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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

१३२ झाँसी की रानी उसी दिन जो खरीता राजा ने एलिस के हाथ में दिया था उसका स्मरण दिलाया और उसको सूचित किया कि पोलिटिकल एजेंट मेजर मालकम के पास भी एक खरीता भेज दिया है—केवल एक बात उसमें विशेष है कि सन् १८१७ में रामचन्द्रराव के साथ जो सन्धि कम्पनी सरकार की हुई थी उसमे झाँसी राज्य दवाम के लिये चिरकाल के लिये, शिवराम भाऊ के वंशजो के अधिकार में रहने की बात लिख दी गई थी । उस लिखे हुये वचन का पालन किया जाना चाहिये । एलिस राजा की हालत देखकर उनको बातचीत करने से रोकता रहा । वे बोलने का प्रयत्न करते-करते फिर अचेत हो गये । उन्हे बातचीत करते-करते बीच में बेहोशी आ आ जाती थी । एलिस ने डाक्टर एलन की औषधि खाने के लिये अनुरोध किया । वह उनके पास गया । परन्तु क्लब में शराब पी थी । मुँह से गन्ध आरही थी । राजा को बहुत अवहेलना हुई । उसने सोचा अहिन्दू की छुई हुई दवा न खायेगे । प्रस्ताव किया, ‘सरकार इसमें गङ्गाजल मिला दिया जावेगा । दवा पवित्र हो जायगी, आप पिये शीघ्र आराम मिलेगा ।’ राजा की आकृति से ऐसा जान पडा मानों उन्होने स्वीकार कर लिया हो । वे शायद शराब की बू से छुटकारा पाना चाहते थे । कैसा भी कुसस्कृत हिन्दू हो मरने के समय कैसे भी सुसंस्कृत हिन्दू या अहिन्दू को शराब की बू फैलाते हुये पसन्द न करेगा । एलिस ने तुरन्त एक ब्राह्मण के हाथ दवा भेजी । राजा ने छूने तक से इनकार कर दिया । एक दिन और पीडा में कटने को था । उस दिन (२० नवम्बर को) दुपहरी में कुछ नीद आई । ४ बजे आँख खुली । महल के सामने झासी की जनता कुशल-समाचार के लिये व्याकुल खडी थी । राजा गङ्गाधरराव को पल पल पर बेहोशी आ रही थी । ज्यो त्यो करके वह दिन कटा ।

लक्ष्मीबाई १३३ दूसरे दिन उनकी अवस्था असाध्य हो गई। अन्त में मुँह से केवल यह निकला, गंगाजल।' उनको तुरन्त गङ्गाजल दिया गया। एक क्षण के लिये उनको ऐसा जान पड़ा मानो रोगमुक्त हो गये हो। तत्क्षण सचेत होकर बोले, 'मैने बहुत अपराध किये हैं • बहुतो को सताया है...सब क्षमा करे...ओमहरि...।' कुछ क्षण उपरान्त राजा का देहान्त हो गया। महल में हाहाकार मच गया। जिस रानी को कभी किसी ने विह्वल नही देखा था, वह करुणा के बाध तोडे जा रही थी। मोरोपन्त और नाना भोपटकर ने क्रन्दन करते हुये दामोदरराव को रानी की झोली में रख दिया। लक्ष्मी दरवाजे बाहर, लक्ष्मी ताल के किनारे गङ्गाधरराव के शव का दाह धूमधाम के साथ किया गया। स्मशान भूमि पर एलिस और मार्टिन भी उपस्थित थे। दूर रेग्यूलर केवलरी के सिपाही भी। सब काले बिल्ले बाधे हुये। एलिस और मार्टिन कुतूहल के साथ अन्तिम क्रिया-कर्म देख रहे थे और हिन्दुस्थानी सिपाही, रुदन करती हुई झासी की जनता के साथ, रुद्ध-कण्ठ थे। एलिस ने २० नवम्बर सन् १८५३ को राजा गङ्गाधरराव का एक दिन पहले का दिया हुआ खरीता पोलिटिकल एजेंट कैथा*, के पास भेज दिया था। २१ नवम्बर को राजा गङ्गाधरराव का देहान्त हुआ। यह समाचार भी उसने अविलम्ब पहुँचा दिया। *उस समय बुन्देलखण्ड और रीवा का पोलिटिकल एजेंट कैथा जिला हमीरपुर में रहता था।

