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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

लक्ष्मीबाई १४७ 'लोगो से जरा और ज्यादा मिलते रहिये और जनता के सुख-दुख की बाते मुझको बतलाते रहिये।' 'ऐसा ही करूँ गा। लगभग दूसरे-तीसरे दिन हाजिरी दिया करूँ गा।' 'रानी साहब का क्या हाल है? उनका स्वभाव किस तरह का है?' 'रानी साहब रञ्ज में रहती हैं? चाल-चलन अव्वल दर्जे का खरा है। अपने धर्म की पावन्द हैं। घुडसवारी, हथियार चलाना, लिखने- पढने की योग्यता... ' 'यह सब मुझको मालूम है नवाब साहब। मैं उनकी बहुत इज्जत करता हू। मे केवल यह जानना चाहूगा कि कोई इधर-उधर के लोग उनको बरगलाते तो नही हैं।' अभी तो उनके नाते-गोते के लोग फेरे के लिये आ जारहे हैं। हाल में बिठूर के कुछ लोग आये थे। वे चले गये।' 'कृपा होगी यदि आप इन आने-जाने वालो का भी पता देते रहे।' 'बहुत अच्छा जनाब। पीरअली मेरा बहुत भरोसे का नौकर है। उसको इस काम पर तैनात कर दूंगा। मेरे साथ ही हाथी पर आया है। आप फरमाएँ तो सामने पेश करदूं।' 'नही नवाब साहब, जरूरत नही। आपको यकीन है तो मुझको भी है।' इसके बाद अलीबहादुर चले गये। घर जाते समय मार्ग में ही पीरअली को उन्होने उसका कर्तव्य सुझा दिया। खुदाबख्श हवेली पर मिला। उससे अर्जी देने को कहा। बोले, 'साहब जरा मुश्किल में माने। वह तुम्हारी अर्जी पर विचार करेगे।' खुदाबख्श ने कहा, 'मैंने रानी साहब से अर्ज करवाई थी। उन्होने झासी में रहने की आज्ञा दे दी है। जागीर के बारे में उन्होने हुक्म दिया है कि लाट साहब के यहा से अधिकार मिलनेपर, खुलासी कर दी जावेगी। इसलिये सोचता हूँ अभी बडे साहब या छोटे साहब, किसी को भी अर्जी न दूं।'

१४८ झांसी की रानी 'अच्छी बात है,' नवाब ने कहा । मन में कुढ गये । एक क्षण उपरान्त पूछा, 'किसकी मार्फत अर्ज की थी ?' 'मोतीबाई अपनी तनख्वाह की फरियाद करने गई थी। अपनी बात के सिलसिले में उन्होंने मेरी विनती भी कर दी।' 'कब ?' 'कल। और आज सवेरे रानी साहब का जवाब आ गया। बहुत नेक हैं।' मोतीबाई आई हैं ?' नही, उन्होंने खबर भेजी है।' 'मुझको खुशी हुई। मेरे लायक तुम्हारा जो काम होगा, करूँगा।' 'आपकी कृपा है।' अलीबहादुर ने सोचा, 'एलिस साहब के कान मे इस बात के डालने की जरूरत नहीं है।' खुदाबख्श शहर में रहने लगा।

लक्ष्मीबाई १४६ [ ३० ] हाट का दिन था । झांसी के निकटवर्ती गांवो से बहुत लोग आये थे । बाजार में झांसी के भविष्य की क्या चर्चा है, इसके जानने के लिये, वे उत्सुक थे । हलवाईपुरा झांसी का सबसे बडा बाजार था । ग्रामीण इसको 'मिठियाई' कहते थे । हलवाइयो की दूकाने एक सिरे पर थी । दूसरे सिरे पर एक दिशा में 'मुरली मनोहर' का मन्दिर और सामने मन्दिर का नक्कारखाना । मन्दिर में मूर्ति राधाकृष्ण की थी—और है । मन्दिर कहलाता लक्ष्मीबाई का है, इसमें दर्शन करने के लिये लक्ष्मीबाई नियम से जाया करती थी । हलवाइयो की दूकानो और मुरली मनोहर के मन्दिर के बीच के सिलसिले में, अनेक प्रकार की दूकाने थी । बीच मे मार्ग काफी चौडा । पश्चिम की ओर मार्ग दो फन्सो में फूटा है, एक हवेली और किले की ओर, और दूसरा दतिया फाटक को । हाट के दिन इस सम्पूर्ण मार्ग पर बहुत चहल पहल पर रहती थी,। स्त्रिया और पुरुष आजादी के साथ अपना सौदा खरीद रहे थे और बातचीत कर रहे थे । खुदाबख्श और पीरअली बाजार मे साथ थे । कपडे की दूकान से कुछ कपडा मोल लेकर एक देहाती ने दूकानदार से पूछा, 'काये जू अब झांसी में का होने ?' 'जो होत आओ है सो हुइये' उत्तर मिला । 'हम गाव वारे इतनीई में समझ जात होते तो का हती । तनक उल्था करके बताओ ।' तीन चार देहाती वहा और आ गये । बिक्री की आशा से दूकानदार का मन वढा । बातचीत का सिलसिला चला । 'महाराज ने स्वर्गवास के पैले कुँअर गोदी लएते सो सबरो संसार जानत । वा गोद के मनवावे के लाने उनने अपने सामने अर्जी लाट साब लो पहुँचा दईती । अबै ऊतर नई आओ ।'

