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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ५४१ एलिस बोला, 'खुदाबख्श अर्जी देता तो एजेंट साहब बहादुर सुनवाई करते।' खुशामदी हिन्दुस्थानी ऐसे ही मौके पर स्वार्थ-साधन का जरिया निकाला करते थे। नवाब ने कहा, 'जनाब 'की सेवा में खुदाबख्श अर्जी पेश करदे ?' एलिस जरा सकट में पड़ा। परन्तु उसकी व्यापार कुशल बुद्धि ने सहायता की। बोला, 'अर्जी जरूर दे। परन्तु वडे साहव के पास कैथा भेजे। जब मेरे पास आवेगी, मैं उचित काररवाई करूंगा।' इतने से शायद नवाब साहव का मन भर गया। उन्होने चिन्ह कम से कम ऐसे ही प्रकट किये। फिर बहुत मुस्कराकर, वडे मिठास के साथ अलीवहादुर ने कहा, 'एक मेरी जाती विनती है।' एलिस ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा, 'जरूर कहिये नवाब साहब।' अलीबहादुर वास्तव में जिस प्रयोजन से एलिस से भेट करने आये थे उन्होने प्रकट किया। 'जनाब को मालूम है, मिसलो मे लिखा पढ़ा है, मेरे स्वर्गीय पिता राजा रघुनाथराव साहब ने मुझको ८५ गाव जागीर में लगाये थे। सरकारी बन्दोबस्त होने पर वह जागीर मेरे पास से निकाल ली गई और पाच सौ रुपया माहवारी वसीका लगा दिया गया। बडा कुटुम्ब है। सफेद पोशी साथ लगी है। गुजर नही होती। राजा साहब गंगाधरराव से प्रार्थना की थी। उन्होने कहा था एजेन्ट साहब से सलाह करके जवाब देगे। फिर उनका लड़का मर गया और वे बीमार पड गये। बात अधूरी रह गई। अब शासन बदला है। शायद सरकारी बन्दोबस्त हो जाय। इसलिये मेरी उचित विनती पर ध्यान दिया जाना चाहिये।'