झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 158, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई १४७ 'लोगो से जरा और ज्यादा मिलते रहिये और जनता के सुख-दुख की बाते मुझको बतलाते रहिये।' 'ऐसा ही करूँ गा। लगभग दूसरे-तीसरे दिन हाजिरी दिया करूँ गा।' 'रानी साहब का क्या हाल है? उनका स्वभाव किस तरह का है?' 'रानी साहब रञ्ज में रहती हैं? चाल-चलन अव्वल दर्जे का खरा है। अपने धर्म की पावन्द हैं। घुडसवारी, हथियार चलाना, लिखने- पढने की योग्यता... ' 'यह सब मुझको मालूम है नवाब साहब। मैं उनकी बहुत इज्जत करता हू। मे केवल यह जानना चाहूगा कि कोई इधर-उधर के लोग उनको बरगलाते तो नही हैं।' अभी तो उनके नाते-गोते के लोग फेरे के लिये आ जारहे हैं। हाल में बिठूर के कुछ लोग आये थे। वे चले गये।' 'कृपा होगी यदि आप इन आने-जाने वालो का भी पता देते रहे।' 'बहुत अच्छा जनाब। पीरअली मेरा बहुत भरोसे का नौकर है। उसको इस काम पर तैनात कर दूंगा। मेरे साथ ही हाथी पर आया है। आप फरमाएँ तो सामने पेश करदूं।' 'नही नवाब साहब, जरूरत नही। आपको यकीन है तो मुझको भी है।' इसके बाद अलीबहादुर चले गये। घर जाते समय मार्ग में ही पीरअली को उन्होने उसका कर्तव्य सुझा दिया। खुदाबख्श हवेली पर मिला। उससे अर्जी देने को कहा। बोले, 'साहब जरा मुश्किल में माने। वह तुम्हारी अर्जी पर विचार करेगे।' खुदाबख्श ने कहा, 'मैंने रानी साहब से अर्ज करवाई थी। उन्होने झासी में रहने की आज्ञा दे दी है। जागीर के बारे में उन्होने हुक्म दिया है कि लाट साहब के यहा से अधिकार मिलनेपर, खुलासी कर दी जावेगी। इसलिये सोचता हूँ अभी बडे साहब या छोटे साहब, किसी को भी अर्जी न दूं।'