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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 143

१३२ झाँसी की रानी उसी दिन जो खरीता राजा ने एलिस के हाथ में दिया था उसका स्मरण दिलाया और उसको सूचित किया कि पोलिटिकल एजेंट मेजर मालकम के पास भी एक खरीता भेज दिया है—केवल एक बात उसमें विशेष है कि सन् १८१७ में रामचन्द्रराव के साथ जो सन्धि कम्पनी सरकार की हुई थी उसमे झाँसी राज्य दवाम के लिये चिरकाल के लिये, शिवराम भाऊ के वंशजो के अधिकार में रहने की बात लिख दी गई थी । उस लिखे हुये वचन का पालन किया जाना चाहिये । एलिस राजा की हालत देखकर उनको बातचीत करने से रोकता रहा । वे बोलने का प्रयत्न करते-करते फिर अचेत हो गये । उन्हे बातचीत करते-करते बीच में बेहोशी आ आ जाती थी । एलिस ने डाक्टर एलन की औषधि खाने के लिये अनुरोध किया । वह उनके पास गया । परन्तु क्लब में शराब पी थी । मुँह से गन्ध आरही थी । राजा को बहुत अवहेलना हुई । उसने सोचा अहिन्दू की छुई हुई दवा न खायेगे । प्रस्ताव किया, ‘सरकार इसमें गङ्गाजल मिला दिया जावेगा । दवा पवित्र हो जायगी, आप पिये शीघ्र आराम मिलेगा ।’ राजा की आकृति से ऐसा जान पडा मानों उन्होने स्वीकार कर लिया हो । वे शायद शराब की बू से छुटकारा पाना चाहते थे । कैसा भी कुसस्कृत हिन्दू हो मरने के समय कैसे भी सुसंस्कृत हिन्दू या अहिन्दू को शराब की बू फैलाते हुये पसन्द न करेगा । एलिस ने तुरन्त एक ब्राह्मण के हाथ दवा भेजी । राजा ने छूने तक से इनकार कर दिया । एक दिन और पीडा में कटने को था । उस दिन (२० नवम्बर को) दुपहरी में कुछ नीद आई । ४ बजे आँख खुली । महल के सामने झासी की जनता कुशल-समाचार के लिये व्याकुल खडी थी । राजा गङ्गाधरराव को पल पल पर बेहोशी आ रही थी । ज्यो त्यो करके वह दिन कटा ।