झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४६ झांसी की रानी एलिस सोचने लगा। नवाब ने समझा कि पानी विलमा। एलिस ने समझ लिया कि खुदाबख्श वाली शिकायत केवल भूमिका और पेशवन्दी थी। असल में नवाब साहब खुदाबख्श की ओट मे अपनी विनती लेकर आए हैं। परन्तु वह कुढा नही। उसको एक छोटा सा अध्ययन मिला और अपना काम निकालने का अवसर तथा साधन। बोला, 'नवाब साहब, आप मेरे मित्र हैं। मुझसे जो कुछ सहायता बनेगी करूँगा। अर्जी दीजिये। उसमें सब हाल ब्योरेवार लिखिए। अर्जी चाहे एजेंट साहब बहादुर के पास बाला बाला भेज दीजिए, चाहे मेरी मार्फत।' 'बहादुर' शब्द पर उसने जरा ज्यादा जोर लगाया। इस समय खुदाबख्श की कोई चिन्ता अलीबहादुर को न थी। खुश होकर बोले, 'मैं बहुत धन्यवाद देता हू। परमात्मा आपको लाट साहब करे।' फिर मिठास में घुलकर कहा, जनाब को मालूम है कि महाराजा रघुनाथराव वाला महल मेरे कब्जे में रहा है। मुझको महाराज साहब दे गये थे। उसको राजा गङ्गाधरराव ने यो ही छीन लिया। किसी काम मे नही आ रहा है। ताले पडे हैं।' एलिस ने कहा, 'मुझको मालूम है। वह जगह आपकी है आपको मिलेगी, जरासा इन्तजार करिये।' नवाब साहब ने सलाम करके धन्यवाद दिया। चलने की आज्ञा मांगने लगे। एलिस ने हँसकर कहा, 'थोडा सा और बैठिये नवाब साहब।' नवाब साहब को घर पर काम ही क्या था ? सट से जम गये। एलिस ने फुसलाहट के ढग पर पूछा, 'आपके पास तो बस्ती के बहुत लोग आते-जाते हैं। क्या हाल है ?' 'बहुत अच्छा हाल तो नही है। लोग परेशान हैं। सच पूछिये तो वे लोग चाहते हैं, कि कम्पनी सरकार का बन्दोबस्त हो जाय।'