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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

१६६ झाँसी की रानी गई थी। रानी ने इसके द्वार को मुँदवा दिया और वह किले से शहर वाले महल में सहेलियो सहित चली आईं। अग्रेजी पल्टन ने किले पर कब्ज़ा कर लिया। उसके अग्रेज़ अफ़सरो ने रात को कबाब-शराब से जश्न मनाया। पल्टन के बहुत से हिन्दुस्थानी सिपाही आँसू बहाते हुये सोये। दूसरे दिन बहुत सा रियासती फ़ौजी सामान नष्ट किया गया और बडी बडी तोपो को निरुपयोगी कर डाला गया। झाँसी राज्य की सम्पूर्ण सेना एक कलम बरखास्त कर दी गई—उनको छ छ महीने का वेतन देने की उदारता जरूर की गई। सिपाही वेतन लेकर महल के सामने से निकले। वे रानी का एक अन्तिम दर्शन लेना चाहते थे। रानी झरोखे पर पर्दे के पीछे आ गई। सिपाही आसू बहाते जाते थे और रानी माता, रानी माता कहते हुए उनको प्रणाम करते चले जाते थे। रानी पर्दे के बाहर केवल अपने जुडे हुए हाथो नमस्कार करती जाती थी। रानी ने सिपाहियो के आसू देखकर भी अपने आँसू किसी आश्चर्यपूर्णा क्रिया से रोके। छ छ मास वाले वेतन की उदारता केवल सिपाहियो तक सीमित रही बाकी सब रियासती नौकर खाली जेब घर चले गये। जिसको पटवार- गिरी और कानूनगोई से पेट भरना था उनकी अर्जिया जल्दी जल्दी मंजूर करली गईं। एक बख्शिशअली झासी नगर के सब फाटको का फाटकदार था और रियासती कर्मचारियो मे उसका बहुत ऊँचा स्थान था। उसको झासी के जेल की दरोगाई मिल गई। लगभग सब जागीरदार खत्म कर दिये गये। केवल गुरसराय, कटेरा और गुसाइयो की जागीरे बच गई। वे इसलिये कि बेलन के नीचे कुछ कडे कंकड बच ही जाते हैं। छोटे जागीरदारो में आनन्दराय भी था। उसके पास ताम्र-पत्र थे। छीन लिये गये और बदले में कागज पर नकले दे दी गईं। औरो की तरह आनन्दराय से भी पूछा गया, 'नौकरी करोगे ?'

लक्ष्मीबाई १६७ 'कौनसी ?' 'पटवारगिरी ।' 'नही कर सकूँगा । खेती से पेट पालूंगा ।' 'नायव थानेदारी करोगे ?' 'कर लूँगा ।' जहाँ सैकडो और सहस्रों की तादाद में जनता के पढ़े-लिखे लोग रियासत में थोडा वेतन भी पाकर अपनी गुजर करते थे, वहाँ रियासत के केवल थोडे से ऊँचे कर्मचारी और छोटे-छोटे जागीरदार अङ्गरेजी राज्य में छोटे-छोटे से पदो पर कुछ अधिक वेतन देकर नियुक्त कर दिये गये । बाकी बडे-बडे पदो पर मोटा वेतन पाने वाले थोडे से अङ्गरेज़ मुकर्रर हो गये । ठीक तो है—राजा की जगह अङ्गरेज़ कमिश्नर, एक दर्जन दीवानो की जगह एक डिप्टी-कमिश्नर और दो-तीन अङ्गरेज परगना-हाकिम । सहस्रो सिपाहियो की जगह दो सौ तीन सौ अँग्रेज सैनिक । दरबार समाप्त—कवि, चित्रकार, धुरपदिये, सितारिये, नर्तकियां नर्तक, साटमार, कारीगरी सब की विदा ! उनकी जगह क्लब, डाकबङ्गला और ऊँचे-नीचे, छोटे-बडे सब हिन्दुस्थानियो का अनिवार्य माथा-टेकू सलाम । वह भी, अर्दली को हक- दस्तूर दो, जूते उतार कर साहब की विलायती प्रतिमा के सामने नतमस्तक जाओ, तब नसीब । कोरी, करघे, कपडे सब गायब—केवल एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण क्रिया जारी—गङ्गाजी के किनारो से चांदी-सोने का शोषण करना और टेम्स जी के किनारो पर निचोड देना । हिन्दुस्थान उस ओर चलाया जाने लगा जिसको आजकल की भाषा में कह सकते हैं— 'महफिल उनकी साकी उनका आँखें अपनी बाकी उनका ।'*