१५० झांसी की रानी 'गोद के मनवाबे के लाने अर्जी । जो कैसो अन्देर राम । हम अपने गावन मे रोजई गोद लेत देत, पै ईके लाने अर्जी पुर्जी तो कोऊ नई देत ।' 'अङ्गरेजन ने नये नये कानून निकारे हैं ।' 'तो का ऐसे कानून चल जैहैं ?' ' बे तौ बात बात पै कानून बरसाउत । अर्जी दो, 'टिकट लगाओ, पंचायतन खौ चूल्हे में डारौ । गोरन के बगलन पै मारे मारे फिरौ, हाजरी देओ...।' 'इतनो खाओ और इतनो सोओ - अबका ईके लाने सोऊ अङ्गरेज कानून बनाये ?' 'अक्ल चेथरी* में चढ गई सो अब उने कछू सूझत नईया ।' 'तौका ऐसी आखे फट गई धरम-करम कछू नही लेखत ?' 'वे धरम-करम का चीन्हे ? बौ तौ हिन्दू-मुसलमान केई बाटे परो है।' इस आत्मश्लाघा के बाद दूकानदार ने ग्राहको को चलाया । भीड बढ गई थी । सौदा मजे मे चल रहा था । दूकानदार बात करना चाहता था और देहाती सुनना और गुनना चाहते थे । 'ऐहो सो अङ्गरेज की जा अन्दाधुन्धी चल जैहै ? हम तुम का मानसई नईया ?' 'अङ्गरेजन की छाउनियन मे गउयें कट रईं हैं । कानून कौ ऐसौ डडा घलरओ कै सब जने सास लैवे में उकतान लगे ।' 'कितै जू ?' 'सब जागा । ग्वालियर रियासत तौ है, पै उतै अङ्गरेजन की चालौ चल रओ । उतै कौ बडौ साब जब बजार में होके निकरत तब सब बजार बारन खो उठ उठ कै झुक झुक कै राम सलाम करने परत ।' 'जौ बडो साब को आय ? ऐसै राम राम तौ राजन खौ करी जात ।' 'बडो साब लाट साब कौ नौकर है ।' *चेथ - मस्तक का सबसे ऊपरी भाग ।

लक्ष्मीवाई १५१ 'और लाट साव कीकौ नौकर है ? का वो राजा है ?' 'राजा नइया । बिलात के राजा कौ नौकर ।' 'ओ राम ! नौकरन के नौकरन खो झुक झुक के परनाम ! ई देस के ऐसे दिन आ गये ! और जो कोऊ राम राम न करै तौ ?' 'ऊखो वँगला पै पकर बुलाउत और कष्ट देत ।' देहातियो ने दात पीसे । एक बोला, 'हम तौ कोउन अङ्गरेज खो राम राम न करें ओर न सलाम । वौ न हिन्दू न मुसलमान । और पकर के बुलाय तौ खुपरिया खोल देओ ।' 'इतने में कुछ दूसरी से 'हटो बचो' की आवाज आई । एलिस बाजार घूमने घोडे पर आया था, साथ में एक सवार था । वही 'हटो बच्चो' कह रहा था । कुछ—बहुत थोडे दूकानदार— प्रणाम करने को उठे । बाकी अपना काम करते रहे । किसी देहाती ने प्रणाम नही किया । वह कपडे वाला प्रणाम करने को उठना चाहता था कि देहातियो ने मना कर दिया । एक ने कहा, 'बैठे जो रओ कौन वो बतासा वाट रओ ।' दूकानदार ने प्रणाम बैठे बैठे ही किया । देहाती एलिस की वेशभूषा देखते रहे । एलिस आगे निकल गया । मार्ग में चाँदी के जेवरो से लदी, माथे पर सिन्दूर की बिन्दी लगाये, जरा लमछेरे शरीर की एक सुन्दर स्त्री उसने देखी । कुतूहलवश उसने उस स्त्री पर आख जमाई । स्त्री जरा भी नही सहमी । वल्कि उसने एलिस पर आँख तरेरी । उस स्त्री के साथ एक स्त्री और थी । उस सुन्दरी ने अपनी सगिन से तुरन्त कहा, 'जो नठिया मोरी ओर का देखत तौ ? ई कै का मताई बैने न हुईए ।'

