झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीवाई १५१ 'और लाट साव कीकौ नौकर है ? का वो राजा है ?' 'राजा नइया । बिलात के राजा कौ नौकर ।' 'ओ राम ! नौकरन के नौकरन खो झुक झुक के परनाम ! ई देस के ऐसे दिन आ गये ! और जो कोऊ राम राम न करै तौ ?' 'ऊखो वँगला पै पकर बुलाउत और कष्ट देत ।' देहातियो ने दात पीसे । एक बोला, 'हम तौ कोउन अङ्गरेज खो राम राम न करें ओर न सलाम । वौ न हिन्दू न मुसलमान । और पकर के बुलाय तौ खुपरिया खोल देओ ।' 'इतने में कुछ दूसरी से 'हटो बचो' की आवाज आई । एलिस बाजार घूमने घोडे पर आया था, साथ में एक सवार था । वही 'हटो बच्चो' कह रहा था । कुछ—बहुत थोडे दूकानदार— प्रणाम करने को उठे । बाकी अपना काम करते रहे । किसी देहाती ने प्रणाम नही किया । वह कपडे वाला प्रणाम करने को उठना चाहता था कि देहातियो ने मना कर दिया । एक ने कहा, 'बैठे जो रओ कौन वो बतासा वाट रओ ।' दूकानदार ने प्रणाम बैठे बैठे ही किया । देहाती एलिस की वेशभूषा देखते रहे । एलिस आगे निकल गया । मार्ग में चाँदी के जेवरो से लदी, माथे पर सिन्दूर की बिन्दी लगाये, जरा लमछेरे शरीर की एक सुन्दर स्त्री उसने देखी । कुतूहलवश उसने उस स्त्री पर आख जमाई । स्त्री जरा भी नही सहमी । वल्कि उसने एलिस पर आँख तरेरी । उस स्त्री के साथ एक स्त्री और थी । उस सुन्दरी ने अपनी सगिन से तुरन्त कहा, 'जो नठिया मोरी ओर का देखत तौ ? ई कै का मताई बैने न हुईए ।'