झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई १८३ बादशाह के नाम पर बलिदान होने को तैयार हो सकते हैं। मैं कई प्रभाव- शाली मुसलमानों से मिला; वे कहते हैं कि हिन्दुस्थान में फिर वादशाहत कायम करो। मैंने कहा, 'स्वराज्य' और वादशाहत का सामञ्जस्य हो सकता है। जब उन्होने पूछा कैसे होगा तब मैंने उनको बतलाया कि अपने अपने प्रान्तो और प्रदेशो में सब लोग स्वराज्य नियुक्त करेंगे-बादशाह को उनमें दखल देने का अधिकार तो न रहेगा परन्तु अन्तर्प्रान्तीय बड़े कार्यो से सम्बन्ध रखने वाले हुकुमो पर मुहर बादशाह के नाम की रहेगी। सिर्फ दिल्ली के आसपास का प्रदेश बादशाह का खालसा रहेगा। बाहर के शत्रुओं से सब प्रान्त और प्रदेश सम्मिलित होकर स्वराज्य और बादशाह के नाम पर लडेंगे और इस तरह मिलकर हिन्दुस्थान का शासन चलावेंगे। पर हर हालत में पहले सब मिलकर इस बला को इस देश से टालें। बहुत लोग इस योजना से सहमत हुये, क्योकि इस समय यही व्यवहारिक जान पडतीं है, परन्तु यही पर मैं पकडे जाने से बालबाल बच गया। एक नायब डिप्टी कमिश्नर ने, जो हिन्दुस्थानी था, कैद कर लिया परन्तु सिपाहियों की आंखमिचौनी में से भाग निकला। इसके बाद मैं दक्षिण गया।' रानी ने कहा, 'तात्या तुम बहुत चतुर हो। अपनी वार्ता सुनाते जाओ। मैं ध्यान दिये हूँ।' तात्या मुस्कराकर बोला, 'मराठा रियासतो के राजाओ का जो हाल पहले देखा था, वही अब भी है। केवल एक अन्तर है। जनता सजग है और सिपाही स्वाभिमानी हैं। महाराष्ट्र की जनता अब भी स्वराज्य-मत्त है। दरिद्र और धनाढ्य, किसान, मजदूर और जागीरदार लगभग सब एक संकेत पर खडे हो सकते हैं।' 'और एक बार फिर', रानी ने सहसा कहा, 'वे पर्वतमालायें और मैदान, वे घाटिया और उपत्यकायें 'हर हर महादेव' से गूंज उठेंगी, काप उठेंगी।'