१५२ झांसी की रानी झलकारी, इन अङ्गरेजन मे चलन दूसरी तरा को सुनत।' 'हुइये आगलंगन के। मोरे मन में तो आउत कै पनैया उतार कै मूंछन बरेके मोपें चटाचट दैंग्रो।' 'कायरी ऊनै तोरो का लै लङ्ग्रो ?' 'हमाग्रो कछू लैवे खो आय तब पसुरिया टोर कै धर दैंग्रो, पै वैना का इन गोरन खौं जानती नइँया ? झाँसी खौं गुटकन चाउत।' 'हमाई रानी न गुटकन दे। 'ए, रानी का है छाच्छार* दुर्गा है। ऐसी प्यारी लगत। मोये तो ऊदिना हरदी कूँ कूँ में गरे से लगा लयो तो। मैं तो ऊपै अपने प्रान दै सकत।' 'और तौरो मुस का कर है ?' 'काये अब गारियन पै आ गई ? मै हूँसा दैंग्रो, सो सबरो बुकलयावो बिसर जै। जब रानी पै कौनउ आफत आजैं, तब का लुगाई और का मानस, सब अपने खौं हौम देये।' पीरअली और खुदाबख्श ने पान वाले की दूकान पर सुना — 'यह छोटा साहब कैसी अकड के साथ बाजार मे होकर निकलता है!' 'इस समय इन लोगो का सितारा चमका है। कभी डूबेगा भी।' 'इनकी तकदीर तो देखो। जो सामने आया समेट लिया गया। हैं हिम्मत वाले।' 'जी हा ! हिम्मत के सब हरफ खुदा ने इन्ही के खोपडे पर लिख दिये हैं। हमारी फूट ने हमे खालिया। नही तो क्या मुगल, पठान, राज पूत, मराठा वगैरह के होते ये एक घडी भी हिन्दुस्थान में ठहर सकते थे ?' 'बनिये बनकर आये और ठाकुर बनकर जम रहे हैं।' 'इन राजो नवाबो ने चौपट किया।' 'प्रजा को कष्ट दिये। सिपाही लडाई में हारे, और राज्य गया।' 'अजी सब जनाने हो गये।' *छाच्छार = साक्षात ।

लछमीबाई १५३

'यही के राजा को न देखो ।- नाटक चेटक और नाचने गाने में सब समाप्त कर दिया ।' खुदाबख्श के कान खड़े हुये । क्षोभ आया । उसी आदमी से पूछा, 'यहा के राजा ने रैयत को तो कोई दुख दिया नही ?' 'दुख न देना और बात है, सुख पहुचाना दूसरी बात ।' 'अङ्गरेजो का राज हो गया, तो याद आवेगी ।' 'अङ्गरेज कौन कच्चा खाये जाते हैं ।' 'जनाब वह ऐसी कौम है कि बिना खाये ही पचा जावेगी ।' 'ऐसा नही हो सकता । यहा का राज अङ्गरेजो के हाथ नही जावेगा ।' 'कुछ नही कहा जा सकता । यदि चला गया तो ?' तम्बोली ने पान बनाते बनाते कहा, 'ठट्ठा है जो चला जावेगा । रानी हमारी बनी रहे, हम तो अपने सिर कटवा देंगे ।' पीरअली ने हँसकर कहा, 'तुम तो पान काटते कतरते जाओ भाई । सिर काटना, कटवाना हम सिपाहियो का काम है ।' तम्बोली ने ध्यान पूर्वक पीरअली को देखा । बोला, 'आप झाँसी के रहने वाले नही जान पडते । परदेशी हैं ?' 'क्यो ? क्या फर्क पड गया ?' 'धरती आकाश का ।' 'कैसे ?' 'अभी कुछ नही कह सकता । समय आने पर देखना ।' 'समय आने पर तेली तम्बोली भी तलवार बन्दूक चलावेगे, यह देखना बाकी है ।' 'अभी न देखलो । ले आओ अपनी ढाल-तलवार मैं अपनी लाता हूँ । फिर देखलो झांसी का पानी ।' पीरअली हँसा । खुदाबख्श उसको वहा से ले गया । दूकान के पास झम्मीसिंह और भग्गी दाउजू सुनार खड़े थे ।

१५४ झांसी की रानी झम्मीसिंह ने कहा, 'खूब कई साब तुमने, स्याबास । अँगरेजन की जासूस सौ का हती ?' तम्बोली बोला, 'हुइये । का करनै कक्का ।' भग्गी दाऊजू ने कहा, 'झांसी लटी तकै तिहि खाये कालका माई ।'* 'वा दाऊजू वा,' तम्बोली बोला, 'कविराजई तो ठैरे ।' झांसी मे उस समय अनेक लावनी बाज थे । उनकी कविताये पिंगल के नियमो मे परे होती थी, लेकिन थी वे बहुत लोक प्रिय । भग्गी दाउजु उन्ही में से एक था । पीरअली ने बाज़ार का सारा समाचार अलीबहादुर को दिया । अलीबहादुर ने दूसरे दिन एलिस को सुनाया । एलिस ने नवाब साहब को धन्यवाद दिया और मन में कहा, 'आल बाजार गौसिप' ( सब बाजार की गपशप ) । *भग्गी दाऊजू का रायसा — परिशिष्ट में देखिये ।

लक्ष्मीबाई १५५

[ ३१ ]

