भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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१८४ झांसी की रानी रानी का सतेज मुख और भी तेजमय हो गया । परन्तु वे तुरन्त मुस्करा उठी । बोली, 'तात्या, मुझको तुम्हारे सामने तक नियन्त्रण के साथ बोलना चाहिये । कभी कभी मैं वाक्संयम की कमी के कारण अपने ऊपर खीझ उठती हूँ ।' तात्या ने दृढ स्वर में कहा, 'बाईसाहब, मेरे हृदय में, इनके हृदय में, और सब जनता के हृदय में, जो बात गड़ी हुई है, वही आपके मुँह से निकल पड़ी ।' रानी बोली, 'अभी उसका समय नहीं आया । समय पर ही निकलनी चाहिये । तुम आगे की वार्ता कहो ।' तात्या ने कहा, 'मैं हैदराबाद गया । नवाब, अन्य रईसो की तरह अङ्गरेजो के आतंक से दबा हुआ है । सेना जिस पक्ष का पासा पड़े उस ओर जायगी । जनता हमारे साथ होगी । मे मैसूर और तञ्जोर भी गया था । यही हाल वहा का भी है ।' रानी के होठो पर वही मुस्कान आई, जिसके मृदुल मधुर आवरण में फौलादी आदर्श निहित थे । बोली, 'तात्या अभी कुछ विलम्ब और है । तब तक महत्वपूर्ण स्थानो के भूगोल का बारीकी के साथ अध्ययन करलो । कहा किस प्रकार सेनाओ को ले जाना पड़ेगा, कहा आसानी के साथ युद्ध किया जा सकता है और अपने अभीष्ट स्थान पर किस प्रकार शत्रु को एकत्र करके लड़ाई के लिये विवश किया जा सकता है । इन विषयो पर काफी समय और परिश्रम खर्च करने की आवश्यकता है । इसके सिवाय बारबरदारी के जानवरो और अच्छे घोडो के इकट्ठा करने की योजना पर विचार करते रहने को भी मनमें बहुत स्थान मिलना चाहिये । तोपे, बन्दूकें, बारूद, गोला, गोली इत्यादि युद्ध सामग्री के बनाने वाले कारीगरो को भी, हाथ में ले लो । अङ्गरेजी कारखानो में अपने आदमी नौकर रखवाओ ।