  • अकबर इलाहाबादी ।

१६८ झाँसी की रानी झासी प्रदेश के अनेक लोग रानी के पास प्रणाम करने जाते थे और पूछते थे— 'सरकार की आज्ञा हो तो अङ्गरेजो की नौकरी करले ?' रानी उत्तर दिलवाया करती थी, 'करलो, परन्तु इस बात को मत भूलना कि कभी झाँसी राज्य में तुम्हारा कोई स्थान था ।' सेठ-साहूकारो के उलहनो के मारे रानी हैरान थी । कोई कुछ कह जाता, कोई कुछ । 'आप कुछ उपाय क्यो नही करती ?' 'विलायत खरीता भेजिये । झाँसी को यो ही तो अङ्गरेजो के हाथ में नही चला जाने देना चाहिये ।' 'हम लोगो से जितना रुपया चाहिये हो लीजिये और मुकद्दमा लड़िये ।' 'हम लोग साहबो के बङ्गलो पर सलाम करने नही जाना चाहते इसलिये कम से कम शहर तो अपने अधिकार में लीजिये ।' 'हमारा सारा व्यापार ठप हो गया है । राजदरबार, सरदार कोई नही रहे—अब हमको कोई नही पूछता ।' किसानो के ऊपर जो लगान रियासत में कायम था, वह पूरा कभी वसूल नही हो पाता था--कभी आधा कभी पर्धा । और वह भी प्राय अन्न के रूप में । अब कागजो में लगान कम हुआ; परन्तु जितना लिखा गया उसमे से वसूली कौडी कम की नही की गई—और सब सिक्को में । भूमि का स्वामी राजा पुस्तको में अवश्य था, परन्तु नित्य के जीवन में किसान को अपनी भूमि किसी को भी देने का अधिकार था । अङ्गरेजी राज्य में वसूली करने के लिये पहले-पहल हर गाव मे ठेकेदार नियुक्त किये गये । फिर इन्ही को जमीदारियाँ 'अता' कर दी गईं । इस श्रेणी के खडे कर देने से किसान नीचे धसक गये । भूमि के ऊपर उनका जो अधिकार था, वह थोडे से जमीदारो के हाथ में पहुँच गया । इन दोनो श्रेणियो के बीच के व्यवधान को सतुलित रखने के लिये—अथवा जमीदार-किसान सघर्ष में

लक्ष्मीबाई १६६ किसान अभी सिर न उठा पावे इसके लिये—साहब, साहब की कचहरी और साहब का बङ्गला उद्भूत हुये । रह गई ग्राम पंचायतें सो उनके हाथ में केवल जात-पांत के झगडे निवटाने का हथकण्डा रह गया । बाकी सारी शक्ति सौतिया-डाह रखने वाली अङ्गरेजी अदालत के 'इजलास' में चली गई । इङ्गलैंड के कुछ आत्मनिष्ठ पुरुषो ने प्रतिवाद किये, परन्तु इन प्रतिवादो का कोई प्रभाव नही हुआ । इङ्गलैंड सामन्त युग को लांघकर, माध्यम वर्ग के नेतृत्व में आ चुका था । फ्रांस की क्रांति से घृणा करते हुये भी, इङ्गलैंड के मध्यम वर्ग ने फ्रांस-क्रान्ति के तीन मोहक शब्द 'न्याय' 'समता' और 'भाईचारा' अपने साहित्य में सोख लिये । इङ्गलैंड की तत्कालीन राजनीति भी प्रभावित हुई । माध्यम वर्ग के एडमन्ड बर्क, शेरीडीन इत्यादि ने सिंहनाद किया । राजनीति के अमर सिद्धान्त प्रकट हुये । मध्यम वर्ग दृढतापूर्वक आगे बढा और इंगलैंड का अधिकार क्षेत्र उसने अपने हाथ मे कर लिया । अधिकार हाथ में आते ही दायित्व ने उदारता को पीस डाला, क्योकि निम्न वर्ग की असख्य जनता उस अधिकार ससर्ग से दूर थी । जो मध्यम वर्ग उदार स्वरो में ऊची राजनीति के राग अलापा करता था वह हर कदम पर हां-ना के सिर हिलाने लगा । मध्यम वर्ग के उदारवृत्ति वाले जो लोग अधिकार क्षेत्र से बाहर थे, और प्रयत्न करने पर भी जो उस क्षेत्र में नही घुस पाते थे, उसकी कौन सुनता था ? रानी ने विलायत को अपील भेजी । उसका कभी जवाब ही नही मिला । पार्लियामेंट में भी थोडी सी बहस हुई । एक मेम्बर ने कम्पनी के डायरेक्टरो का पुराना मत उद्धृत किया । 'अपने इलाके को और अधिक बढाना बुद्धिमानी का काम नही है । राज्य-विस्तार की नीति सकटपूर्ण है और ब्रिटिश जाति की भावना प्रतिष्ठा और नीति के प्रतिकूल है ।'

१७० झांसी की रानी उस मेम्बर ने अन्तरराष्ट्रीय कानून के न्याय की भी दुहाई दी। उस मेम्बर के वाक्चातुर्य की तारीफ हुई और बुद्धि की निन्दा। दूसरी अगस्त सन् १८५४ को अपनी सब पूर्व प्रतिज्ञाओ का विस्मरण करके ब्रिटिश सरकार ने झासी राज्य को 'अग्रेजी इलाके' में मिला लेने की मुहर लगा दी। गवर्नर जनरल की, की हुई काररवाई मन्जूर कर ली गई। चुक्खी चौधरी मगन गन्धी, लाला श्याम, झम्मी और भग्गी दाउजू पूरन कोरी और छन्दी चमार इत्यादि सब अपनी विगत स्वतंत्रता की ओर हसरत भरी निगाहो से देखते रह गये। झलकारी कोरिन के वस्त्राभूषणो, की चटक चली गई।