जब महीने भर से ऊपर हो गया और कलकत्ते से कोई जवाब न आया तो एलिस, मालकम इत्यादि को चिन्ता हुई । शायद गवर्नर जनरल रानी के पक्ष में फैसला करदें और झाँसी सरकारी 'वन्दोबस्त' की हुकूमत से वंचित रह जाय । एलिस के सामने सदाशिवराव नेवालकर नाम का एक व्यक्ति दावेदार बन कर आया । खूब रहा—प्यादे से प्यादा कट जावेगा । सदाशिवराव को एलिस ने प्रोत्साहित किया । सदाशिवराव ने एक लम्बे खर्रे की अर्जी पेश की । गङ्गाधरराव के वंश का कुर्सी नामा अर्जी में दर्ज किया—ठीक पांचवी पीढ़ी पर । और रानी बिचारी तो किसी भी पीढ़ी में न थी ! गत राजा की धर्मपत्नी ! तो भी क्या हुआ ? स्त्री तो थी । स्त्री राज्य करने लायक ! लेकिन इङ्गलैंड की रानी विक्टोरिया तो पुरुष नही । मगर हिन्दुस्थान इङ्गलेंड नही है । सदाशिवराव की अर्जी को रानी की अर्जी से लड़वा ही तो दिया । डलहौजी रानी के लिये अब क्या खाक करेगा ? और न इस मूर्ख के लिये ही कुछ । मालकम ने ३१ दिसम्बर सन् १८५३ को सदाशिवराव की सिफारिश करते हुये लिखा, 'यदि मृत राजा के पुरखो के किसी मर्द वारिस का ही हक कबूल किया जाना है, तो यह व्यक्ति वास्तव में गद्दी का सब से अधिक निकट का हकदार है ।' सदाशिवराव के पास कही से कुछ धन भी आ गया और वह मजे में राजसी ठाठ से रहने लगा । राज्य मिलने में कितनी कसर रह गई थी ? पोलिटिकल अफसरों ने सिफारिश कर ही दी थी । कोडा हाथ में आ गया । बस । कसर रही थोडी—जीन लगाम घोडी । रानी गंभीरता पूर्वक सारी स्थिति का अवलोकन कर रही थी । वे झाँसी राज्य को अपने किसी उद्देश्य की पूर्ति का साधन मात्र समझती

१५६ झांसी की रानी थी । झाँसी का राज्य उनके लिए सुरपुर न था-किन्तु, जिस सुरपुर के पाने की उनके मन मे लालसा थी, झाँसी उसकी एक सीढी मात्र थी । पति के देहान्त के बाद से रानी की दिनचर्या इस प्रकार हो गई — वह नित्य प्रातःकाल चार बजे स्नान करके आठ बजे तक महादेव का पूजन करती और उसी समय गवैये भजन-गायन सुनाते । फिर ग्यारह बजे तक महल के समीपवर्ती खुले आँगन में घोडे की सवारी, तीरन्दाजी, नेजा चलाना, दौडते हुए घोडे पर चढे चढे, दाँतो से लगाम पकड कर दोनो हाथो से तलवार भाँजना, बन्दूक से निशाना लगाना, मलखब कुश्ती इत्यादि करती थी और अपनी सहेलियो तथा नगर से आने वाली कुछ स्त्रियो को ये सब कामे सिखलाती थी । इन मे भाऊबख्शी की पत्नी प्रमुख थी और बहुधा आने वालो में, झलकारी कोरिन । ग्यारह बजे के उपरान्त रानी फिर स्नान करती और भूखो को खिलाकर तथा कुछ दान-धर्म करके तब भोजन करती । भोजन के उपरात थोडा सा विश्राम । फिर तीन बजे तक ग्यारह सो राम नाम लिख कर आटे की गोलिया मछलियो को खिलाती । उस समय वे किसी से बात-चीत नही करती थी और न कोई उस समय उनके पास बैठ सकता या आ सकता था । वे किसी गूढ चिन्ता, किसी गूढ विचार में निमग्न रहती थी । तीन बजे के उपरान्त सध्या तक फिर वे ही व्यायाम और कसरते—शरीर को फौलाद बनाने की क्रियाये । सध्या के उपरान्त आठ बजे तक कथावार्ता, पुराण, भगवद्गीता का अठारहवा अध्याय और भजन सुनती । इसके बाद एक घटा आगन्तुको को भेट के लिये दिया जाता था । तीसरी बार स्नान करती । इसके बाद थोडे समय तक इष्टदेव का एकान्त ध्यान । फिर ब्यालू भोजन । पश्चात् सुन्दर, मुन्दर और काशीबाई के साथ थोडा सा वार्तालाप और फिर ठीक दस बजे शयन । वे समय की बहुत पाबन्द थी । शिथिलता तो छूकर नही निकली थी ।

लक्ष्मीबाई १५७

राज्य मिलेगा या न मिलेगा—इन दोनो के व्यवधान मे वे महीने चले जा रहे थे । मोरोपन्त ताम्बे और अन्य कर्मचारी यथावत कार्य कर रहे थे । एलिस वर्ग अपना पाया मजबूत बनाने की तैयारी करता चला जा रहा था, बहुत सतर्कता, वडी सावधानी के साथ । जब कई महीने हो गये और डलहौली का उत्तर न आया तब मोरोपन्त, नाना भोपटकर इत्यादि की सम्मति से एलिस और मालकम के द्वारा एक खरीता और भेजा । उसमे पुरानी सधियो को दुहराया गया और जिनके सामने गोद ली गई थी उनके नाम प्रकट किये गये । एलिस ने सिफारिश की । लिखा, 'ओर्छा राज्य के दत्तक की स्वीकृति दी गई है । जैसा ओर्छा राज्य वैसा झासी राज्य । एक को अनुमति देना और दूसरे को न देना अनुचित मालूम होना है ।' यह बात नही कि एलिस रानी की अर्जी का स्वीकृत किया जाना पसन्द करता हो । वह ओर्छा राज्य को दत्तक की स्वीकृति के मिलने पर कुढ गया था — एक अच्छा खासा ग्रास कम्पनी सरकार के मुँह से छुटका दिया गया । कई महीने उपरान्त डलहौजी अवध के दौरे से कलकत्ता लौटा । झाँसी की मिसिल पेश हुई । जगह जगह ऐमे उद्गार जो नाक तक नफरत पैदा करे । बुन्देलखण्ड मे कम्पनी के राज्य की स्थापना हमारे पुरखो की सहायता से हुई है ! हमारी राजभक्ति की कदर की जानी चाहिये । जरूर ! अब किस साधना के लिए राजभक्ति की अटक है ? सन्धिया पवित्र होती हैं । बेशक ! तुम पेशवा के नौकर थे । पेशवा हमसे हारा और उसने अपना स्वामित्व हमारे हवाले किया । अब तुम हमारे नौकर हुये । मर्जी हमारी, माने हम तुम्हारी गोद-वोद को या न माने । डलहौजी सोचता-सोचता, जिस निष्कर्ष पर पहुचा, उसकी काउन्सिल भी उससे सहमत हो गई ।

१५८ झाँसी की रानी डलहौजी ने झाँसी की मिसिल पर २७ फरवरी सन् १८५४ को हुकुम चढ़ाया:— 'झाँसी राज्य पेशवा का आश्रित राज्य था । १८०४ की सन्धि में शिवराव भाऊ ने इस बात को कबूल किया था । हमको ऐसे आश्रित राज्यो में गोद मानने न मानने का अधिकार है । रामचन्द्रराव ने १८३५ मे, जिसको हमने ही सन् १८३२ मे राजा की उपाधि दी थी, मरने से एक दिन पहले किसी को गोद लिया था । वह गोद ब्रिटिश सरकार ने नही मानी थी । हम दामोदरराव की गोद को मानने के लिये बाध्य नही हैं । इसलिये झाँसी राज्य खालसा किया जाता है, और अङ्गरेजी राज्य में मिलाया जाता है । पोलोटिकल एजेट की सिफारिस के अनुसार रानी को मासिक वृत्ति दी जायगी ।' इस हुक्म को कानूनी लिवास ७ मार्च सन् १८५४ को मिल गया । मालकम के पास डलहौजी की आज्ञा आ गई और उसने बिना विलम्ब नीचे लिखा हुआ इश्तिहार एलिस के पास भेज दिया — 'दत्तक को गवर्नर जनरल ने नामन्जूर किया है । इसलिये भारत सरकार की ७ मार्च सन् १८५४ की आज्ञा के अनुसार झाँसी का राज्य ब्रिटिश इलाके में मिलाया जाता है । इस इश्तिहार के जरिये सब लोगो को सूचना दी जाती है कि सम्प्रति झासी प्रदेश का शासन मेजर एलिस के आधीन किया जाता है । इस प्रदेश की सब प्रजा अपने को ब्रिटिश सरकार के अधीन समझे और मेजर एलिस को कर दिया करे और सुख तथा सन्तोष के साथ जीवन निर्वाह करे । १३-३-१८५४ ह० मालकम ।' प्रजा का सुख-सन्तोष ! उसका कल्याण !! राजनीति के पाखण्ड को कैसे बढ़िया मुहाविरे मिले !!!

लक्ष्मीबाई १५६ [ ३२ ] मालकम ने इस घोषणा को बहुत छिपा-लुका कर एलिस के पास भेजा और उसको हिदायत की कि बहुत सावधानी के साथ काम किया जावे, क्योकि उसे मालूम था कि रानी जन-प्रिय हैं, कही झासी की जनता दगा-फसाद न कर बैठे । इसलिये एलिस ने सेना द्वारा झासी का कठोर प्रबन्ध किया। एलिस ने होशियारी के साथ उस घोषणा को एक जेब में रक्खा और दूसरी में पिस्तौल । सशस्त्र अङ्गरक्षको साथ लेकर रानी के पास किले वाले महल में पहुचा । रानी को सूचना दे दी गई थी कि छोटे साहब के पास बडे लाट की आज्ञा आ गई है, उसी को सुनाने आ रहे हैं। मोरोपन्त इत्यादि बहुत दिन से आशा लगाये बैठे थे । दीवान खास में नियुक्त समय पर आ गये । रानी पर्दे के पीछे बैठी । दीवान खास में एक ऊँची कुर्सी पर दामोदरराव । एलिस दृढ पद और अदृढ हृदय के साथ दीवान खास में प्रविष्ट हुआ । मोरोपन्त इत्यादि ने बहुत विनीत भाव के साथ अभिवादन किया । दीवान खास मे इत्र-पान इत्यादि सजे सजाये रक्खे थे । बुर्जो पर तोपो में सलामी दागने के लिये बारूद डाल दी गई थी । एलिस ओठ से ओठ सटाये आया और अपने माथे की शिकनो को समेटकर अभिवादन का उत्तर देता हुआ बैठ गया । मोरोपन्त ने विनीत भाव के साथ कहा, 'साहब, आपको यहा तक आने में बहुत कष्ट हुआ होगा ।' मुश्किल से एलिस का कण्ठ मुखरित हुआ, 'मेरा कर्तव्य है। दुःखदायक कर्तव्य है।' सब लोग सन्नाटे में आ गये । एलिस ने कहा, 'महारानी साहब आ गई हैं ?' दीवान ने उत्तर दिया, 'जी साहब । पर्दे के पीछे विराजमान हैं।'

