झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६८ झाँसी की रानी झासी प्रदेश के अनेक लोग रानी के पास प्रणाम करने जाते थे और पूछते थे— 'सरकार की आज्ञा हो तो अङ्गरेजो की नौकरी करले ?' रानी उत्तर दिलवाया करती थी, 'करलो, परन्तु इस बात को मत भूलना कि कभी झाँसी राज्य में तुम्हारा कोई स्थान था ।' सेठ-साहूकारो के उलहनो के मारे रानी हैरान थी । कोई कुछ कह जाता, कोई कुछ । 'आप कुछ उपाय क्यो नही करती ?' 'विलायत खरीता भेजिये । झाँसी को यो ही तो अङ्गरेजो के हाथ में नही चला जाने देना चाहिये ।' 'हम लोगो से जितना रुपया चाहिये हो लीजिये और मुकद्दमा लड़िये ।' 'हम लोग साहबो के बङ्गलो पर सलाम करने नही जाना चाहते इसलिये कम से कम शहर तो अपने अधिकार में लीजिये ।' 'हमारा सारा व्यापार ठप हो गया है । राजदरबार, सरदार कोई नही रहे—अब हमको कोई नही पूछता ।' किसानो के ऊपर जो लगान रियासत में कायम था, वह पूरा कभी वसूल नही हो पाता था--कभी आधा कभी पर्धा । और वह भी प्राय अन्न के रूप में । अब कागजो में लगान कम हुआ; परन्तु जितना लिखा गया उसमे से वसूली कौडी कम की नही की गई—और सब सिक्को में । भूमि का स्वामी राजा पुस्तको में अवश्य था, परन्तु नित्य के जीवन में किसान को अपनी भूमि किसी को भी देने का अधिकार था । अङ्गरेजी राज्य में वसूली करने के लिये पहले-पहल हर गाव मे ठेकेदार नियुक्त किये गये । फिर इन्ही को जमीदारियाँ 'अता' कर दी गईं । इस श्रेणी के खडे कर देने से किसान नीचे धसक गये । भूमि के ऊपर उनका जो अधिकार था, वह थोडे से जमीदारो के हाथ में पहुँच गया । इन दोनो श्रेणियो के बीच के व्यवधान को सतुलित रखने के लिये—अथवा जमीदार-किसान सघर्ष में