झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६ झाँसी की रानी गई थी। रानी ने इसके द्वार को मुँदवा दिया और वह किले से शहर वाले महल में सहेलियो सहित चली आईं। अग्रेजी पल्टन ने किले पर कब्ज़ा कर लिया। उसके अग्रेज़ अफ़सरो ने रात को कबाब-शराब से जश्न मनाया। पल्टन के बहुत से हिन्दुस्थानी सिपाही आँसू बहाते हुये सोये। दूसरे दिन बहुत सा रियासती फ़ौजी सामान नष्ट किया गया और बडी बडी तोपो को निरुपयोगी कर डाला गया। झाँसी राज्य की सम्पूर्ण सेना एक कलम बरखास्त कर दी गई—उनको छ छ महीने का वेतन देने की उदारता जरूर की गई। सिपाही वेतन लेकर महल के सामने से निकले। वे रानी का एक अन्तिम दर्शन लेना चाहते थे। रानी झरोखे पर पर्दे के पीछे आ गई। सिपाही आसू बहाते जाते थे और रानी माता, रानी माता कहते हुए उनको प्रणाम करते चले जाते थे। रानी पर्दे के बाहर केवल अपने जुडे हुए हाथो नमस्कार करती जाती थी। रानी ने सिपाहियो के आसू देखकर भी अपने आँसू किसी आश्चर्यपूर्णा क्रिया से रोके। छ छ मास वाले वेतन की उदारता केवल सिपाहियो तक सीमित रही बाकी सब रियासती नौकर खाली जेब घर चले गये। जिसको पटवार- गिरी और कानूनगोई से पेट भरना था उनकी अर्जिया जल्दी जल्दी मंजूर करली गईं। एक बख्शिशअली झासी नगर के सब फाटको का फाटकदार था और रियासती कर्मचारियो मे उसका बहुत ऊँचा स्थान था। उसको झासी के जेल की दरोगाई मिल गई। लगभग सब जागीरदार खत्म कर दिये गये। केवल गुरसराय, कटेरा और गुसाइयो की जागीरे बच गई। वे इसलिये कि बेलन के नीचे कुछ कडे कंकड बच ही जाते हैं। छोटे जागीरदारो में आनन्दराय भी था। उसके पास ताम्र-पत्र थे। छीन लिये गये और बदले में कागज पर नकले दे दी गईं। औरो की तरह आनन्दराय से भी पूछा गया, 'नौकरी करोगे ?'