१६० झाँसी की रानी एलिस ने जेब से मालकम वाली घोषणा निकाली। दरबारियो के कलेजे धक धक करने लगे। कलेजा थाम कर उन लोगो ने घोषणा को सुन लिया। गुलाम गौस खा तोपची अनुकूल घोषणा की आशा से दीवान खास के एक दर के पीछे की तरफ कान लगाये खडा था। प्रतिकूल घोषणा को सुनकर मुँह लटकाये चुपचाप चला गया। जब घोषणा पढ़ी जा चुकी—मोरोपन्त के मुँह से निकला, 'ओफ !' दीवान के मुँह से, 'हाय !' और दरबारियो के मुँह से—'अनहोनी हुई।' दामोदरराव समझने की कोशिश कर रहा था, उसको आभास मिल गया कि कुछ बुरा हुआ है। यकायक ऊँचे परन्तु मधुर स्वर में रानी ने पर्दे के पीछे से कहा, ॥'मै अपनी झासी नही दूगी।'* इन शब्दो से दीवान खास गूँज गया। वायुमण्डल ने उनको अपने भीतर निहित कर लिया। भारत के इतिहास मे वे शब्द पिरो दिये गये। झासी की कलगी में वे शब्द मणि-मुक्ता बन कर चिपक गये। अब एलिस का धड़कता हुआ हृदय कुछ स्थिर हुआ। बोला, 'मुझको गवर्नर जनरल साहब की जो आज्ञा मालकम साहब के द्वारा मिली उसको मैने पेश कर दिया। जो कुछ मेरे सामर्थ्य में था मैने किया। हम सब गवर्नर जनरल साहब की आज्ञा में बधे हुये हैं। परन्तु मै समझता हूँ कि असन्तोष का कोई कारण नही है। पाच हजार रुपया मासिक वृत्ति महारानी साहब और उनके कुटुम्ब के लिये काफी है। यह मानना पड़ेगा कि गवर्नर जनरल साहब ने बहुत उदारता का बर्ताव किया है।'

  • परिशिष्ट देखिये।

लक्ष्मीबाई १६१ एलिस का वाक्य समाप्त नही हुआ था कि पर्दे के पीछे से रानी ने उसी ऊंचे मधुर स्वर में कहा, 'मुझको यह वृत्ति नही चाहिये, मै न - लूंगी।' एलिस ने अधिक ठहरना उचित नही समझा। दीवान से कहता गया, आप तुरन्त मेरे पास आइये।' दीवान ने पान खाने का आग्रह किया। वह पान खाकर चला गया। मुन्दर रानी के पास पर्दे में बैठी थी। जब घोषणा सुनाई गई वह मूर्छित हो गई थी। एलिस के चले जाने पर वह होश में आई। रानी ने कहा, 'क्यो री मूर्छित होना किससे सीखा ? क्या इस छोटे से राज्य के लिये हम लोग जीवत हैं ?' मुन्दर रोने लगी। रानी ने पुचकारा। मोरोपन्त इत्यादि ने समझाया। दीवान ने रानी से पूछा, 'मैं एलिस साहब के पास जाऊँ ? वह बुला गये हैं।' रानी अनुमति देकर रनवास में चली गई। कुछ क्षणो मे ही समाचार सारे नगर में फैल गया। उस समय झासी निवासियो के क्षोभ का ठिकाना न था। रानी की सेना तुरन्त युद्ध छेड देना चाहती थी, परन्तु रानी ने निवारण किया। कहलवाया, 'अभी समय नही आया है।' झलकारी ने जब सुना अपने पति पूरन से कहा, 'छाती वर जाय इन अङ्गरेजन की, गटक लई झासी।'

१६२ झांसी की रानी [ ३३ ] एलिस ने झांसी का 'अङ्गरेजी बन्दोबस्त' आरम्भ कर दिया । दीवान से दफ्तरो की चाभिया लीं। थाने पर अधिकार किया और शहर में अङ्गरेजी राज्य और अपने अधिकार की डोडी पिटवा दी । तहसीलो मे तुरन्त समाचार भेजा और वहा भी कडे प्रबन्ध की व्यवस्था कर दी । दीवान रानी को सब बातो की सूचना देकर अपने घर उदास चला गया। रानी के नित्य नियम मे कोई अन्तर नही आया। अपने कार्य- क्रम के अनुसार जब वे विश्राम के लिये बैठी तब मुन्दर, सुन्दर और काशीबाई उनके पास आ गई । वे अपने आभूषण उतार आई थी । रानी ने कहा, 'आभूषण क्यो उतार आई हो ? क्या इसी समय रणभूमि में चलना है ?' मुन्दर सिसकने लगी । सुन्दर और काशी के नेत्र तरल हो गये । रानी बोली, 'ये चिन्ह ,तो असमर्थता और अशक्ति के हैं। अपने सब आभूषण पहिनो और इस प्रकार रहो मानो कुछ हुआ ही नही है।' मुन्दर ने रानी के पैर पकड लिये उसको हिलकी नही समाती थी । रानी का कठ भी थोडा रुद्ध हुआ। उन्होने भौहे सिकोडी। एक ओर देखने लगी । काशीबाई रुदन करती हुई,बोली, 'वाईसाहब, बाईसाहब !' सुन्दर ने करुण स्वर में कहा, 'सरकार अब क्या होगा ? रानी ने अपने को सहज ही संयत कर लिया । मुन्दर के सिर पर हाथ फेरा। उसकी आंखे आसुओ से भरी हुई थी । सुन्दर और काशी की भी। चंचल आसुओ में होकर उन तीनो ने रानी के तेजस्वी रूप को देखा-कई लक्ष्मीबाईया, कई सतेज नेत्र दिखलाई पडे । उन्होने अपनी आंखे' पोछीं । रानी ने कहा, 'ये आसू बल का क्षय करेगे। अभी तो अपने कार्य का प्रारम्भ भी नही हुआ है। सोचो, जब छत्रपति के उपरान्त शम्भू जी

