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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 526 में से

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लक्ष्मीबाई १६६ किसान अभी सिर न उठा पावे इसके लिये—साहब, साहब की कचहरी और साहब का बङ्गला उद्भूत हुये । रह गई ग्राम पंचायतें सो उनके हाथ में केवल जात-पांत के झगडे निवटाने का हथकण्डा रह गया । बाकी सारी शक्ति सौतिया-डाह रखने वाली अङ्गरेजी अदालत के 'इजलास' में चली गई । इङ्गलैंड के कुछ आत्मनिष्ठ पुरुषो ने प्रतिवाद किये, परन्तु इन प्रतिवादो का कोई प्रभाव नही हुआ । इङ्गलैंड सामन्त युग को लांघकर, माध्यम वर्ग के नेतृत्व में आ चुका था । फ्रांस की क्रांति से घृणा करते हुये भी, इङ्गलैंड के मध्यम वर्ग ने फ्रांस-क्रान्ति के तीन मोहक शब्द 'न्याय' 'समता' और 'भाईचारा' अपने साहित्य में सोख लिये । इङ्गलैंड की तत्कालीन राजनीति भी प्रभावित हुई । माध्यम वर्ग के एडमन्ड बर्क, शेरीडीन इत्यादि ने सिंहनाद किया । राजनीति के अमर सिद्धान्त प्रकट हुये । मध्यम वर्ग दृढतापूर्वक आगे बढा और इंगलैंड का अधिकार क्षेत्र उसने अपने हाथ मे कर लिया । अधिकार हाथ में आते ही दायित्व ने उदारता को पीस डाला, क्योकि निम्न वर्ग की असख्य जनता उस अधिकार ससर्ग से दूर थी । जो मध्यम वर्ग उदार स्वरो में ऊची राजनीति के राग अलापा करता था वह हर कदम पर हां-ना के सिर हिलाने लगा । मध्यम वर्ग के उदारवृत्ति वाले जो लोग अधिकार क्षेत्र से बाहर थे, और प्रयत्न करने पर भी जो उस क्षेत्र में नही घुस पाते थे, उसकी कौन सुनता था ? रानी ने विलायत को अपील भेजी । उसका कभी जवाब ही नही मिला । पार्लियामेंट में भी थोडी सी बहस हुई । एक मेम्बर ने कम्पनी के डायरेक्टरो का पुराना मत उद्धृत किया । 'अपने इलाके को और अधिक बढाना बुद्धिमानी का काम नही है । राज्य-विस्तार की नीति सकटपूर्ण है और ब्रिटिश जाति की भावना प्रतिष्ठा और नीति के प्रतिकूल है ।'

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