लक्ष्मीबाई १७१ [ ३५ ] अङ्गरेजी क्लब घर के सामने वाले मैदान की दूबा साफ कराई जा रही थी। धूप में मजदूर हाँफ हाँफ कर काम कर रहे थे । मजदूरो का मुखिया खडे खडे काम का ढग बतला रहा था । एलिस चाहता था काम ज्यादा जल्दी हो । सन्ध्या के पहले ही कमिश्नर स्कीन, डिप्टी-कमिश्नर गार्डन और फौजी अफसर कप्तान डनलप इत्यादि की बैठक होनी थी । कुछ फल-फलारी की भी योजना थी । झाँसी को कमिश्नरी शासन का गौरव प्राप्त हुआ । इसमें कई जिले शामिल कर दिये गये । झाँसी का एक अलग जिला बना । इस झाँसी जिले का पहला डिप्टी-कमिश्नर कप्तान गार्डन हुआ, जो गंगाधरराव को चिरौरी किया करता था । मैदान की सफाई करने वाले मजदूर जरा ढीले पड पड जा रहे थे । एलिस को क्षोभ हुआ । उसने मजदूरो के मुखिया को डांटा । मुखिया ने कहा 'ये मुफ्तखोर हैं हुजूर । डर के मारे मैंने अभी तक इनकी मारपीट नही की । अब हड्डी-पसली तोडता हू ।' एलिस बोला, 'मैं इस समय हड्डी-पसली तोडना पसन्द नही करता, मगर इनसे काम लो । काफी पैसा दिया जाता है । जब रियासत थी तब तो इनको मुफ्त में काम करना पडता था ।' एलिस बगले में चला गया । मुखिया ने सोचा, 'रियासत में काम मुफ्त में करते थे तो रियायते भी बहुत पाये हुये थे । लडकी-लडके के व्याह के समय, देखें अब कौन इन लोगो की मदद करता है ।' चिल्लाकर मजदूरो को काम करने के लिये सम्बोधन करने लगा । पास जाकर उसने कहा 'अब, रियासत नही है अङ्गरेजी सरकार उठी है । ठिकाने से काम करो नही तो खाल टूटती फिरेगी ।' मजदूरो ने कुडकुडाते हुये कहा— 'न हमें रियासत जागीर लगाये थी और न अङ्गरेज लगा देंगे ।' 'जितना खोदेंगे उतना पी पायेंगे ।'

१७२ झांसी की रानी 'पर यह जरूर है कि अपना अपना ही है।' 'अपने को मार खाते थे तो उनसे लड भी जाते थे। इनलोगो से तो कुछ कह भी नहीं सकते।' मुखिया ने मना किया, 'झंझट की बात मत करो। साहब अपनी भाषा खूब समझता है। सुन लेगा तो तुम्हारी और हमारी जान लेलेगा।' मजदूर सन्ध्या के पहले ही काम समाप्त करके अपनी मजदूरी लेकर चले गये। ठीक समय पर अङ्गरेज अफसरों की बैठक हुई। खानपान के साथ ही काम काज की बात जारी रही। एलिस—'मुझको अन्देशा था कि कही झाँसी की जनता हटाये हुये रियासती सिपाहियो को भडका कर, दंगा न करवादे।' डनलप—'हमारी पलटने तैयार थी।' स्कीन—'बन्दोबस्त अच्छा था।' गार्डन—'मैने सुना है कि वे सब रानी के पास गये थे।' एलिस—'स्वाभाविक है।' गार्डन—'परन्तु रानी ने उनको कोई प्रोत्साहन नही दिया। समझदार स्त्री है।' स्कीन—'मुझको उस स्त्री पर अचरज होता है। सुनता हूँ ऐसी घुड सवार है, कि पुरुष दातो तले उँगली दबाते हैं।' गार्डन—'हिन्दुस्थानी कसरते खूबी के साथ करती है।' एलिस—मुझे शका थी कि कही सती होने की कोशिश न करे। मै गंगाधरराव के दाह के समय कप्तान मार्टिन को ससैन्य ले गया था।' गार्डन—'मै उन दिनो यहा न था।' स्कीन—'इस प्रदेश के लोग शान्ति-प्रिय और कानून-भक्त हैं। यहा पहले दो वार सरकारी अमल रह चुका है, इसलिये हमारा शासन पसन्द करते हैं। न मालूम इस रियासत के सडे और गन्दे वातावरण में यहां की जनता कैसे सास लेती रही?'

लक्ष्मीबाई १७३

एलिस—'ओ यह पूर्व है । जनता में मानो जान ही नही । मध्यम वर्ग यहा नाम मात्र को भी नही है । राजा जनता के भेडिया धसान को डंडे के सिरे से हाकते रहते हैं।' डनलप—'हमारा शासन उनको कानून और न्याय देगा। व्यवस्थित शासन में ये लोग समृद्ध और सुखी होगे । स्कीन—'यहाँ के बडे लोगो को अपने पास बुलाते रहना चाहिये । वे लोग जन समाज के मुखिया हैं। इनको हाथ मे रखने से शासन में विघ्न बाधा उपस्थित न होगी और जिन लोगो के मन में रियासत की भावनाओ का पक्षपात होगा, वे भी बिलकुल ढल जावेगे ।' गार्डन—'ठीक है। हम लोग उनको जागीरे नही दे सकते। लेकिन , उपाधिया दे सकते हैं। वे उपाधियो को काफी बडा पुरस्कार समझेगे ।' स्कीन—'अलीबहादुर नवाब यहा का बडा आदमी है। विश्वसनी है मुझसे मिला है। बहुत शिष्ट है। उसको बराबर मुलाकात देना चाहिये ।' एलिस—'मैने चार्ज हवाला करते समय गार्डन को समझा दिया है। नवाब अलीबहादुर अपनी पेन्शन बढवाना चाहता है। यह नही हो सकता । उससे साफ कहना होगा, मगर उसको नवाब की उपाधि आजीवन दी जा सकती है।' गॉर्डन—'मैंने उसकी हवेली वापिस करदी है। वह बहुत कृतज्ञ है।' स्कीन—'ठीक किया। अगर उसके कोई लडका हो तो तहसीलदार बना दिया जावे।' एलिस—'लडका तो है, किन्तु वह उसमे नौकरी नही कराना चाहता ।' स्कीन—'क्यो ? हमारे तहसीलदारो को बहुत अख्तियार हैं। हम तहसीलदारो को कुर्सी देते हैं। उनको जूता पहिने दफ्तर में आने देते हैं।' गार्डन—'हा इस बात में काले आदमी बडा गौरव देखते हैं।' स्कीन—'बनियो महाजनो को भी बुलाना चाहिये । इन लोगो के ब्याज का जनता पर बहुत असर चलता है। व्योपार और रोजगार का

