सर्वं कर्तुमुद्यतः ॥” (वा० रा० १।३।२-७) महर्षि ने आचमन कर प्राचीनाग्र कुशों पर आसीन होकर योगज धर्म से राम आदि के चरित्रों को ध्यान से देखा । राम, लक्ष्मण, सीता तथा सराष्ट्र एवं तीनों भार्याओं सहित दशरथ ने जो कुछ भी हसित, भाषित, चेष्टित, गमन आदि किया धर्मबल से ऋषि ने सब कुछ देखा । योग का आश्रयण करके पुराकाल में जो कुछ भी घटनाएँ घटी उनको करतल में स्थित आँवले की तरह सम्पूर्णतः ओर सम्यगरूप से महर्षि ने देख लिया । उन महर्षि के आश्रम में ही सीता के दो पुत्र हुए । उत्तरकाण्ड के ६०वें सर्ग में उल्लेख है कि जिस रात में मथुरा जाते हुए शत्रुघ्न वाल्मीकि महर्षि के आश्रम में जाकर रुके थे उसी रात में सीता ने दो बालकों को जन्म दिया । मुनिबालकों से समाचार पाकर मुनि ने वहाँ जाकर बालकों की राक्षसादि-विनाशिनी रक्षा की व्यवस्था की । कुश से ऋषि ने जिस बालक की रक्षा की व्यवस्था की उसका नाम कुश हुआ और लव से जिसका मार्जन किया उसका नाम लव हुआ । नागेश के अनुसार छिन्न कुशों का अग्रभाग कुश कहा जाता है एवं अधोभाग लव कहा जाता है । इसी तरह वाल्मीकि मुनि के आश्रम में ही पालित, पोषित एवं संस्कृत होकर उन दोनों बालकों कुश और लव ने मुनिवेष

अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २३७ में महर्षि वाल्मीकि के समीप में ही वेदादि शास्त्रों तथा धनुर्वेद आदि का अध्ययन किया। यह सब पूर्वापरप्रसङ्गों से सुतरां सिद्ध हो जाता है। राजा द्वारा त्यक्त सीता को अपने आश्रम में आवास देकर मुनि को सीता और उसके बालकों के सम्बन्ध में चिन्ता होनी स्वाभाविक ही थी। इस सबके लिए परमावश्यक था कि सीता के विशुद्ध चरित्र का प्रख्यापन हो, इस दृष्टि से ही ब्रह्मा के आदेशानुसार ऋषि ने ऋतम्भरा प्रज्ञा से सीता, राम, लक्ष्मण आदि के गुप्त और प्रकट हसित, भाषित, इङ्गित, चेष्टित आदि अतीत चरित्रों का साक्षात्कार कर रामायण का निर्माण किया (सर्ग ३,४)। वस्तुतः वह सीताचरित्र ही था, परन्तु एक पतिव्रता का चरित्र उसके पति के चरित्र से ही साङ्गोपाङ्ग सम्पन्न होता है, इसलिए वह रामचरित्र रामायण भी है। “काव्यं रामायणं कृत्स्नं सीतायाश्चरितं महत्। पौलस्त्यवधमित्येवं चकार चरितव्रतः॥” (वा० रा० १।४।७) रामचरित्र रामायण और सीताचरित्र के उस महाकाव्य का पौलस्त्यवध यह नाम रखा गया। सीताचरित्र होने से ही धीरोदात्त नायक राम रामायण के श्रवण में प्रवृत्त हुए थे। आत्मचरित्रश्रवण से तो धीरोदात्त नायक को संकोच ही होता है। सीता के निर्मल चरित्र का काव्य बन गया, परन्तु उसका प्रचार कैसे हो यह विचार मुनि के सामने उपस्थित हो ही रहा था उसी समय कुश और लव दोनों ने आकर मुनि का पाद-वन्दन किया। दोनों राजपुत्र हैं, आश्रमवासी हैं और उन्होंने वेदाध्ययन कर लिया है. अतः वेद के उपबृंहणार्थ मुनि ने उन दोनों बालकों को रामायण का अध्ययन कराया— “स तु मेधाविनौ दृष्ट्वा वेदेषु परिनिष्ठितौ। वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः॥” (वा० रा० १।