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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 526 में से

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लक्ष्मीवाई १५१ 'और लाट साव कीकौ नौकर है ? का वो राजा है ?' 'राजा नइया । बिलात के राजा कौ नौकर ।' 'ओ राम ! नौकरन के नौकरन खो झुक झुक के परनाम ! ई देस के ऐसे दिन आ गये ! और जो कोऊ राम राम न करै तौ ?' 'ऊखो वँगला पै पकर बुलाउत और कष्ट देत ।' देहातियो ने दात पीसे । एक बोला, 'हम तौ कोउन अङ्गरेज खो राम राम न करें ओर न सलाम । वौ न हिन्दू न मुसलमान । और पकर के बुलाय तौ खुपरिया खोल देओ ।' 'इतने में कुछ दूसरी से 'हटो बचो' की आवाज आई । एलिस बाजार घूमने घोडे पर आया था, साथ में एक सवार था । वही 'हटो बच्चो' कह रहा था । कुछ—बहुत थोडे दूकानदार— प्रणाम करने को उठे । बाकी अपना काम करते रहे । किसी देहाती ने प्रणाम नही किया । वह कपडे वाला प्रणाम करने को उठना चाहता था कि देहातियो ने मना कर दिया । एक ने कहा, 'बैठे जो रओ कौन वो बतासा वाट रओ ।' दूकानदार ने प्रणाम बैठे बैठे ही किया । देहाती एलिस की वेशभूषा देखते रहे । एलिस आगे निकल गया । मार्ग में चाँदी के जेवरो से लदी, माथे पर सिन्दूर की बिन्दी लगाये, जरा लमछेरे शरीर की एक सुन्दर स्त्री उसने देखी । कुतूहलवश उसने उस स्त्री पर आख जमाई । स्त्री जरा भी नही सहमी । वल्कि उसने एलिस पर आँख तरेरी । उस स्त्री के साथ एक स्त्री और थी । उस सुन्दरी ने अपनी सगिन से तुरन्त कहा, 'जो नठिया मोरी ओर का देखत तौ ? ई कै का मताई बैने न हुईए ।'

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