१३४ झांसी की रानी [ २७ ] एलिस का भेजा हुआ राजा गङ्गाधरराव का १६ नवम्बर का खरीता और उनके देहान्त का समाचार मालकम के पास जैसे ही कैथा पहुंचा उसने गवर्नर जनरल को अपनी चिट्ठी अविलम्ब (२५ नवम्बर के दिन) भेज दी । चिट्ठी के साथ एलिस का भेजा हुआ खरीता और गङ्गाधरराव का वह खरीता भी, जो उन्होने सीधा मालकम के पास पहुंचवाया था, भेज दिया । मालकम की चिट्ठी का सार यह था — 'झांसी के राजा को बिना कम्पनी सरकार की अनुमति लिये, गोद लेने का अधिकार नही है । रानी योग्य और लोकप्रिय हैं, परन्तु कम्पनी का शासन जन-हित की दृष्टि से ज्यादा अच्छा होगा । ऐसी परिस्थिति में रानी को पाच सहस्र मासिक वृत्ति, निजी सम्पत्ति और नगर का महल दे दिया जावे ।' इस प्रकार की चिट्ठी के भेजने के उपरान्त ही मालकम ने झांसी के बन्दोवस्त का प्रयास शुरू कर दिया और अपना फौज फाटा बढा दिया । इधर झांसी दरबार के लोगो का विश्वास था कि दत्तक पुत्र के नाम पर राज्य चलेगा और वे दामोदरराव के नाम पर शासन प्रबन्ध करने भी लगे । उन्नीसवी शताब्दि के आरम्भ काल में जब कम्पनी का राज्य जल्दी जल्दी बढा तब वह अपनी नीति और हथियार की विजय के बोझ से लदी सी जा रही थी और समय समय पर कम्पनी के साझीदारों ने विचार प्रकट किया था कि विजय और इलाके की सीमा बढाने की योजनायें घृणास्पद हैं । और ब्रिटिश जाति की इच्छा, प्रतिष्ठा और नीति के प्रतिकूल हैं । असल बात यह थी कि कही ऐसा न हो कि मुफ्त में आया हुआ इतना माल किसी अदृष्ट गड्ढे मे चला जावे । इन योजनाओ का सही रूप डलहौजी था उसकी नीति में कुछ भी लगा-लिपटा हुआ न था । उसका वक्तव्य स्पष्ट था ।

लक्ष्मीबाई १३५ 'हम किसी भी मौके को चूकने नही देना चाहते । हमारे इलाको के बीच बीच में ये जो छोटी छोटी रियासते हैं, काफी खिझलाहट का कारण है । इनको अपने हाथ में कर लेने से खजाने मे रुपया बढेगा और हमारी शासन प्रणाली से इन रजवाडो की जनता को लाभ ही लाभ प्राप्त होगा ।' जिस समय खरीतो सहित मालकम की चिट्ठी कलकत्ता पहुची डलहौजी अवध की ओर दौरे पर गया हुआ था । चार पाच महीने तक कोई उत्तर नही आया ।

१३६ झांसी की रानी [ २८ ] जिस दिन गंगाधरराव का देहान्त हुआ, लक्ष्मीबाई १८ वर्ष की थी । इस दुर्घटना का उनके मन और तन पर जो आघात हुआ वह ऐसा था, जैसे कमल को तुषार मार गया हो । परन्तु रानी के मन में एक भावना थी, एक लगन थी, जो उनको जीवित रखे थी । वह छुटपन के खिलवाड़ में प्रकट हो हो जाती थी । इस अवस्था में वह उनके मन के किस कोने में पड़ी हुई थी, इसको बहुत ही कम लोग जानते थे । जो जानते थे, उनमें से एक तात्या टोपे था । दूसरा नाना घोडपन्त । राजा गंगाधरराव के फेरे के लिये बिठूर से नाना घोडपन्त, अपने दोनों भाईयो सहित आया । तात्या भी साथ था । वे सब जवान हो गये थे । पैन्शन के ज़ब्त हो जाने के कारण सतप्त थे । और रोष भरे । गंगाधर- राव के देहान्त के कारण उनको बडी ठेस लगी । जालौन का राज्य समाप्त हो चुका था । एक महाराष्ट्र की गद्दी झांसी की बची थी । उनको भय था कि यह भी विलीन होने जा रही है । अत बाजीराव द्वितीय विठूर में बैठे बैठे, शुरू ज़माने में, जिस स्वराज्य स्वप्न की कल्पनायें उपस्थित किया करते थे और जिनसे इनका तथा लक्ष्मीबाई का बाल्यकाल पाला गया था, वह केवल दुस्वप्न सा अवगत होने लगा था । रानी किले वाले महल में ही रहती थी । वही उनकी सहेलिया और सिपाही, प्यादे भी । नीचे का महल, हाथी खाना, सेना, घोड़े हथियार इत्यादि सब हाथ में थे । नगर का शासनसूत्र भी अधिकार में था । राज्य की माल दीवानी भी उनके मन्त्रियों के हाथ में थी, परन्तु कम्पनी सरकार झांसी की छावनी में अपनी सेना और तोपे बढाने में व्यस्त थी । इससे मन में कुछ खुटका उत्पन्न होता था । शोक समवेदना के उपरान्त नाना के दोनो भाई विठूर चले गये । नाना और तात्या रह गये ।