४।६) सीता के निर्मल चरित्र के प्रख्यापन के लिए रामायण का प्रखर प्रचार अनिवार्य था, अतः प्रचार का ढङ्ग भी अत्यन्त आकर्षक होना आवश्यक था। रामायण पाठ्य होने के साथ ही उत्कृष्ट गेय भी था। कुश और लव दोनों गान्धर्वशास्त्र के भी तत्त्वज्ञ थे। साथ ही स्थान, मूर्च्छना आदि के भी विद्वान् थे और स्वर (मधुरकण्ठ) सम्पन्न थे एवं गन्धर्वों के समान अत्यन्त रूपवान् भी थे। उत्तम रूप एवं लक्षणों से युक्त तथा मधुरस्वरभाषी वे दोनों राम के पुत्र सूर्य-बिम्ब से उत्थित दो प्रतिबिम्बों के तुल्य ही राम के प्रतिबिम्ब जैसे ही लगते थे। उन दोनों धर्मज्ञ राजपुत्रों ने इस काव्य को वाचाविधेय (कण्ठस्थ) कर लिया। द्रुत, मध्य, विलम्ब तीनों प्रमाणों तथा षड्जादि सप्त स्वरों एवं वीणातन्त्रीलय के साथ इस महाकाव्य रामायण को ऋषियों की सभा में गाया। उनके गान को सुनकर सब मुनियों के नेत्र आनन्दाश्रु से पूर्ण हो गये। सभी साधु साधु कहते हुए गानकौशल और माधुर्य से विस्मित तथा प्रसन्न होकर प्रशंसा करने लगे। इस काव्य का वृत्त यद्यपि बहुत पहले का था तो भी लोकोत्तर काव्य के लोकोत्तर गान से सब प्रत्यक्षवत् प्रतीत होने लगा। उनके अति मधुर गान से प्रसन्न हो भिन्न-भिन्न मुनियों ने सुन्दर कलश, वल्कल वसन, कृष्णाजिन, यज्ञसूत्र, कमण्डलु, मौञ्जी, वृधी, कौपीन, कुठार, काषाय वस्त्र, चीर, जटाबन्धन काष्ठरज्जु, यज्ञ-भाण्ड आदि विभिन्न वस्तुएँ पुरस्कार के रूप में उन दोनों राजकुमारों को प्रदान कीं। उसी समय नैमिषारण्य में राम का अश्वमेध चल रहा था। देश-देशान्तर के सभी प्रतिष्ठित ब्रह्मर्षि, राजर्षि तथा अन्य प्रतिष्ठित व्यक्ति एकत्रित थे। महर्षि वाल्मीकि भी निमन्त्रित होकर वहाँ गये थे। कुश और लव के सर्वश्रुतिमनोहर रामायण के गान से सभी प्रभावित थे। उन विशिष्ट जनों तथा जन साधारण से भी कुश, लव की प्रशंसा सुनकर भरताग्रज राम ने उन्हें अपने भवन में बुलाकर उनका सम्मान किया और विशिष्ट जनों की महती

सभा में उन्हें इस काव्य के गान के लिए प्रेरित किया। तब कुश और लव ने विचित्र अर्थ और पदवाले उत्तम रामायण महाकाव्य का तन्त्रीलय के साथ अपने मधुर कण्ठों से सबके सर्व गात्र, श्रोत्र, मन और हृदयों को आह्लादित करते हुए गायन किया। सभासदों सहित उस समय राम भी सङ्गीत-श्रवण में दत्तचित्त हो गये। उक्त काव्यश्रवण से सीता और राम आदि के गुप्त एवं प्रकट दिव्य चरित्रों का स्फुट प्रकाश हुआ। सीता के प्रति कुछ लोगों के मन में उत्पन्न विविध संशय, विपर्यय आदि का समूल उन्मूलन हो गया; सीता का निर्मल चरित्र सबके हृदय में प्रकाशित हो गया। उत्तरकाण्ड के ९४वें सर्ग के प्रसङ्गानुसार राम ने अश्वमेध यज्ञ के प्रसङ्ग से महामुनियों, राजाओं तथा नैगमों, वैदिकों, पौराणिकों, शब्दविदों, वृद्धों, द्विजातियों तथा स्वरों के लक्षणज्ञों, उत्कृष्ट द्विजसत्तमों, लक्षणज्ञों, गान्धर्वतत्त्वज्ञों तथा पाद-अक्षर-समास-विदों, छन्दपरिनिष्ठित