लक्ष्मीबाई १६३ मारे गये, साहू समाप्त, राजाराम गत तब ताराबाई की गाठ में क्या रह गया था ? इतने बड़े मुगल सम्राट को ताराबाई कैसे परास्त कर सकी ? उसने स्वराज्य की बागडोर को कैसे बढ़ाया ? रो-रोकर ? कपड़े और गहने फेक-फेककर ? भूखो मर मर कर ? और सोचो, जीजाबाई को पति का सुख नही मिला । उन्होने छत्रपति को पाला । काहे के लिये ? किस आशा से ? गद्दी पर विठलाने के लिये ? उन्होने इतना तप, इतना त्याग अपने पुत्र को केवल हाथी की सवारी और नरम नरम गद्दी पर विराजमान कराने के लिये किया था ?' वे सहेलिया सचेत हुई । रानी कहती गईं, 'हमको जो कुछ करना है उसकी दिशा निश्चित है । मार्ग में विघ्न बाधाये तो आती ही हैं । खरीते का स्वीकृत न होना केवल एक बाधा ही है । स्वीकृत हो जाता तो क्या हम लोग केवल सो जाने के लिये ही जीवित रहती ? भगवान कृष्ण की आज्ञा को याद रक्खो कि हमको केवल कर्म करने का अधिकार है । कर्म के फल का नही । देखो, छत्रपति के उपरान्त जिन लोगो ने स्वराज्य के आदर्श को आगे बढ़ाया और उसकी जडे प्रबल बनाई, वे बाधाओ को डटकर प्रतिरोध करते रहते थे । जिन लोगो की लालसा अपने लिये फलो की ओर गई, वे गिर गये और स्वराज्य की धारा धीमी पड़ गई । परन्तु वह सूखी कभी नही । दादा बाजीराव पेशवा हतप्रभ होकर बिठूर चले आये । परन्तु हम लोगो को वे स्वराज्य की शिक्षा देने से कभी नही चूके । यदि हिन्दुस्थान में कोई भी उस पवित्र काम को अपने हाथ मे न ले, तो भी, मैने अपने कृष्ण के सामने, अपनी आत्मा के भीतर उसका बीड़ा उठाया है । करूँगी और फिर करूँगी । चाहे मेरे पास खडे होने के लिये हाथ भर भूमि ही क्यो न रह जाय । मानलो कि मैं सफल न हो पाई, तो भी जिस स्वराज्य धारा को आगे बढ़ा जाऊँगी, वह अक्षय रहेगी । उसी महावाक्य को सदा याद रक्खो—हमको केवल कर्म करने का अधिकार है, फल का कभी नही । हमको एक बड़ा सन्तोष है । जनता । हमारे साथ

१६४ झाँसी की रानी । है । जनता सब कुछ है । जनता अमर है । इसको स्वराज्य के सूत्र में बाधना चाहिये । राजाओ को अङ्गरेज भले ही मिटादे, परन्तु जनता को नही मिटा सकते । एक दिन आवेगा जब इसी जनता के आगे होकर मैं स्वराज्य की पताका फहराऊँगी ।' सहेलियो की आखो में भी चमत्कार उत्पन्न हो गया । रानी बोली । 'मुझ से आज एक भूल हो गई है । मुझको एलिस के सामने कुछ नही कहना चाहिये था । मेरे उस वाक्य से वह अपने सङ्गी अङ्गरेज़ो सहित चौकन्ना हो जागया । वृत्ति भी अस्वीकृत नही करना चाहिये थी ।' काशी ने स्थिर स्वर मे प्रश्न किया, 'अब क्या करना है ?' रानी ने कहा, 'अङ्गरेज़ जाति बहुत धूर्त है । उसका सामना चाणक्य नीति ही से हो सकता है। मै वृत्ति को स्वीकृत करूँगी और आगे सावधानी के साथ काम करूंगी । मैं दामोदरराव की ओर से विनय प्रार्थना की लिखा पढी जारी रक्खूँगी । विलायत में अपील भिजवाऊँगी । जिसमे एलिस इत्यादि मेरी झाँसी न देने वाली बात की यथार्थता को अपनी समझ से दूर कर दे और, जनता अपनी स्मृति में इस बात को पकडे रहे, कि मै और झासी अभी बनी हैं ।' इतने मे वहा दामोदरराव आया । रानी ने अपनी गोद में बिठला लिया । दामोदरराव ने पूछा, 'माता, क्या यह राज्य चला जावेगा ?' रानी—'यह राज्य चला जावेगा तो चला जाने दो । स्वराज्य आवेगा ।' दामोदरराव --'स्वराज्य क्या ?' रानी मुस्कराई । बोली, 'अभी भोजन करने चलो । फिर कभी बतलाऊँगी ।' रानी ने पैन्शन लेने की स्वीकृति लिखवा भेजी ।