१७४ झाँसी की रानी अब बहुत अच्छा सुभीता हो गया है। यहां से लेकर बम्बई तक बेखटके माल आ-जा सकता है। उनको विलायत का माल शहर और देहातो में बेचने से बहुत मुनाफा मिल सकता है। थोड़े दिन में मालामाल हो जावेगे।' एलिस—'आज मैने उनमें से खास खास को बुलवाया है। नवाब अलीबहादुर को इशारा कर दिया था।' स्क्रीन—'मुझको मालूम है। गार्डन ने बतलाया था। उनसे कहना चाहिये कि झाँसी में रेल भी किसी दिन आ जावेगी और महीनो की यात्रा दिनो में हो जाया करेगी। रेल के जरिये वे लोग सहज ही अपने तीर्थों को दर्शन के लिये जा सकते हैं।' एलिस—'कुछ स्कूल खोलना पड़ेंगे।' स्क्रीन—'वह पीछे देखा जायगा। फिलहाल अस्पतालो और अच्छी सड़को की चिन्ता करनी होगी।' गार्डन—'लेकिन मन चाहे सरकारी नौकर, हिन्दुस्थानियो में तभी इस जिले में मिल सकेंगे, जब उन्हे हमारी शिक्षा मिल जाय।' स्क्रीन—'हा कुछ दिनो बाद बाबुओ की जरूरत पड़ेगी।' गार्डन—'परन्तु केवल बाबू वर्ग उत्पन्न करने के लायक शिक्षा देने की नीति को पूरा पूरा स्वीकृत नहीं किया गया है।' स्क्रीन—'हाँ वह बात कलकत्ता, मदरास, आगरा इत्यादि के लिये है। झाँसी सरीखी पिछड़ी हुई जगह और बुन्देलखण्ड़ से वनखण्ड के लिये नही है। यहां तो जो स्कूल खोला जाय, उसे मिडिल से आगे मत ले जाओ। मै नही चाहता कि हिन्दुस्थानी छोकरे, एडमंड बर्क की मदिरा पीकर मतवाले हो जाय। एलिस— तजुर्वा गार्डन को सब सिखला देगा।' सोने की मोटी साकल से ठगी हुई घड़ी को स्क्रीन ने जेब से निकाला। समय देखकर बोला, 'एलिस, तुम्हारे मुलाकाती अभी नही आये हैं। समय हो गया है।'

लक्ष्मीबाई १७५ एलिस ने कहा, 'इन लोगो के धर्म में सब कुछ अनन्त है, इसलिये समय की पाबन्दी को महत्व नही देते।' उठकर एक तरफ गया। लौटकर आकर बोला। 'आ गये हैं। मैंने झाक कर देखा। पूरा पूर्वीय ठाठ है। पगडी पग्गड, फेंटे दुपट्टे। हाथो गलो और पैरो तक में जेवर!' गार्डन ने राजसी मुस्कराहट के साथ कहा, 'मैंने दरबारो में यह सब ठाठ देखा है।' स्कीन—'यह भी दरबार है गार्डन। डिप्टी कमिश्नर साहब बहादुर का दरबार।' स्कीन हँसा। सब अङ्गरेज हँसे। स्कीन बोला, 'हम लोग जाते हैं। एलिस और डनलप के सिवाय और किसी की जरूरत नही।' स्कीन इत्यादि गये। एलिस वाली कोठी में एक कमरा लम्बा चौडा था। उसी में 'दरबार' की योजना की गई थी। एक ऊँचे चबूतरे पर भी एक और छोटा सा चबूतरा था। उस पर दो कुर्सियाँ थी। उन पर एलिस और गार्डन जा बैठे। नीचे वाले चबूतरे पर आमने सामने दो कुर्सियाँ पडी हुई थी। एक पर डनलप बैठ गया। दूसरी खाली थी। चबूतरे के नीचे एलिस का पेशकार खडा था। थोडी देर में बस्ती के आदमी, सेठ, साहूकार इत्यादि आये और प्रणाम कर कर के खडे हो गये। उनमें नवाब अलीबहादुर भी थे। एलिस ने पेशकार को इशारा किया। वह नवाब अलीबहादुर को चबूतरे के पास लिवा लाया। उन्होने फिर झुककर प्रणाम किया। एलिस ने उनको नीचे वाले चबूतरे की खाली कुर्सी पर बिठला लिया। नवाब साहब की बाछे खिल गई । पेशकार ने बस्ती के सब लोगो को फर्श पर लगी हुई कुर्सियो पर बिठलाया। सन्नाटा छा गया।