जनों, कलातत्त्वज्ञों, ज्योतिषविशेषज्ञों, क्रियाकल्पज्ञों, कार्यविशारदों, हेतूपचारकुशल जनों, चित्रकलानिपुण जनों, वृत्तिसूत्रज्ञों तथा नृत्य-गीतविशारदों आदि सब श्रेणी के विशेषज्ञों को निमन्त्रित कर उनकी महतो सभा में कुश और लव को रामायण का गान करने के लिए आमन्त्रित किया। कुश और लव के अतिमानुष मधुर गन्धर्व-स्वर से सभी श्रोता मन्त्र-मुग्ध हो गये। मुनिगण एवं पार्थिवगण बारम्बार चक्षु से पान करते हुए वे उन दोनों बालकों, कुश और लव को बारम्बार देखते हुए आपस में कह रहे थे कि ये दोनों इस तरह राम के तुल्य लगते हैं जैसे सूर्यविम्ब से दूसरा सूर्य-बिम्ब ही उदित हुआ हो। यदि ये दोनों बालक जटायुक्त और वल्कलधारी न होते तो राघवेन्द्र राम और इन दोनों बालकों में कोई भेद अवगत न होता — “जटिलौ यदि न स्यातां न वल्कलधरौ यदि। विशेषं नाधिगच्छामो गायतो राघवस्य च॥” (वा० रा० ७।९४।१४) उपर्युक्त सम्पूर्ण वक्तव्य से स्पष्ट है कि कुश और लव दोनों ही राम के पुत्र, राजकुमार थे न कि तथा- कथित कुशीलव नृत्यगीत-काव्योपजीवी जातिविशेष। उत्तरकाण्ड के ९५वें सर्ग में कहा गया है राम ने बहुत दिनों तक परम शुभ गीत मुनियों, राजाओं एवं सुग्रीव-हनुमान् वानर आदिकों के साथ सुना और उस गानप्रसङ्ग में ही कुश और लव को सीता पुत्र जान लिया— “तस्मिन् गीते तु विज्ञाय सीतापुत्रौ कुशीलवौ। तस्याः परिषदो मध्ये रामो वचनमब्रवीत्॥” (वा० रा० ७।९५।२) यदि बुल्के ने इन सब वचनों को ध्यान से पढ़ा होता तो निश्चय ही वे ऐसी विपरीत कल्पना नहीं कर सकते थे। अपने काल्पनिक मन्तव्य की रक्षा के लिए ही बुल्के ने इन सब सर्गों को प्रक्षेप कहा है। उपर्युक्त प्रकरणों से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि वाल्मीकिरामायण का निर्माणकाल राम का सिंहासनारूढ़ होने का काल ही था, क्योकि राम द्वारा किये गये अश्वमेध यज्ञ के अवसर पर ही कुश और लव द्वारा इसका गान हुआ था, अतः निश्चय के साथ कहा जा सकता है कि इसका निर्माणकाल ई० पू० दूसरी शती कदापि नहीं हो सकता। आश्चर्य तो यह है कि जिन प्रसङ्गों के आधार पर 'कुशीलव' शब्द को मान लेते हैं उन्हीं प्रसङ्गों से व्यक्त, उन्हीं से सम्बद्ध अन्य बातों को, कुश और लव का सीता-पुत्र या राम-पुत्र होना, राम-सभा में रामायण का सुना जाना आदि को, प्रक्षेप मान लेते हैं यही अर्ध-जरतीय न्याय है। इसी सर्ग में यह भी उल्लेख है कि उसी महापरिषद् में शुद्ध समाचारवाले दूतों को बुलाकर राम ने उनसे कहा “भगवान् बाल्मीकि के समीप जाकर यह कहो कि यदि सीता शुद्धसमाचारा हैं, वीतकल्मषा हैं, तो मुनि की अनुमति से आत्मशुद्धि को प्रमाणित करें; यदि मुनि की इच्छा हो तो उनके मनोगत भावों को जानकर बताओ। कल प्रातः समय जनकात्मजा मैथिली अपनी और मेरी शुद्धि के लिए सभा में सबके समक्ष शपथ करें।” उन दूतों ने

अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २३९ जाकर अमितप्रभ महात्मा वाल्मीकि से सब कुछ कहा। मुनि ने सब सुनकर और राम की इच्छा को जानकर कहा कि ठीक है जैसा राम कहते हैं वैसा ही होगा। सीता वैसा ही करेगी, क्योंकि स्त्री का परम दैवत पति ही होता है। राजदूतों ने आकर राम को मुनि का कथन सुनाया। राम प्रसन्न हुए और एकत्रित ऋषियों और राजाओं से उन्होंने कहा, शिष्यों सहित सभी ऋषि तथा अपने परिकरों सहित नृपतिगण तथा और भी जो चाहते हों सभी आकर सीता का शपथ लेना (पातिव्रत्य तथा शुद्धि का प्रमाण, प्रत्यय) देखें। महात्मा राघव के उक्त वचन सुनकर महर्षियों तथा राजाओं में महान् साधुवाद हुआ। प्रभावशाली महान् राजा तथा मुनिश्रेष्ठगण राघव की प्रशंसा करने लगे। इसी काण्ड के ९६ वें सर्ग के उल्लेखात्नुसार रात के बीतते ही राम ने वसिष्ठ, विश्वामित्र, वामदेव, जाबालि, कश्यप, दीर्घतमा, दुर्वासा, पुलस्त्य, शक्ति, भार्गव, दीर्घायु मार्कण्डेय, महायशा मौद्गल्य, गर्ग, च्यवन, शतानन्द, भरद्वाज, अग्निपुत्र सुप्रभ, नारद, पर्वत, गौतम आदि आदि मुनिवरों को बुलवाया और वे सब आये। महावीर्य राक्षस तथा महाबल वानर एवं अन्य सभी लोग कौतूहलवश आये। सहस्रों क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र तथा नाना देशों के ब्राह्मण सीता का शपथ देखने के लिये आये। सबके आने की बात जानकर सीता के साथ मुनिवर वाल्मीकि वहाँ आये। ऋषि के पीछे-पीछे राम को मन में रखकर अवाङ्मुखी कृताञ्जलि, बाष्पकलायुक्त सीता आयीं। ब्रह्मा का अनुगमन करती हुई श्रुति के समान मुनि के पीछे-पीछे आती हुई सीता को देखकर जन-समूह में महान् साधुवाद हुआ। सीता और राम के जन्म से लेकर होनेवाले विशाल दुःख-परम्परा का चिन्तन करके सभी के अन्तःकरण क्षुब्ध हो उठे। कोई राम का और कोई सीता का साधुवाद करने लगे। कोई प्रेक्षक दोनों का साधुवाद करने लगे। उस समय उस महान् जनौघ में सीता को साथ लिए हुए वाल्मीकि बोले, "दाशरथे ! सीता सुव्रता एवं धर्मचारिणी है; अपवादभय से आप द्वारा मेरे आश्रम के समीप परित्यक्ता होकर मेरे आश्रम में रही, सीता आप के समक्ष अपने सतीत्व का प्रमाण, प्रत्यय देगी। ये दोनों बालक, कुश और लव जानकी में उत्पन्न तुम्हारे पुत्र हैं। मैं प्रचेता का दसवाँ पुत्र हूँ—मैंने कभी अनृत वाक्य कहा हो तो इसका मुझे स्मरण नहीं होता; बहुत वर्षों तक मैंने तपश्चर्या की है; यदि मैथिली दुष्टा हो तो मैं उन तपश्चर्याओं का फल न पाऊँ । मनसा, वाचा और कर्मणा मुझसे कभी किल्बिष नहीं हुआ। यदि मैथिली निष्पाप है तो मैं उसका फल भोगूँगा, पञ्च ज्ञानन्द्रियों सहित मन से चिन्तन करके सीता को अत्यन्तशुद्धसमाचार एवं निष्पाप जानकर ही मैंने वन में उसे अपने आश्रम में रखा है। यद्यपि आप भी सीता को शुद्ध मानते हैं तो भी सीता प्रत्यय देगी। सर्ग ९७ में उल्लेख है; राम ने कहा ब्रह्मन्, आप के अकल्मष वचनों में मुझे पूर्ण विश्वास है। देवताओं के सन्निधान में जानकी ने पहले भी, लङ्का में, प्रत्यय दिया है तो भी लोकापवाद के भय से मैंने जानकी को निष्पाप जानते हुए भी उनका त्याग किया था। ये कुश और लव मेरे पुत्र हैं, यह भी मैं जानता हूँ। मेरा आशय जानकर सीता-शपथ के प्रसङ्ग में सभी देवगण आये हैं। लोकपितामह ब्रह्मा को आगे कर आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वे- देव, मरुद्गण तथा साध्य देवता एवं सभी परम महर्षि, नाग, सुपर्ण और सिद्ध सब आये हैं। राघव ने सबको देखकर कहा, "ऋषि के निष्कल्मष वाक्यों में हमें सीता के प्रति पूर्ण प्रत्यय (विश्वास) है और संसार में परम पवित्र सीता में मेरी स्थिर प्रीति है। उस समय दिव्य, शीतल, मन्द, सुगन्ध वायु जनौघ को आह्लादित करने लगा। सभी राष्ट्रों से आये हुए मानवों ने सत्ययुगीय उस अद्भुत शीतल, मन्द, सुगन्ध दिव्य वायु का अनुभव किया। काषायवसना सीता ने चतुर्दश भुवनस्थ जनसमुदाय को देखकर अवाङ्मुखी तथा अधोदृष्टि प्राञ्जलि-बद्ध होकर कहा मैं राघव से अन्य किसी का कभी मन से भी चिन्तन नहीं करती, यदि यह सत्य है तो माधवी धरित्री देवी मुझे अवकाश प्रदान करे। इस तरह सीता शपथ कर रही थी कि एक अद्भुतचमत्कार हुआ भूतल से एक अत्यन्त उत्तम दिव्य सिंहासन प्रकट हुआ। जिसे अमित विक्रमवाले दिव्य रत्नभूषित नागों ने अपने फणों पर धारण कर रखा

२४० रामायणमीमांसा सप्तम था। धरणी देवी उसी अलौकिक दिव्य सिंहासन पर स्वागत और अभिनन्दन पूर्वक मैथिली को अपनी बाहुओं से ग्रहण कर दिव्य आसन पर बैठाती है। उस दिव्य आसन पर समासीन होकर रसातल में प्रविष्ट होती हुई सीता पर देवताओं द्वारा महान् जय-जयकार तथा साधुकार के साथ अविच्छिन्न रूप से मुक्त दिव्य पुष्प-वृष्टि हुई। “तथा शपन्त्यां वैदेह्यां प्रादुरासीत् तदद्भुतम् । भूतलादुत्थितं दिव्यं सिंहासनमनुत्तमम् ॥ ध्रियमाणं शिरोभिस्तु नागैरमितविक्रमैः । दिव्यं दिव्येन वपुषा दिव्यरत्नविभूषितैः ॥ तस्मिंस्तु धरणी देवी बाहुभ्यां गृह्य मैथिलीम् । स्वागतेनाभिनन्द्यैनामासने चोपवेशयत् ॥ तामासनगतां दृष्ट्वा प्रविशन्तीं रसातलम् । पुष्पवृष्टिरविच्छिन्ना दिव्या सीतामवाकिरत् ॥ साधुकारश्च सुमहान् देवानां सहसोत्थितः । साधु वै साध्विति सीते यस्यास्ते शीलमीदृशम् ॥” (वा० रा० ७।९६।१७-२१) “सीते ! साधु—तुम्हारा शील लोकोत्तर है” इस प्रकार अन्तरिक्षस्थ देवताओं की बहुविध वाणियां प्रकट हुई—यज्ञवाट के सभी राजागण विस्मित हुए। अन्तरिक्ष तथा भूमि के सभी स्थावर, जङ्गम तथा महाकाय दानव एवं पाताल के पन्नगेन्द्र विस्मयान्वित होकर, कोई प्रहृष्ट होकर ‘जय जय’ एवं ‘साधु साधु’ नाद करने लगे; कोई ध्यानपरायण हो गये। कोई राम को और कोई सीता को देखते हुए विसंज्ञ हो रहे थे। सीता के रसातल प्रवेश से वानर, राक्षस, मानव सभी संतप्त हुए । श्रीराम अत्यन्त संतप्त हुए । ब्रह्माजी देवताओं के साथ आकर राम और सीता के दिव्य वैष्णव माहात्म्य का वर्णन करके सान्त्वना देते हैं। पद्मपुराण के उल्लेखानुसार सीता के लिए रसातल से गरुड़जी प्रकट हुए और अपनी पीठ पर रत्नमय सिंहासन को लेकर आये। उसपर धरणी देवी विराजमान थीं। उन्होंने मैथिली का स्वागत और अभिनन्दन कर उन्हें सिंहासन पर बैठाया। सनातनी सीता देवादि‍कों से पूज्यमान होकर योगिगम्य सनातन परम धाम को चली गयीं— “नानारत्नमयं पीठं पृष्ठे कृत्वा खगेश्वरः । रसातलादाविरभूद्विस्मयं जनयन्नृणाम् ॥ तस्मिन् पीठे महादेवीं हस्ताभ्यां गृह्य मैथिलीम् । स्वागतेनाभिनन्द्येमां संनिवेश्य तिरोदधे ॥ सा च दिव्याप्सरोभिस्तु पूज्यमाना सनातनी । वैनतेयं समारुह्य अचिरादिपथाद् रमा ॥ दासीगणैः पूर्वभवैः संवृता जगदीश्वरी । संप्राप्ता परमं धाम योगिगम्यं सनातनम् ॥” रामाभिरामीटीकायां समुद्धृताः श्लोकाः । पूर्वापर प्रसङ्ग का भलीभांति विचार करने पर स्पष्टतः विदित होता है कि वाल्मीकि महर्षि श्रीराम के समकालिक ही हैं। सीता के निर्मल चरित्र का वर्णन और प्रचार कर वे मिथ्या लोकापवाद का समूल उन्मूलन ही करने में सफल हुए हैं। उस दृष्टि से राम ने देवताओं, ऋषियों, राजाओं तथा नाना देशागत मानवों की सभा में रामायण का सबके साथ ही श्रवण किया और रामायण द्वारा वर्णित कथावस्तु की यथार्थता और सीता के वास्तविक

अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २४१ जीवन-वृत्तान्त का स्वयं अनुभव किया और सबको वैसा ही अनुभव करने का अवसर दिया। सीता के शपथ के प्रभाव से दिव्य सिंहासन के आविर्भाव आदि से तो उसकी सत्यता और भी निखर उठी। लङ्का में सीता की अग्नि-परीक्षा हो चुकी थी। ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, वायु, अग्नि आदि देवताओं, वानरों, राक्षसों ने वहाँ का चमत्कार देखा था, परन्तु चतुर्दश भुवन के सभी प्राणी और देश-देशान्तर के सभी मानवों ने वह सब नहीं देखा था। राम द्वारा उसका प्रचार कराकर मिथ्या-लोकापवाद मिटाने का प्रयत्न किया जा सकता था, परन्तु विप्रतिपन्न व्यक्ति उसे राजकीय प्रचार (प्रोपगेण्डा) कहकर महत्त्वहीन बता सकते थे। परन्तु एक अरण्यवासी, वल्कलधारी, कन्दमूलफलाशी, आप्तकाम, वीतराग महर्षि के अमर काव्य के सम्बन्ध में किसी को कुछ कहने का साहस नहीं हो सकता था। महर्षि का राम से कोई भी आर्थिक सम्बन्ध नहीं था। रामायण के प्रचारक कुश और लव भी कोई कथाकाव्योपजीवी साधारण व्यक्ति नहीं थे। वे दोनों मुनिवेष राजकुमार, श्रीराम के ही पुत्र थे। उनमें वक्ता के सर्वोत्तम गुण विद्यमान थे। वक्ता में उत्तम रूप, सौन्दर्य, कण्ठमाधुर्य, सौस्वर्य तथा वेदादि शास्त्र-विज्ञान के साथ ही साथ गान्धर्व कला-कौशल भी आवश्यक होता है। उपर्युक्त सब गुण कुश और लव में थे। उनमें राम के समान ही लोकोत्तर सुन्दरता थी, वे वेद-शास्त्रों में पारङ्गत, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद आदि में पूर्ण निष्णात थे। उनमें उत्तम कण्ठ-माधुर्य, सौस्वर्य एवं सङ्गीतकौशल विद्यमान था। वीतराग ऋषिमुनि भी उनके रामायण-गान से मुग्ध हो गये। इतने पर भी यदि वक्ता सस्पृह (लोभी) हो तो महान् से महान् गुण भी फीके पड़ जाते हैं। उनका प्रभाव महत्त्वहीन हो जाता है। अतः महर्षि ने उन्हें दिव्य, मधुर फलमूल खिलाकर कह दिया था कि अपने लोग कन्दमूलफलाशी वनवासी हैं, हम लोगों को धन से कोई प्रयोजन नहीं; अतः किसी के देने पर