लक्ष्मीबाई १६५ [ ३४ ] झाँसी की जनता के क्षोभ का समाचार, एलिस को मिल गया । उसने अपने मन मे एक सामञ्जस्य स्थिर किया और उसके अनुसार मालकम को लिखा । मालकम ने गवर्नर जनरल को सिफारिश की:— 'रानी लक्ष्मीबाई को आजीवन पाच हज़ार रुपये दिये जावें और नगर वाला राजमहल उनकी सम्पत्ति समझी जाकर उन्ही को दे दिया जाय । रानी या उनके नौकरो पर ब्रिटिश अदालतो की सत्ता न रहे । अपने नौकरो के अपराधो का वे स्वय न्याय करे । राजा का निजका धन, रियासत के लेन देन का हिसाव करके जो बाकी बचे वह, और राज्य के सब जवाहिरात, रानी को दे दिये जावे । राजा और रानी के नातेदारो की एक सूची बनाई जाय, और उन लोगो के निर्वाह की व्यवस्था कर दी जाय ।' डलहौजी ने ये सिफारिशे-स्वीकार की, केवल एक बात नही मानी । वह यह कि राजा की निज की सम्पत्ति और रियासत के जवाहिरात रानी के हो । उसने तै किया कि दामोदरराव के होगे क्योकि यद्यपि वह राज्य का अधिकारी नही है, मगर हिन्दू शास्त्र के अनुसार गगाधरराव की निजी सम्पत्ति का अधिकारी अवश्य है । डलहौजी ने यह आज्ञा २५ मार्च सन् १८५४ को दी और तदनुसार पोलिटिकल एजेन्ट ने झासी के खजाने से छ: लाख रुपये निकाल कर दामोदरराव के नाम से अङ्गरेजी खजाने में जमा कर दिये और निश्चय किया कि दामोदरराव को बालिग होने पर ब्याज समेत लौटा दिये जावेगे । रियासत के सब जवाहिरात और सोने-चादी के आभूषण इत्यादि 'दामोदरराव हेतु' रानी के आधीन कर दिये । ईमान और राजनीति दोनो की परस्पर निभा दी । अब अङ्गरेजी बेलन अपरिहार्य और अनवरत गति से चला । सबसे पहले जो हुआ, वह रानी से किले का खाली कराना था । किले से एक बडी सुरङ्ग हाथीखाने को और वहा से शहर वाले महल को

१६६ झाँसी की रानी गई थी। रानी ने इसके द्वार को मुँदवा दिया और वह किले से शहर वाले महल में सहेलियो सहित चली आईं। अग्रेजी पल्टन ने किले पर कब्ज़ा कर लिया। उसके अग्रेज़ अफ़सरो ने रात को कबाब-शराब से जश्न मनाया। पल्टन के बहुत से हिन्दुस्थानी सिपाही आँसू बहाते हुये सोये। दूसरे दिन बहुत सा रियासती फ़ौजी सामान नष्ट किया गया और बडी बडी तोपो को निरुपयोगी कर डाला गया। झाँसी राज्य की सम्पूर्ण सेना एक कलम बरखास्त कर दी गई—उनको छ छ महीने का वेतन देने की उदारता जरूर की गई। सिपाही वेतन लेकर महल के सामने से निकले। वे रानी का एक अन्तिम दर्शन लेना चाहते थे। रानी झरोखे पर पर्दे के पीछे आ गई। सिपाही आसू बहाते जाते थे और रानी माता, रानी माता कहते हुए उनको प्रणाम करते चले जाते थे। रानी पर्दे के बाहर केवल अपने जुडे हुए हाथो नमस्कार करती जाती थी। रानी ने सिपाहियो के आसू देखकर भी अपने आँसू किसी आश्चर्यपूर्णा क्रिया से रोके। छ छ मास वाले वेतन की उदारता केवल सिपाहियो तक सीमित रही बाकी सब रियासती नौकर खाली जेब घर चले गये। जिसको पटवार- गिरी और कानूनगोई से पेट भरना था उनकी अर्जिया जल्दी जल्दी मंजूर करली गईं। एक बख्शिशअली झासी नगर के सब फाटको का फाटकदार था और रियासती कर्मचारियो मे उसका बहुत ऊँचा स्थान था। उसको झासी के जेल की दरोगाई मिल गई। लगभग सब जागीरदार खत्म कर दिये गये। केवल गुरसराय, कटेरा और गुसाइयो की जागीरे बच गई। वे इसलिये कि बेलन के नीचे कुछ कडे कंकड बच ही जाते हैं। छोटे जागीरदारो में आनन्दराय भी था। उसके पास ताम्र-पत्र थे। छीन लिये गये और बदले में कागज पर नकले दे दी गईं। औरो की तरह आनन्दराय से भी पूछा गया, 'नौकरी करोगे ?'