झाँसी की रानी १७६ एलिस खडे होकर बोला, 'हमने अपना काम कप्तान गार्डन साहव बहादुर को सौप दिया है। कमिश्नर साहव वहादुर अभी हम लोगो को हुक्म दे गये हैं कि आप लोगो की और प्रजा की भलाई पर खूब ध्यान दिया जाय। आप लोगो की कुशल क्षेम हम लोगो की चिन्ता का दिन रात कारण रहेगा। खूब बेखटके रोज़गार करिये। वहा से बम्बई तक अमन चैन कायम है। चोर उचक्को को कुचलने के लिये हमारे हाथ मे बहुत बडी ताकत है। आप अपने अपने धर्म का पालन, दूसरो को नुकसान पहुचाये वगैर, चाहे जैसा करिये। हमको उससे कोई सरोकार नही। हालाकि हम समझते हैं कि हमारा ईसाई धर्म सर्वश्रेष्ठ है। बहुत जल्दी मदरसे खोले जायँगे। आपकी भाषा के साथ साथ अङ्गरेजी भी पढ़ाई जावेगी, जिससे आप लोगो की सतान विलायत की अच्छी बातो को भी जान सके। अच्छे पढे लिखे हिन्दुस्थानियो को, बडी बडी नौकरिया दी जावेगी, जिससे आप लोग शासन में हाथ वटा सके। अदालते कायम कर दी गई हैं। सब लोग बिना सकोच के इन अदालतो में अपनी फरियाद पेश कर सकते हैं। न्याय किया जावेगा। किसी के साथ रियायत न की जावेगी। अपराधियो को जो दड दिये जावेगे वे कठोर होते हुये भी अमानुपिक नही होगे—किसी का भी हाथ पैर नहीं कटवाया जा सकेगा, किसी को भी बिच्छुओ से नही कटवाया जा सकेगा। आप लोग सुखी हो, हम अग्रेज केवल यही चाहते हैं। आप लोगो में से किसी को कुछ कहना हो, तो कह सकते हैं।' एलिस बैठ गया। झासी के उपस्थित लोग एक दूसरे का मुँह ताकने लगे। एक साहूकार मगन गन्धी बोला, 'हुज़ूर से हमको केवल एक विनती करनी है। हमारे देश में पहले कभी गाय नही काटी गई। मुसलमान बादशाहो ने भी कभी इस बात को नही होने दिया। आपकी अमलदारी होते ही इसका आरम्भ हो गया। इसको बन्द कर देना चाहिये, आप शक्तिशाली हैं।'

लक्ष्मीबाई १७७ एलिस ने बैठे बैठे ही कहा, 'आपकी बस्ती में तो यह जानवर नहीं काटा जाता—सिर्फ छावनी में खाने वालो के लिए विवश होकर ऐसा किया जाता है।' मगन गन्धी बैठ गया। उसने अपनी आँख का एक आँसू पोछा। एलिस ने धीरे से गार्डन से कहा, 'ए सैन्टीमैन्टल फूल (एक भावुक मूर्ख।)' अलीबहादुर ने एलिस और गार्डन की ओर ताका, जैसे कुछ कहना चाहते हो। उन्होने अनुमत दी। अलीबहादुर बोले, 'हम लोग परमात्मा को धन्यवाद देते हैं, कि महान कम्पनी सरकार का राज्य हो गया है। हमारे हाकिम बहुत नेक हैं। शहर और इलाके का बहुत अच्छा, बेमिसाल बन्दोबस्त कर रहे हैं। सब लोग चैन से अपने घर सोते हैं। चोर, उठाईगीरे लापता हो गए हैं। किसी को कोई कष्ट नही। अब मदरसे और पाठशालाये खुलेगी। सारा देश झकाझक हो जावेगा। आप लोगो का 'व्योपार बढेगा और आप मालामाल हो जावेंगे।' अलीबहादुर बैठ गये। पीछे की कुर्सी पर बैठा हुआ एक सेठ हँसना चाहता था,. परन्तु उसकी हसी मुस्कराहट में परिवर्तित होगई। एलिस और गार्डन ने देख लिया। गार्डन ने दरबार को समाप्त करने के लिए धीरे से अनुरोध किया। एलिस ने दरबार समाप्त किया। वह 'पूर्वीय दरबार' इत्रपान की अनुपस्थिति से विशिष्ठ था। सेठ- साहूकार कोरे कोरे, फीके घर लौट लौट आए। सब लोगो के चले जाने पर एलिस ने गार्डन से कहा. स्क्रीन की मार्फत आज की कारवाई की सूचना लैफ्टिनेट गवर्नर के पास आगरा भेज देना।' 'अलीबहादुर चतुर और प्रभावशाली आदमी है। इसको हाथ में रखना। ठाकुर मुश्किल मे दबेगे. परन्तु उनको दबाना है अवश्य। यदि

१७८ झाँसी की रानी इनकी जाति के कुछ लोगो को पुलिस का थानेदार बना सको, तो अच्छा होगा। रानी अगर बुलाये तो चले जाना, परन्तु उसको कोई वचन न देना क्योकि उसके मामले में अब और कुछ नही हो सकता। मदरसो के खोलने की जल्दी मत करना। नौकरिया देने में हिन्दू-मुसलमानो का लाभकारी समीकरण रखना और यथाशक्ति दोनो को उनके अलग अलग हक समझाते रहना।' गार्डन बोला, 'मैं मूर्ख नही हू। मैने शिक्षा-नीति के सम्बन्ध मे जो बात कही थी वह केवल यह देखने को कि स्कीन कितने गहरे पानी में है।' एलिस—'स्कीन खुर्राट है रे।'