भी कुछ लेना नहीं। पर जो सादर सुनना चाहें उन्हें सुनाना। प्रथम दिन की कथा श्रवण कर ही राम ने प्रभूत सुवर्णराशि देने का प्रयत्न किया, परन्तु कुश-लव ने उसको स्वीकार नहीं किया। ये सब ऐसे गुण थे जिनका प्रभाव अनिवार्यरूप से सब पर पड़ा। रामायण द्वारा वर्णित कथावस्तु इतनी सत्य थी कि अयोध्या के वृद्ध लोग उसे सुनकर चिरवृत्त वृत्तान्त को प्रत्यक्ष सा अनुभव करने लगे— “चिरनिर्वृत्तमप्येतत् प्रत्यक्षमिव दर्शितम् । प्रविश्य तावुभौ सुष्ठु तथाभावमगायताम् ॥ सहितौ मधुरं रक्तं सम्पन्नं स्वरसम्पदा ।” (वा० रा० १।४।१८) नैमिषारण्य में श्रीराम का अश्वमेध यज्ञ हो रहा था। अयोध्यावासी नागरिक अधिक मात्रा में आये हुए थे। अयोध्याकाण्ड की घटनाओं में उन्हें प्रत्यक्ष अनुभूति थी। वे लोग प्रथमतः तो कुश-लव के त्याग, निःस्पृहता, दिव्य सौन्दर्य तथा तन्त्रीवादनपूर्वक मधुर सुस्वर सङ्गीत पर मुग्ध हुए। फिर, स्वानुभूत कथावस्तु का यथावत् वर्णन सुनकर आश्चर्यमग्न होकर चित्रलिखित से स्तब्ध रह गये। चिरप्रवृत्त वृत्तान्त का यथावत् वर्णन रामायण में सुनकर उन्हें आश्चर्य हुआ। वाल्मीकिरामायण आर्ष कथा होते हुए आर्ष इतिहास भी है। सीता-चरित्र की स्वच्छता की अभिव्यक्ति उसका प्रथम उद्देश्य था, अतः उसमें अप्रिय सत्य का भी स्पष्ट उल्लेख हुआ है। राजा दशरथ का भरत के प्रति शङ्का करना तथा कौशल्या का मातुल-कुल से प्रत्यागत भरत के प्रति व्यवहार अप्रिय सत्य की अभिव्यक्ति ही है। स्वानुभूत घटनाओं के यथावत् वर्णन से अत्यन्त प्रभावित अयोध्यावासियों के मन में इस महाकाव्य के रचयिता के सम्बन्ध में भी जिज्ञासा होना स्वाभाविक ही था। कोई वीतराग निःस्पृह वनवासी महर्षि वाल्मीकि उसके रचयिता हैं यह जानकर और अधिक विश्वास हुआ। स्वभावतः राम के वनवासकालिक वृत्तान्तों और सीताहरण, सुग्रीव-मैत्री, बालि-वध, सेतु-बन्धन, रावण-सीता-संवाद आदि के सम्बन्ध की सत्यता जानने की भी ३१

२४२ रामायणमीमांसा सप्तम

उत्सुकता होनी स्वाभाविक थी। कुछ लोग जिनकी संख्या नगण्य ही थी सीता के प्रति शङ्का भी करते थे । स्वभावतः निःस्पृह मुनि द्वारा निर्मित तथा निःस्पृह वक्ता द्वारा वर्ण्यमान रामायण से अरण्य एवं लङ्का की घटनाओं के प्रति शङ्का की निवृत्ति सम्भव हो सकती थी । इस तरह विविध दृष्टियों तथा भावनाओं से रामचरित्र की ओर लोगों का आकर्षण हुआ । तुलसीदास के अनुसार नीति, प्रीति, परमार्थ तथा स्वार्थ के सम्बन्ध में राम से अधिक कोई नहीं जान सकता है— “नीति प्रीति परमारथ स्वारथ कोउ न राम सम जान जथारथ ।” ( रा० मा० २।२५३।३ ) जनापवाद सुनकर राम विचलित नहीं हुए । वे जानते थे कि दण्ड देकर जनता का मुख बन्द नहीं किया जा सकता । दो एक मुख बन्द कर देने पर वही आवाज सैकड़ों मुखों से निकलने लगती है; अतः उन्होंने बहुजन- हिताय बहुजनसुखाय ही नहीं किन्तु सर्वजनहिताय सर्वजनसुखाय का ही सिद्धान्त अपनाकर स्वयं अपने विरुद्ध अल्पमत का भी सम्मान कर परम विशुद्ध जानते हुए भी सीता को वनवास