लक्ष्मीबाई १३७ विकट ठंड थी। ठिठुरा देने वाली। दीन दरिद्रो के दात मे दात बजाने वाली। उस पर सन्ध्या से ही बादल घिर आये। आधी चल उठी और पानी बरस पड़ा। नाना और तात्या रानी से बातचीत करने सध्या के पहले ही किले के महल में गये। भोजन के उपरान्त बातचीत होना थी और फिर डेरे को लौटना था। परन्तु ऋतु की कठोरता के कारण उनके विश्राम का वही प्रबन्ध करवा दिया गया। दीवान खास में बैठक हुई। सुन्दर, मुन्दर, और काशीबाई भी रानी के साथ थी। रानी का मुख दुर्बल हो जाने के कारण जरा लम्बा जान पडता था। तो भी उस सतेज सौन्दर्य के आतंक मे वही आदर उत्पन्न करने वाला ओज था। विशाल आखो की ज्योति और भी ज्वलन्त थी। रानी कोई आभूषण नही पहिने थी—केवल गले में मोतियो की एक माला और हाथ में हीरे की एक अगूठी। श्वेत साडी पर एक मोटा श्वेत दुशाला ओढे थी। सहेलिया भी जेवरो का त्याग करना चाहती थी, परन्तु रानी के आग्रह से उन्होने ऐसा नही कर पाया था। रानी—बुन्देलखण्ड के रजवाडे बुझे हुये दीपक हैं। उनमें तेल है, परन्तु लौ नही। नाना—'क्या उनमें लौ पैदा नही की जा सकती ?' रानी— कह नही सकती। तुमने ढूंढ खोज की ? मैं तो बाहर आने जाने से विवश रही हूँ, और हूँ।' तात्या—'मैं यो ही घूमा फिरा हूँ। विशेष तौर पर यहा के किसी राजा से प्रसग नही छेड़ा। परन्तु वातावरण बिलकुल ठस जान पडा। राजाओ को अपने सरदारो और प्रजा से प्रणाम लेने मे सुख की इति अनुभव होती है। हास विलास और सुरापान में मस्त रहते हैं।' रानी—'वीरसिंहदेव, छत्रसाल और दलपति के बुन्देलखण्ड का हाल कुछ और होना चाहिये था।' नाना—'लखनऊ और दिल्ली का हाल कुछ अच्छा है।'

१३८ झांसी की रानी तात्या—'बहुत दिन हुए, जब मैं रानी साहब को लखनऊ, दिल्ली की परिस्थिति सुना गया था।' रानी—'तुम लोग मुझसे रानी साहब मत कहा करो। अच्छा नही लगता।' 'तात्या—'बाईसाहब कहूँगा।' नाना—'दिल्ली का हाल मै सुनाता हू। बादशाह वृद्ध है। अपनी स्थिति से बहुत दुखी है। मन के महाकष्ट को कविता में होकर घटाता रहता है। उसके राजकुमार कुछ होनहार जान पडते हैं, परन्तु दिल्ली के राजकु‌मारो में जिस आयु में प्राय घुन लग जाता है कदाचित इनको भी लग जावेगा।' रानी—'ग्वालियर ?' नाना—'राजा का अभी लडकपन है। अङ्गरेज प्रवन्ध कर रहे हैं।' रानी—'इन्दौर ?' तात्या—'इन्दौर मै गया था। वहा का तो कचूमर ही निकल गया है।' रानी—'हैदराबाद ?' तात्या—'वहा नही गया। परन्तु इतना निर्विवाद समझिए कि हैदराबाद अङ्गरेजो का परम भक्त है। जनता अपने साथ है।' रानी—'पजाब की सिक्ख रियासते ?' नाना—'वहा मैं कही कही गया। सिक्खो में अङ्गरेजो को पछाडने की शक्ति होते हुए भी, फूट इतनी विकट है और राजा इतने स्वार्थान्ध हैं कि अङ्गरेज उस ओर से बिलकुल निश्चिन्त रह सकते हैं।' रानी—'और झाँसी में तो अब कुछ है ही नही। जो कुछ है भी सभव है कि, हाथ में न रहे।' नाना—'झाँसी में ही तो हम लोगों का सब कुछ है। मनू—बाई साहब, झाँसी ही तो हम लोगो की एक आशा है।' लक्ष्मीबाई के फीके होठो पर वही विलक्षण मुस्कराहट क्षीण रूप में आई।