लक्ष्मीबाई १७६ [ ३६ ] कप्तान गार्डन डिप्टी-कमिश्नर बहादुर का 'बन्दोवस्त' 'बहादुरी' के साथ चला । जागीरे ज़ब्त हुईं, ज़िमीदारियाँ कम हुईं । मन्दिरो को सेवा-पूजा के लिये जो जायदादे लगी थी वे खत्म हुईं । पुजारियो को, पूजको को यह बहुत अखरा । अर्जी-पुर्जिया कीं । बगलो पर माथे रगडे एक न चली । गार्डन की दृढ़ता ने चोर-डाकुओ से लेकर पुजारियो तक के होश ठिकाने लगा दिये । हर बात में अर्जी और अर्जीनवीस का दौरदौरा बढ गया । कानून की प्रतिष्ठा के, लिये वकीलो को आदर मिला । पहले कोई परीक्षा इस पेशे के लिये जारी नही की गई थी । वकालत की सनद डिप्टी-कमिश्नर 'अता' किया करता था—ठीक उसी तरह जैसे जिमीदारी या नौकरी 'अता' होती थी । होशियार लोगो ने झटपट अङ्गरेज़ी कानून, अदब, ढग सीखा और आगे चलकर बिना उसके अदालत का पत्ता भी न हिला । इस वर्ग ने उस युग में सब प्रकार की निष्ठाओ के ऊपर कानून की निष्ठा को बिठलाने में जाने-अनजाने सहायता की । केवल यह एक ऐसा अङ्गरेज़ी सस्कार है जिसके प्रति हिन्दुस्थानियो की आत्मगत भावनाओ में श्रद्धा होनी चाहिये थी, परन्तु जिस प्रेरणा और जिस वातावरण में होकर और जिन उपकरणो के साथ न्याय का यह साधन आया था, वे सब हिन्दुस्थानियो को कतई अच्छे नही लगे और इसीलिये कानून भी अखरा । परोपकार की वृत्ति से प्रेरित होकर अंगरेजो ने कानून की प्राण प्रतिष्ठा हिन्दुस्थान के न्याय-मन्दिर में की हो सो बात नही थी । देश में पूर्ण शांति हो, अगरेजो का अधिकार सदा-सर्वदा इस देश में बना रहे और अगरेजी व्यापार, व्यवसाय निर्वाध चलते रहे, बस इसी वृत्ति से प्रेरित होकर कानून बनाये गये और चलाये गये । गवर्नर जनरल से लेकर पटवारी और चौकीदार तक कायदा-कानून मे बँधकर अपना अपना काम करते चले जाय, अनुशासन में शिथिलता न आने

१८० झांसी की रानी पावे । तभी तो अङ्गरेजी राज्य निर्विघ्न चल सकता था । उन लोगो ने हिन्दू नरेशो और मुसलमान बादशाहो के उत्थान-पतन के इतिहास पढे- गुने थे, इसलिये वे अपने शासन को उन सब गड्ढो से बचाना चाहते थे, जिनमें नरेशो और वादशाहो के सूबेदार और अन्य कर्मचारी मौका पाते ही उसको ढकेल दिया करते थे । समय समय पर गार्डन शहर के बडे आदमियो को मुलाकात के आकर्षण देता रहा । चिरौरी करना तो वे जानते ही थे, इसकी भी करते थे, परन्तु जब वे इसके सामने झुकते थे उनकी रीढ में दर्द हो उठता था और माथे पर बल पड जाते थे । घर आकर लाभ-हानि को आकने के साथ वे साहब की हेकडी पर जलते थे और अपनी चिरौरी पर हँसते थे । रानी को भी समाचार दे आते थे । वे चुपचाप सुन लेती थी और उनके बाल-बच्चो के समाचार विस्तृत ब्योरे के साथ पूछ लेती थी । अन्य कोई बात न कहने का उन्होने अपने मन पर बन्धेज कर रक्खा था । शहर वाले महल के ठीक सामने राजकीय पुस्तकालय था । वह उन्हीके हाथ में था । पुस्तकालय के पीछे एक ढाल था और ढाल के नीचे उनका सुन्दर बडा बाग ।* इस बाग में वह घुडसवारी इत्यादि व्यायाम किया करती थी । नगर की जो स्त्रिया उनके पास आती थी, उनको वह बडी निष्ठा के साथ इसी बाग में कसरते सिखलाती थी । अब तो सुन्दर, मुन्दर और काशीबाई इतना सीख गई थी, कि दूसरो को सिखाने में रानी को इनसे बडी सहायता मिलने लगी । फिर भी रानी सोचती थी कि अश्वारोहण और शस्त्र-चालन में मै सर्वश्रेष्ठ नही हुई हूँ । पुरानी लडाइयो के नकशे उनके महल में थे । वे उनका बारीकी के साथ अध्ययन करती थी । बनावटी लडाइयो के नकशे कागज़ पर बनाती और बिगाडती । अपनी सहेलियो के साथ भिन्न भिन्न प्रकार की अनेक युद्ध-परिस्थितियो पर वाद-विवाद करती । उनको पहाडियो पर अश्वारोहण *यह बाग अब हार्डिगञ्ज हो गया है ।

