झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई १६७ 'कौनसी ?' 'पटवारगिरी ।' 'नही कर सकूँगा । खेती से पेट पालूंगा ।' 'नायव थानेदारी करोगे ?' 'कर लूँगा ।' जहाँ सैकडो और सहस्रों की तादाद में जनता के पढ़े-लिखे लोग रियासत में थोडा वेतन भी पाकर अपनी गुजर करते थे, वहाँ रियासत के केवल थोडे से ऊँचे कर्मचारी और छोटे-छोटे जागीरदार अङ्गरेजी राज्य में छोटे-छोटे से पदो पर कुछ अधिक वेतन देकर नियुक्त कर दिये गये । बाकी बडे-बडे पदो पर मोटा वेतन पाने वाले थोडे से अङ्गरेज़ मुकर्रर हो गये । ठीक तो है—राजा की जगह अङ्गरेज़ कमिश्नर, एक दर्जन दीवानो की जगह एक डिप्टी-कमिश्नर और दो-तीन अङ्गरेज परगना-हाकिम । सहस्रो सिपाहियो की जगह दो सौ तीन सौ अँग्रेज सैनिक । दरबार समाप्त—कवि, चित्रकार, धुरपदिये, सितारिये, नर्तकियां नर्तक, साटमार, कारीगरी सब की विदा ! उनकी जगह क्लब, डाकबङ्गला और ऊँचे-नीचे, छोटे-बडे सब हिन्दुस्थानियो का अनिवार्य माथा-टेकू सलाम । वह भी, अर्दली को हक- दस्तूर दो, जूते उतार कर साहब की विलायती प्रतिमा के सामने नतमस्तक जाओ, तब नसीब । कोरी, करघे, कपडे सब गायब—केवल एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण क्रिया जारी—गङ्गाजी के किनारो से चांदी-सोने का शोषण करना और टेम्स जी के किनारो पर निचोड देना । हिन्दुस्थान उस ओर चलाया जाने लगा जिसको आजकल की भाषा में कह सकते हैं— 'महफिल उनकी साकी उनका आँखें अपनी बाकी उनका ।'*
- अकबर इलाहाबादी ।