लक्ष्मीबाई १३६ बोली, 'क्या आशा है ?' तात्या ने कहा, 'दामोदरराव की गोद स्वीकार की जावेगी, ऐसा विश्वास है । एलिस ने गोलमोल अवश्य लिखा है, परन्तु कलकत्ते में अपने कुछ मित्र हैं । वे लोग कुछ सहायता करेंगे । रानी ने कहा, 'एलिस, मालकम सब एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं । ये लोग अपने लाट की नेत्रकोर के संकेत पर चलते हैं । मैने यहां से पूरनचन्द बंगाली बाबू को कलकत्ते भेजा है । वह बहुत अङ्गरेजी पढ़ा है । लाट से स्वयं मिलेगा और हमारी बात को समझाएगा । क्या कम्पनी सरकार का लाट हमारे इतने बड़े सन्धिपत्र को समूचा निगल जायगा ?' तात्या ने सहेलियो की ओर देखा । रानी समझ गईं । बोली, 'ये तीनो मेरी अत्यन्त विश्वासपात्र हैं । बिना किसी हिचक के बात किये जाओ ।' नाना ने कहा, 'मुझको मालूम है । ये मराठा हैं ।' 'झांसी की लगभग सभी स्त्रियो का विश्वास किया जा सकता है ।' रानी बोली, 'ये तीनो तो स्त्रियो की मानो पराग हैं ।' नाना ने कहा, 'बाईसाहब, यह लाट और इसके भाई बन्द 'यावच्चन्द्र दिवाकरौ' वाली सन्धि को समूचा ही पचा गये हैं । झासी वाली सन्धि में न तो दिवाकर की सौगन्ध है और न चन्द्रमा की । ये लोग किसी चीज को पवित्र नही समझते । इनकी लिखतम का, इनकी बात का, कोई भरोसा नही । हमारी पेंशन के छीनने के समय कहा था तीस बत्तीस साल में आठ लाख रुपया साल के हिसाब से तीन करोड रुपया बैठता है । वह सब कहा डाला ? इनका विश्वास नही करना चाहिए ।' रानी ने वैसे ही मुस्करा कर पूछा, 'क्या ये लोग सीधे साधे गणित को भी धोखा देते हैं ?' नाना जरा हँसा ।

१४० झांसी की रानी

तात्या ने उत्तर दिया, बाईसाहब ये लोग अपने स्वार्थ पर अचलरूप से डटे रहते हैं। जब तक स्वार्थ पर ठोकर लगने का अन्देशा नही रहता तब तक हरिश्चन्द्र और युधिष्ठिर का सा बर्ताव करते हैं, परन्तु जहा देखते हैं कि स्वार्थ को धक्का लग जावेगा, तुरन्त पैंतरा बदल देते हैं। और इतने धूर्त हैं कि इनमे से कुछ न्याय करने करवाने का ढोंग बनाते हैं और दूसरे उसी ढोंग की ओट में स्वार्थ की सिद्धि करते हैं। जैसे, हेस्टिङ्गस ने अवध की बेगमो को लूटा। कुछ अंग्रेजो ने उस पर मुकदमा चलाया। बाकी ने इनाम देकर उसको छोड़ दिया। इधर बिचारा नन्दकुमार बंगाली फासी पर चढ़ा दिया गया।' रानी ने प्रश्न किया, 'लखनऊ का अब क्या हाल है ?' नाना ने उत्तर दिया, 'पहले का हाल तात्या बतला गया था। अब तो वहा शून्य है। जनता निस्सन्देह जीवट वाली है।' रानी ने ज़रा सोचकर कहा, 'मैं इन सब बातो को सुनकर इस निष्कर्ष पर पहुची हूं, कि जनता के चित्त का पता अभी पूरा नही लगाया गया। जनता असली शक्ति है। मुझको विश्वास है कि वह अक्षय है। छत्रपति ने जनता के भरोसे ही इतने बड़े दिल्ली सम्राट को ललकारा था। राजाओ के भरोसे नही। मावले, कुणभी किसान थे और अब भी हैं। उनके हलो की मूठ मे स्वराज्य और स्वतन्त्रता की लालसा बँधी रहती है। यहाँ की जनता को भी मै ऐसा ही समझती हू। उसको छत्रपति ने नेतृत्व दिया था। यहा की जनता को तुम दो।' वे दोनो सिर नीचा करके कुछ सोचने लगे। रानी ने अपनी सहेलियो की ओर देख कर कहा, 'तुम लोग क्या कहती हो ?' सुन्दर ने तुरन्त उत्तर दिया, 'मैं सरकार कुणभी हूँ। और क्या कहूँ ? आपकी आज्ञा का पालन करते हुए मरने के समय आगा पीछा नही सोचूगी।'

लक्ष्मीबाई १४१ नाना ने कहा 'तुम ठीक कहती हो बाईसाहब, अभी हम लोग जनता के पास नही पहुंचे हैं। आशा है जनता शीघ्र जाग्रत हो जावेगी, परन्तु वह बिना नेता के कुछ नही कर सकती।' 'नेता को नेता नही ढूंढना पडता।', रानी बोली, 'समर्थ रामदास का आशीर्वाद नेता को तो बिना विलम्ब उत्पन्न कर देता है।' नाना—'मै समझ गया। निराशा का कोई कारण नही।' रानी—'हा, जो साधन जहा मिले उसका उपयोग करना चाहिये। जनता मुख्य साधन है। राजा और नवाब की पीढी, दो पीढी ही योग्य होती है। परन्तु जनता की पीढियो की योग्यता कभी नही छीजती।' नाना—'अब एक प्रश्न और है—यदि तुम्हारा अधिकार लाट के यहाँ से मान्य रहा तो हमको स्वराज्य प्राप्ति के उपायो के जुटाने में सुविधा रहेगी, परन्तु यदि लाट ने न माना, जैसी कि मुझको आशंका है, तब किस प्रकार कार्य साधन होगा?' रानी—'मैं ऐसा क्षण भर भी नही सोचती कि लाट नही मानेगा। नही मानेगा तो मै मनवाऊँगी। झासी राज्य की जनता सोलहआना मेरे साथ है। और यहा की जनसंख्या महाराष्ट्र के मावलो से अधिक ही है कम नही है। बुन्देलखण्ड में ब्राह्मण से लेकर भगी तक हथियार चलाना जानते हैं और हथियार चलाने की हौस रखते हैं।' जिस समय रानी ने यह बात कही उनका चेहरा तेज से दीप्त हो गया उन दोनो पुरुषो के मन में हर्ष की लहर दौड गई। तात्या ने कहा, 'अंग्रेजी सेना के हिन्दू मुसलमान सिपाहियो को भी टटोलू गा।' रानी बोली, 'अभी नही। पहले उनके घरो को टटोलो, जहा उन्होने जननी से जन्म पाया और उसकी गोद में खेले हैं।' नाना ने पूछा, 'यदि लाट का उत्तर हमारे विरुद्ध आया तो क्या तुम तुरन्त युद्ध छेड दोगी?'