लक्ष्मीबाई १८१ का शौक हुआ । झासी के आसपास पहाडिया हैं ही, उस समय जंगल और विषम स्थल भी थे । रानी तेजी के साथ सहेलियो सहित इन पर आश्वारोहण करती । झासी के आसपास की भूमि का उनको राई-रत्ती परिचय प्राप्त हो गया । इस भौगोलिक परिचय के क्षेत्र को वे निरन्तर, अनवरत बढ़ाती रहती थी । जो स्त्री-पुरुष उनके पास भेंट के लिये आते उन सबसे कहती— ‘शरीर को इतना कमाओ कि फौलाद हो जावे, तभी मन दृढता पूर्वक भगवान की ओर जायगा ।’ उनका कसरतो का शौक शीघ्र विख्यात हो गया । अमीरखाँ, वज़ीरखा दो नामी उस्ताद उनको मिले । बाला गुरु भी बिठूर से आये और मल्लविद्या के सूक्ष्मतम दाव-पेच बतला कर चले गये । नरसिंहराव टौरिया के नीचे दक्षिणियो के मुहल्ले में, वे एक अखाडा जारी कर गये । रानी कुश्ती का अभ्यास अपनी सहेलियो के साथ करती थी । तीर, बन्दूक, छुरी, बिछुआ, रैंकला इत्यादि चलाने में पहले दर्जे की श्रेष्ठता, उन्होने अमीरखा, वजीरखा, के निर्देशन से प्राप्त की—ऐसी और इतनी कि उनकी कुशाग्रबुद्धि, शक्ति और हस्त-कुशलता पर वे दोनो नामी उस्ताद विस्मय में डूब जाते थे । वे जानते थे । कि रानी उद्दण्ड प्रकृति हैं, इसलिये कभी कभी लगता था कि हथियार चलाने या परीक्षा के लिये, ललकार न बैठें । यह उनका भ्रम था । रानी का वाह्य रूप प्रचण्ड तेज पूर्ण था, परन्तु अन्तर बहुत कोमल और उदार । इस प्रकार महीनो पर महीने बीत गये । एक दिन तात्या टोपे आया । रानी की सेना बहुत दिन पहले समाप्त कर दी गई थी, परन्तु सैनिक और उनके नायक, अपने कौशल को न भूले थे । और न उनका स्वाभिमान गारत हुआ था । मुहम्मद जमाखा अपने को कर्नल अब भी कहता था, अठवारे पखवारे रानी को वह प्रणाम कर आया करता था । उसी की हवेली के एक भाग में तात्या पूर्ववत ठहरा । रात के आठ बजे के बाद तात्या रानी के पास

१८२ झाँसी की रानी

पहुँचा। वे तीनों सहेलियां उनके साथ थी। अबकी बार तात्या ने जो रानी को देखा, तो बहुत सतेज पाया। कुशल वार्ता के बाद बातचीत हुई। 'अबकी बार राजस्थान, पन्जाब इत्यादि भी घूमे ?' रानी ने पूछा। तात्या ने उत्तर दिया, 'अब की बार बहुत घूमा हू और एकाध जगह तो पकडे जाने की ही नौबत आगई।' वे सब सतर्क होकर सुनने लगी। तात्या कहता गया, 'मै अपना हाल राजपूताने से आरम्भ करता हू। बडे बड़े राज्य जैसे जयपुर, जोधपुर, बीकानेर इत्यादि किसी विशेष पक्ष में नही। तटस्थ से हैं परन्तु सब कहते हैं कि झाँसी के साथ अङ्गरेज़ो ने बेईमानी की। हम लोगो के प्रति उनका भाव उदासीन है। इसके लिये हमारा उनका, दोनो में से किसी का भी दोष नही है। हम लोग एकत्र स्वराज्य स्थापित करना चाहते थे और वे लोग अपनी अपनी अलग स्वतन्त्रता की धुन में थे। राजपूताने में एकाध ठिकाना ऐसा भी है जो महाराष्ट्र नाम से ही अप्रसन्न है, परन्तु हिन्दुस्थान की स्वाधीनता के लिये उपयुक्त अवसर आने पर अपना सर्वस्व होमने के लिये तैयार हैं। लेकिन वहाँ के अधिकांश राजा अपने को, अङ्गरेजो की सहायता के कारण ही, निरापद समझते हैं, इसलिये न अपने जागीरदारो की परवाह करते हैं, और न प्रजा की। जैसा ढर्रा चला आया है, मजे में उसको चालू रखने के पक्षपाती हैं। अच्छे नेतृत्व की हीनता में जनता जीवन के साधारण उद्देश्यो में ही लिप्त है। ऐसी अवस्था में वहा से कोई आशा नही करना चाहिये। परन्तु यह विश्वास है कि वहा की सेना अपनी सेना का साथ देगी। पन्जाब का हाल कम आशाजनक है। रणजीतसिंह का पञ्जाब, अङ्गरेजी इलाके और पाच रियासतो में विभक्त हो गया है। इन रियासतो के राजा, हाथ आई रोटी को किसी प्रकार भी फेकने को तैयार नही। जनता नेता-विहीन है, इसलिये विवश सी है। दिल्ली का बादशाह बहादुरशाह वृद्ध है। परन्तु उसकी बेगम तेजस्वी है। मुसलमान लोग

लक्ष्मीबाई १८३ बादशाह के नाम पर बलिदान होने को तैयार हो सकते हैं। मैं कई प्रभाव- शाली मुसलमानों से मिला; वे कहते हैं कि हिन्दुस्थान में फिर वादशाहत कायम करो। मैंने कहा, 'स्वराज्य' और वादशाहत का सामञ्जस्य हो सकता है। जब उन्होने पूछा कैसे होगा तब मैंने उनको बतलाया कि अपने अपने प्रान्तो और प्रदेशो में सब लोग स्वराज्य नियुक्त करेंगे-बादशाह को उनमें दखल देने का अधिकार तो न रहेगा परन्तु अन्तर्प्रान्तीय बड़े कार्यो से सम्बन्ध रखने वाले हुकुमो पर मुहर बादशाह के नाम की रहेगी। सिर्फ दिल्ली के आसपास का प्रदेश बादशाह का खालसा रहेगा। बाहर के शत्रुओं से सब प्रान्त और प्रदेश सम्मिलित होकर स्वराज्य और बादशाह के नाम पर लडेंगे और इस तरह मिलकर हिन्दुस्थान का शासन चलावेंगे। पर हर हालत में पहले सब मिलकर इस बला को इस देश से टालें। बहुत लोग इस योजना से सहमत हुये, क्योकि इस समय यही व्यवहारिक जान पडतीं है, परन्तु यही पर मैं पकडे जाने से बालबाल बच गया। एक नायब डिप्टी कमिश्नर ने, जो हिन्दुस्थानी था, कैद कर लिया परन्तु सिपाहियों की आंखमिचौनी में से भाग निकला। इसके बाद मैं दक्षिण गया।' रानी ने कहा, 'तात्या तुम बहुत चतुर हो। अपनी वार्ता सुनाते जाओ। मैं ध्यान दिये हूँ।' तात्या मुस्कराकर बोला, 'मराठा रियासतो के राजाओ का जो हाल पहले देखा था, वही अब भी है। केवल एक अन्तर है। जनता सजग है और सिपाही स्वाभिमानी हैं। महाराष्ट्र की जनता अब भी स्वराज्य-मत्त है। दरिद्र और धनाढ्य, किसान, मजदूर और जागीरदार लगभग सब एक संकेत पर खडे हो सकते हैं।' 'और एक बार फिर', रानी ने सहसा कहा, 'वे पर्वतमालायें और मैदान, वे घाटिया और उपत्यकायें 'हर हर महादेव' से गूंज उठेंगी, काप उठेंगी।'

