झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई १६६ किसान अभी सिर न उठा पावे इसके लिये—साहब, साहब की कचहरी और साहब का बङ्गला उद्भूत हुये । रह गई ग्राम पंचायतें सो उनके हाथ में केवल जात-पांत के झगडे निवटाने का हथकण्डा रह गया । बाकी सारी शक्ति सौतिया-डाह रखने वाली अङ्गरेजी अदालत के 'इजलास' में चली गई । इङ्गलैंड के कुछ आत्मनिष्ठ पुरुषो ने प्रतिवाद किये, परन्तु इन प्रतिवादो का कोई प्रभाव नही हुआ । इङ्गलैंड सामन्त युग को लांघकर, माध्यम वर्ग के नेतृत्व में आ चुका था । फ्रांस की क्रांति से घृणा करते हुये भी, इङ्गलैंड के मध्यम वर्ग ने फ्रांस-क्रान्ति के तीन मोहक शब्द 'न्याय' 'समता' और 'भाईचारा' अपने साहित्य में सोख लिये । इङ्गलैंड की तत्कालीन राजनीति भी प्रभावित हुई । माध्यम वर्ग के एडमन्ड बर्क, शेरीडीन इत्यादि ने सिंहनाद किया । राजनीति के अमर सिद्धान्त प्रकट हुये । मध्यम वर्ग दृढतापूर्वक आगे बढा और इंगलैंड का अधिकार क्षेत्र उसने अपने हाथ मे कर लिया । अधिकार हाथ में आते ही दायित्व ने उदारता को पीस डाला, क्योकि निम्न वर्ग की असख्य जनता उस अधिकार ससर्ग से दूर थी । जो मध्यम वर्ग उदार स्वरो में ऊची राजनीति के राग अलापा करता था वह हर कदम पर हां-ना के सिर हिलाने लगा । मध्यम वर्ग के उदारवृत्ति वाले जो लोग अधिकार क्षेत्र से बाहर थे, और प्रयत्न करने पर भी जो उस क्षेत्र में नही घुस पाते थे, उसकी कौन सुनता था ? रानी ने विलायत को अपील भेजी । उसका कभी जवाब ही नही मिला । पार्लियामेंट में भी थोडी सी बहस हुई । एक मेम्बर ने कम्पनी के डायरेक्टरो का पुराना मत उद्धृत किया । 'अपने इलाके को और अधिक बढाना बुद्धिमानी का काम नही है । राज्य-विस्तार की नीति सकटपूर्ण है और ब्रिटिश जाति की भावना प्रतिष्ठा और नीति के प्रतिकूल है ।'