१४२ झांसी की रानी रानी ने जवाब दिया, 'बिठूर से झाँसी आकर इतने दिनो में बहुत कुछ सीखा है। समय उत्तर देगा।' वे दोनो समझ गये कि रानी का कार्यक्रम इस समय ढूंढ खोज करने का और अवसर की प्रतीक्षा का है।

लक्ष्मीबाई १४३

[ १६ ]

सवेरे की उस कपकपाती ठंड में जब सूर्य भी बदली में मुँह छिपाये था, नवाब अलीबहादुर अपने नौकर पीरअली को साथ लिये हाथी पर सवार एलिस को कोठी पर पहुँचे । जिस भवन में आज कल डिस्ट्रिक्ट जज की कचहरी है, उसी में एलिस रहता था । एलिस अलीबहादुर की हवेली पर जाया करता था । अलीबहादुर एलिस को अपना मित्र मानते हुये भी, उसकी खुशामद करने से नही हिचकते थे । जैसे ही वे हाथी से उतरे, एलिस का नौकर पास दौडता हुआ आया। उन्नीसवी शताब्दि के अन्त में साहब के नौकरो और खानसामो का । जो पद गौरव चरम सीमा को पहुँच गया था, उस समय उसका आरम्भ था । नौकर ने झुककर सलाम किया । अलीबहादुर ने मिठास के साथ पूछा, 'साहब क्या कर रहे हैं ? बहुत उलझन में तो नही है ? मिलना चाहता हू ।' नौकर ने जवाब दिया, 'नही हुजूर । दफ्तर में अभी अभी आकर बैठे हैं । हुक्का पी रहे हैं । फौरन इत्तिला करता हू ।' कुछ क्षण पश्चात् ही नौकर अलीबहादुर को भीतर पहुँचा आया । अभिवादन और कुशल-क्षेम प्रश्नोत्तरी के उपरान्त उन दोनो में बातचीत होने लगी । अलीबहादुर ने कहा, 'रानी साहब की अर्जी का कुछ जवाब नही आया । शायद खारिज हो जावेगी ।' एलिस विचार की मुद्रा बनाकर बोला, 'कह नही सकता । आपका ऐसा ख्याल क्यो है ?' अलीबहादुर ने कहा, 'रियासतो के बुरे इन्तजाम को देखकर और जनता की भलाई की नजर से, सरकार ने कई रजवाडो में अपना अदल, अमन और इन्साफ चालू किया है । इसलिये शायद झाँसी में भी सर- कारी बन्दोवस्त किया जावे ।'

१४४ झांसी की रानी भोलेपन के साथ एलिस बोला, 'मुझको मालूम नही नवाब साहब, पर अगर ऐसा हो तो यहा की जनता सरकारी हुकूमत और कानून पसन्द करेगी ?' अलीबहादुर ने बडे मीठे स्वर मे जवाब दिया, 'दोनो हाथो से जनाब । स्वर्गीय राजा साहब के जमाने में जो जुल्म हुये हैं उनको आसानी से नही भुलाया जा सकता ।' एलिस सचाई का ढोंग करते हुये बोला, 'कुछ मैंने भी सुने हैं जैसे साधारण से अपराधो पर लोगो को बिच्छुओ से कटवाना । लेकिन, मरने के करीब के जमाने की कोई शिकायत मेरे कान तक नही आई ।' एलिस नवाब साहब जैसे हिन्दुस्थानियो की आतो तले से बात को निकालने का केंडा जानता था । उनकी ओर देखने लगा । नवाब ने कहा, 'छोटी छोटी सी बातो का आपके सामने बयान करना आपकी शान के खिलाफ होगा । पहले के किये हुये कुछ अन्धेरे इतने गजब के हैं कि सताये हुये लोग अब तक तडप रहे हैं ।' 'मुझको ऐसे लोगो के नाम और उन पर बीती हुई याद नही नवाब साहब ।' उत्सुकता प्रकट न करते हुये एलिस बोला 'कमसे कम एक ही की बीती हुई सुनें जनाब' नवाब ने कहा, 'नाम बिचारे का खुदाबख्श है पहले उसको राजा साहब बहुत अङ्ग लगाये रहते थे । नाटकशाल में बराबरी से बिठलाते थे । छोटी सी जागीर भी दिये हुये थे । एक दिन सनक जो सवार हुई तो गरीब को देश निकाले की सजा देदी । जागीर जब्त करली । उसने अर्ज मारूज पेश करने की बरसो कोशिश की, मगर उसको मोका तक नही दिया गया ।' 'उसने कम्पनी सरकार में कोई अर्जी दी ?' एलिस ने पूछा । नवाब ने माथा टटोल कर उत्तर दिया, 'याद नही पडता । शायद नही दी ।' अङ्गरेज ऐसे मौको पर अपनी धाक जमाते हैं ।