१८४ झांसी की रानी रानी का सतेज मुख और भी तेजमय हो गया । परन्तु वे तुरन्त मुस्करा उठी । बोली, 'तात्या, मुझको तुम्हारे सामने तक नियन्त्रण के साथ बोलना चाहिये । कभी कभी मैं वाक्संयम की कमी के कारण अपने ऊपर खीझ उठती हूँ ।' तात्या ने दृढ स्वर में कहा, 'बाईसाहब, मेरे हृदय में, इनके हृदय में, और सब जनता के हृदय में, जो बात गड़ी हुई है, वही आपके मुँह से निकल पड़ी ।' रानी बोली, 'अभी उसका समय नहीं आया । समय पर ही निकलनी चाहिये । तुम आगे की वार्ता कहो ।' तात्या ने कहा, 'मैं हैदराबाद गया । नवाब, अन्य रईसो की तरह अङ्गरेजो के आतंक से दबा हुआ है । सेना जिस पक्ष का पासा पड़े उस ओर जायगी । जनता हमारे साथ होगी । मे मैसूर और तञ्जोर भी गया था । यही हाल वहा का भी है ।' रानी के होठो पर वही मुस्कान आई, जिसके मृदुल मधुर आवरण में फौलादी आदर्श निहित थे । बोली, 'तात्या अभी कुछ विलम्ब और है । तब तक महत्वपूर्ण स्थानो के भूगोल का बारीकी के साथ अध्ययन करलो । कहा किस प्रकार सेनाओ को ले जाना पड़ेगा, कहा आसानी के साथ युद्ध किया जा सकता है और अपने अभीष्ट स्थान पर किस प्रकार शत्रु को एकत्र करके लड़ाई के लिये विवश किया जा सकता है । इन विषयो पर काफी समय और परिश्रम खर्च करने की आवश्यकता है । इसके सिवाय बारबरदारी के जानवरो और अच्छे घोडो के इकट्ठा करने की योजना पर विचार करते रहने को भी मनमें बहुत स्थान मिलना चाहिये । तोपे, बन्दूकें, बारूद, गोला, गोली इत्यादि युद्ध सामग्री के बनाने वाले कारीगरो को भी, हाथ में ले लो । अङ्गरेजी कारखानो में अपने आदमी नौकर रखवाओ ।

लक्ष्मीबाई १८५ ' वे लगन के साथ सब क्रियाये सीखें। अपनी पुरानी बारगी युद्ध परिपाटी* को तो गाठ ही मे बाध लो। हमारा देश उस परिपाटी को छोडकर अङ्गरेजो से लडा, इसलिये भी हारा।' तात्या—मैने नाना साहब और रावसाहब के प्रोत्साहन और आज्ञा से इन सब बातो का ध्यान रक्खा है और आपकी भी आज्ञा मिली। पूरा ध्यान दूंगा। में इतने महीनो पैदल अधिक फिरा हू इसलिये मुझको देश का भूगोल बहुत अच्छी तरह याद हो गया है। किसी न किसी तरह बहुत से आदमी, सामान और जानवर लेकर कही का कही पहुँच सकता हूँ।' रानी—'लड़ाइयो के नकशो का अध्ययन किया ?' तात्या—'अच्छी तरह। पञ्जाब मे जो लड़ाइया अङ्गरेजो से सिक्ख लडे हैं उनका भी मैने अध्ययन किया। व्यर्थ ही सिक्खो ने इतनी वीरता खर्च की। इतनी युद्ध सामग्री, ऐसी अच्छी सीखी-सिखाई फौज यदि अच्छे नायको के हाथ मे होती तो अङ्गरेज सिक्खो को कभी न हरा पाते। परन्तु कदाचित् उनकी हार देश-द्रोहियो के कारण हुई है।' रानी—'वे लोग कहते होगे कि भाग्य ने हरा दिया ?' तात्या—निरसन्देह यही कहते हैं।' रानी—'पञ्जाब में स्त्रियो को कुछ स्वाधीनता है ?' तात्या—'हिन्दू और सिक्ख स्त्रियो को है।' रानी—'तब पञ्जाब किसी दिन फिर खडा होगा।' तात्या—'परन्तु मुसलमान स्त्रियो में कम है।' रानी—'यह खेद की बात है, किन्तु वे भी किसी दिन अपनी बहिनो के प्रभाव में आवेगी।' तात्या—'मै पञ्जाब को भी अपनी योजना में ले रहा हू। जिस समय इस ओर की बाढ पञ्जाब से जोट करावेगी, उस समय पञ्जाब भी नीचे पडा न रह सकेगा।' Guirella warfare.