लक्ष्मीबाई ५४१ एलिस बोला, 'खुदाबख्श अर्जी देता तो एजेंट साहब बहादुर सुनवाई करते।' खुशामदी हिन्दुस्थानी ऐसे ही मौके पर स्वार्थ-साधन का जरिया निकाला करते थे। नवाब ने कहा, 'जनाब 'की सेवा में खुदाबख्श अर्जी पेश करदे ?' एलिस जरा सकट में पड़ा। परन्तु उसकी व्यापार कुशल बुद्धि ने सहायता की। बोला, 'अर्जी जरूर दे। परन्तु वडे साहव के पास कैथा भेजे। जब मेरे पास आवेगी, मैं उचित काररवाई करूंगा।' इतने से शायद नवाब साहव का मन भर गया। उन्होने चिन्ह कम से कम ऐसे ही प्रकट किये। फिर बहुत मुस्कराकर, वडे मिठास के साथ अलीवहादुर ने कहा, 'एक मेरी जाती विनती है।' एलिस ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा, 'जरूर कहिये नवाब साहब।' अलीबहादुर वास्तव में जिस प्रयोजन से एलिस से भेट करने आये थे उन्होने प्रकट किया। 'जनाब को मालूम है, मिसलो मे लिखा पढ़ा है, मेरे स्वर्गीय पिता राजा रघुनाथराव साहब ने मुझको ८५ गाव जागीर में लगाये थे। सरकारी बन्दोबस्त होने पर वह जागीर मेरे पास से निकाल ली गई और पाच सौ रुपया माहवारी वसीका लगा दिया गया। बडा कुटुम्ब है। सफेद पोशी साथ लगी है। गुजर नही होती। राजा साहब गंगाधरराव से प्रार्थना की थी। उन्होने कहा था एजेन्ट साहब से सलाह करके जवाब देगे। फिर उनका लड़का मर गया और वे बीमार पड गये। बात अधूरी रह गई। अब शासन बदला है। शायद सरकारी बन्दोबस्त हो जाय। इसलिये मेरी उचित विनती पर ध्यान दिया जाना चाहिये।'

१४६ झांसी की रानी एलिस सोचने लगा। नवाब ने समझा कि पानी विलमा। एलिस ने समझ लिया कि खुदाबख्श वाली शिकायत केवल भूमिका और पेशवन्दी थी। असल में नवाब साहब खुदाबख्श की ओट मे अपनी विनती लेकर आए हैं। परन्तु वह कुढा नही। उसको एक छोटा सा अध्ययन मिला और अपना काम निकालने का अवसर तथा साधन। बोला, 'नवाब साहब, आप मेरे मित्र हैं। मुझसे जो कुछ सहायता बनेगी करूँगा। अर्जी दीजिये। उसमें सब हाल ब्योरेवार लिखिए। अर्जी चाहे एजेंट साहब बहादुर के पास बाला बाला भेज दीजिए, चाहे मेरी मार्फत।' 'बहादुर' शब्द पर उसने जरा ज्यादा जोर लगाया। इस समय खुदाबख्श की कोई चिन्ता अलीबहादुर को न थी। खुश होकर बोले, 'मैं बहुत धन्यवाद देता हू। परमात्मा आपको लाट साहब करे।' फिर मिठास में घुलकर कहा, जनाब को मालूम है कि महाराजा रघुनाथराव वाला महल मेरे कब्जे में रहा है। मुझको महाराज साहब दे गये थे। उसको राजा गङ्गाधरराव ने यो ही छीन लिया। किसी काम मे नही आ रहा है। ताले पडे हैं।' एलिस ने कहा, 'मुझको मालूम है। वह जगह आपकी है आपको मिलेगी, जरासा इन्तजार करिये।' नवाब साहब ने सलाम करके धन्यवाद दिया। चलने की आज्ञा मांगने लगे। एलिस ने हँसकर कहा, 'थोडा सा और बैठिये नवाब साहब।' नवाब साहब को घर पर काम ही क्या था ? सट से जम गये। एलिस ने फुसलाहट के ढग पर पूछा, 'आपके पास तो बस्ती के बहुत लोग आते-जाते हैं। क्या हाल है ?' 'बहुत अच्छा हाल तो नही है। लोग परेशान हैं। सच पूछिये तो वे लोग चाहते हैं, कि कम्पनी सरकार का बन्दोबस्त हो जाय।'

लक्ष्मीबाई १४७ 'लोगो से जरा और ज्यादा मिलते रहिये और जनता के सुख-दुख की बाते मुझको बतलाते रहिये।' 'ऐसा ही करूँ गा। लगभग दूसरे-तीसरे दिन हाजिरी दिया करूँ गा।' 'रानी साहब का क्या हाल है? उनका स्वभाव किस तरह का है?' 'रानी साहब रञ्ज में रहती हैं? चाल-चलन अव्वल दर्जे का खरा है। अपने धर्म की पावन्द हैं। घुडसवारी, हथियार चलाना, लिखने- पढने की योग्यता... ' 'यह सब मुझको मालूम है नवाब साहब। मैं उनकी बहुत इज्जत करता हू। मे केवल यह जानना चाहूगा कि कोई इधर-उधर के लोग उनको बरगलाते तो नही हैं।' अभी तो उनके नाते-गोते के लोग फेरे के लिये आ जारहे हैं। हाल में बिठूर के कुछ लोग आये थे। वे चले गये।' 'कृपा होगी यदि आप इन आने-जाने वालो का भी पता देते रहे।' 'बहुत अच्छा जनाब। पीरअली मेरा बहुत भरोसे का नौकर है। उसको इस काम पर तैनात कर दूंगा। मेरे साथ ही हाथी पर आया है। आप फरमाएँ तो सामने पेश करदूं।' 'नही नवाब साहब, जरूरत नही। आपको यकीन है तो मुझको भी है।' इसके बाद अलीबहादुर चले गये। घर जाते समय मार्ग में ही पीरअली को उन्होने उसका कर्तव्य सुझा दिया। खुदाबख्श हवेली पर मिला। उससे अर्जी देने को कहा। बोले, 'साहब जरा मुश्किल में माने। वह तुम्हारी अर्जी पर विचार करेगे।' खुदाबख्श ने कहा, 'मैंने रानी साहब से अर्ज करवाई थी। उन्होने झासी में रहने की आज्ञा दे दी है। जागीर के बारे में उन्होने हुक्म दिया है कि लाट साहब के यहा से अधिकार मिलनेपर, खुलासी कर दी जावेगी। इसलिये सोचता हूँ अभी बडे साहब या छोटे साहब, किसी को भी अर्जी न दूं।'

१४८ झांसी की रानी 'अच्छी बात है,' नवाब ने कहा । मन में कुढ गये । एक क्षण उपरान्त पूछा, 'किसकी मार्फत अर्ज की थी ?' 'मोतीबाई अपनी तनख्वाह की फरियाद करने गई थी। अपनी बात के सिलसिले में उन्होंने मेरी विनती भी कर दी।' 'कब ?' 'कल। और आज सवेरे रानी साहब का जवाब आ गया। बहुत नेक हैं।' मोतीबाई आई हैं ?' नही, उन्होंने खबर भेजी है।' 'मुझको खुशी हुई। मेरे लायक तुम्हारा जो काम होगा, करूँगा।' 'आपकी कृपा है।' अलीबहादुर ने सोचा, 'एलिस साहब के कान मे इस बात के डालने की जरूरत नहीं है।' खुदाबख्श शहर में रहने लगा।

लक्ष्मीबाई १४६ [ ३० ] हाट का दिन था । झांसी के निकटवर्ती गांवो से बहुत लोग आये थे । बाजार में झांसी के भविष्य की क्या चर्चा है, इसके जानने के लिये, वे उत्सुक थे । हलवाईपुरा झांसी का सबसे बडा बाजार था । ग्रामीण इसको 'मिठियाई' कहते थे । हलवाइयो की दूकाने एक सिरे पर थी । दूसरे सिरे पर एक दिशा में 'मुरली मनोहर' का मन्दिर और सामने मन्दिर का नक्कारखाना । मन्दिर में मूर्ति राधाकृष्ण की थी—और है । मन्दिर कहलाता लक्ष्मीबाई का है, इसमें दर्शन करने के लिये लक्ष्मीबाई नियम से जाया करती थी । हलवाइयो की दूकानो और मुरली मनोहर के मन्दिर के बीच के सिलसिले में, अनेक प्रकार की दूकाने थी । बीच मे मार्ग काफी चौडा । पश्चिम की ओर मार्ग दो फन्सो में फूटा है, एक हवेली और किले की ओर, और दूसरा दतिया फाटक को । हाट के दिन इस सम्पूर्ण मार्ग पर बहुत चहल पहल पर रहती थी,। स्त्रिया और पुरुष आजादी के साथ अपना सौदा खरीद रहे थे और बातचीत कर रहे थे । खुदाबख्श और पीरअली बाजार मे साथ थे । कपडे की दूकान से कुछ कपडा मोल लेकर एक देहाती ने दूकानदार से पूछा, 'काये जू अब झांसी में का होने ?' 'जो होत आओ है सो हुइये' उत्तर मिला । 'हम गाव वारे इतनीई में समझ जात होते तो का हती । तनक उल्था करके बताओ ।' तीन चार देहाती वहा और आ गये । बिक्री की आशा से दूकानदार का मन वढा । बातचीत का सिलसिला चला । 'महाराज ने स्वर्गवास के पैले कुँअर गोदी लएते सो सबरो संसार जानत । वा गोद के मनवावे के लाने उनने अपने सामने अर्जी लाट साब लो पहुँचा दईती । अबै ऊतर नई आओ ।'

१५० झांसी की रानी 'गोद के मनवाबे के लाने अर्जी । जो कैसो अन्देर राम । हम अपने गावन मे रोजई गोद लेत देत, पै ईके लाने अर्जी पुर्जी तो कोऊ नई देत ।' 'अङ्गरेजन ने नये नये कानून निकारे हैं ।' 'तो का ऐसे कानून चल जैहैं ?' ' बे तौ बात बात पै कानून बरसाउत । अर्जी दो, 'टिकट लगाओ, पंचायतन खौ चूल्हे में डारौ । गोरन के बगलन पै मारे मारे फिरौ, हाजरी देओ...।' 'इतनो खाओ और इतनो सोओ - अबका ईके लाने सोऊ अङ्गरेज कानून बनाये ?' 'अक्ल चेथरी* में चढ गई सो अब उने कछू सूझत नईया ।' 'तौका ऐसी आखे फट गई धरम-करम कछू नही लेखत ?' 'वे धरम-करम का चीन्हे ? बौ तौ हिन्दू-मुसलमान केई बाटे परो है।' इस आत्मश्लाघा के बाद दूकानदार ने ग्राहको को चलाया । भीड बढ गई थी । सौदा मजे मे चल रहा था । दूकानदार बात करना चाहता था और देहाती सुनना और गुनना चाहते थे । 'ऐहो सो अङ्गरेज की जा अन्दाधुन्धी चल जैहै ? हम तुम का मानसई नईया ?' 'अङ्गरेजन की छाउनियन मे गउयें कट रईं हैं । कानून कौ ऐसौ डडा घलरओ कै सब जने सास लैवे में उकतान लगे ।' 'कितै जू ?' 'सब जागा । ग्वालियर रियासत तौ है, पै उतै अङ्गरेजन की चालौ चल रओ । उतै कौ बडौ साब जब बजार में होके निकरत तब सब बजार बारन खो उठ उठ कै झुक झुक कै राम सलाम करने परत ।' 'जौ बडो साब को आय ? ऐसै राम राम तौ राजन खौ करी जात ।' 'बडो साब लाट साब कौ नौकर है ।' *चेथ - मस्तक का सबसे ऊपरी भाग ।

लक्ष्मीवाई १५१ 'और लाट साव कीकौ नौकर है ? का वो राजा है ?' 'राजा नइया । बिलात के राजा कौ नौकर ।' 'ओ राम ! नौकरन के नौकरन खो झुक झुक के परनाम ! ई देस के ऐसे दिन आ गये ! और जो कोऊ राम राम न करै तौ ?' 'ऊखो वँगला पै पकर बुलाउत और कष्ट देत ।' देहातियो ने दात पीसे । एक बोला, 'हम तौ कोउन अङ्गरेज खो राम राम न करें ओर न सलाम । वौ न हिन्दू न मुसलमान । और पकर के बुलाय तौ खुपरिया खोल देओ ।' 'इतने में कुछ दूसरी से 'हटो बचो' की आवाज आई । एलिस बाजार घूमने घोडे पर आया था, साथ में एक सवार था । वही 'हटो बच्चो' कह रहा था । कुछ—बहुत थोडे दूकानदार— प्रणाम करने को उठे । बाकी अपना काम करते रहे । किसी देहाती ने प्रणाम नही किया । वह कपडे वाला प्रणाम करने को उठना चाहता था कि देहातियो ने मना कर दिया । एक ने कहा, 'बैठे जो रओ कौन वो बतासा वाट रओ ।' दूकानदार ने प्रणाम बैठे बैठे ही किया । देहाती एलिस की वेशभूषा देखते रहे । एलिस आगे निकल गया । मार्ग में चाँदी के जेवरो से लदी, माथे पर सिन्दूर की बिन्दी लगाये, जरा लमछेरे शरीर की एक सुन्दर स्त्री उसने देखी । कुतूहलवश उसने उस स्त्री पर आख जमाई । स्त्री जरा भी नही सहमी । वल्कि उसने एलिस पर आँख तरेरी । उस स्त्री के साथ एक स्त्री और थी । उस सुन्दरी ने अपनी सगिन से तुरन्त कहा, 'जो नठिया मोरी ओर का देखत तौ ? ई कै का मताई बैने न हुईए ।'