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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

१८४ झांसी की रानी रानी का सतेज मुख और भी तेजमय हो गया । परन्तु वे तुरन्त मुस्करा उठी । बोली, 'तात्या, मुझको तुम्हारे सामने तक नियन्त्रण के साथ बोलना चाहिये । कभी कभी मैं वाक्संयम की कमी के कारण अपने ऊपर खीझ उठती हूँ ।' तात्या ने दृढ स्वर में कहा, 'बाईसाहब, मेरे हृदय में, इनके हृदय में, और सब जनता के हृदय में, जो बात गड़ी हुई है, वही आपके मुँह से निकल पड़ी ।' रानी बोली, 'अभी उसका समय नहीं आया । समय पर ही निकलनी चाहिये । तुम आगे की वार्ता कहो ।' तात्या ने कहा, 'मैं हैदराबाद गया । नवाब, अन्य रईसो की तरह अङ्गरेजो के आतंक से दबा हुआ है । सेना जिस पक्ष का पासा पड़े उस ओर जायगी । जनता हमारे साथ होगी । मे मैसूर और तञ्जोर भी गया था । यही हाल वहा का भी है ।' रानी के होठो पर वही मुस्कान आई, जिसके मृदुल मधुर आवरण में फौलादी आदर्श निहित थे । बोली, 'तात्या अभी कुछ विलम्ब और है । तब तक महत्वपूर्ण स्थानो के भूगोल का बारीकी के साथ अध्ययन करलो । कहा किस प्रकार सेनाओ को ले जाना पड़ेगा, कहा आसानी के साथ युद्ध किया जा सकता है और अपने अभीष्ट स्थान पर किस प्रकार शत्रु को एकत्र करके लड़ाई के लिये विवश किया जा सकता है । इन विषयो पर काफी समय और परिश्रम खर्च करने की आवश्यकता है । इसके सिवाय बारबरदारी के जानवरो और अच्छे घोडो के इकट्ठा करने की योजना पर विचार करते रहने को भी मनमें बहुत स्थान मिलना चाहिये । तोपे, बन्दूकें, बारूद, गोला, गोली इत्यादि युद्ध सामग्री के बनाने वाले कारीगरो को भी, हाथ में ले लो । अङ्गरेजी कारखानो में अपने आदमी नौकर रखवाओ ।

लक्ष्मीबाई १८५ ' वे लगन के साथ सब क्रियाये सीखें। अपनी पुरानी बारगी युद्ध परिपाटी* को तो गाठ ही मे बाध लो। हमारा देश उस परिपाटी को छोडकर अङ्गरेजो से लडा, इसलिये भी हारा।' तात्या—मैने नाना साहब और रावसाहब के प्रोत्साहन और आज्ञा से इन सब बातो का ध्यान रक्खा है और आपकी भी आज्ञा मिली। पूरा ध्यान दूंगा। में इतने महीनो पैदल अधिक फिरा हू इसलिये मुझको देश का भूगोल बहुत अच्छी तरह याद हो गया है। किसी न किसी तरह बहुत से आदमी, सामान और जानवर लेकर कही का कही पहुँच सकता हूँ।' रानी—'लड़ाइयो के नकशो का अध्ययन किया ?' तात्या—'अच्छी तरह। पञ्जाब मे जो लड़ाइया अङ्गरेजो से सिक्ख लडे हैं उनका भी मैने अध्ययन किया। व्यर्थ ही सिक्खो ने इतनी वीरता खर्च की। इतनी युद्ध सामग्री, ऐसी अच्छी सीखी-सिखाई फौज यदि अच्छे नायको के हाथ मे होती तो अङ्गरेज सिक्खो को कभी न हरा पाते। परन्तु कदाचित् उनकी हार देश-द्रोहियो के कारण हुई है।' रानी—'वे लोग कहते होगे कि भाग्य ने हरा दिया ?' तात्या—निरसन्देह यही कहते हैं।' रानी—'पञ्जाब में स्त्रियो को कुछ स्वाधीनता है ?' तात्या—'हिन्दू और सिक्ख स्त्रियो को है।' रानी—'तब पञ्जाब किसी दिन फिर खडा होगा।' तात्या—'परन्तु मुसलमान स्त्रियो में कम है।' रानी—'यह खेद की बात है, किन्तु वे भी किसी दिन अपनी बहिनो के प्रभाव में आवेगी।' तात्या—'मै पञ्जाब को भी अपनी योजना में ले रहा हू। जिस समय इस ओर की बाढ पञ्जाब से जोट करावेगी, उस समय पञ्जाब भी नीचे पडा न रह सकेगा।' Guirella warfare.

१८६ झांसी की रानी रानी— मैं सिक्खो की लडाइयो के नकशो का अध्ययन करना चाहती हू ।' तात्या ने कागज़ो पर मानचित्र बनाकर समझाया । रानी ने और उनकी सहेलियो ने भी समझा । तात्या ने अनुरोध किया, 'हमको एक अपने विश्वसनीय जासूसी विभाग की वडी आवश्यकता है ।' रानी ने मुस्कराकर कहा, 'मैने स्थापना कर दी है ।' तात्या ने उत्सुक होकर पूछा, 'कैसे ? कहाँ ?' रानी ने उत्तर दिया, 'यही । मेरी ये तीनो सहेलियां काम सीख रही हैं और कर रही हैं । मे और स्त्रियो को भी तैयार कर रही हू, परन्तु काम सावधानी का है, इसलिये धीरे-धीरे कर रही हू ।' तात्या प्रसन्न हुआ । बोला, 'झांसी में एक विलक्षण बात देखी । जो यहा निवास करता है वह तो आपका भक्त है ही, किन्तु यहा का निवासी जो बाहर चला गया है, वह भी झांसी के लिये अपना तन मन वलिदान करने के लिये प्रस्तुत है ।' रानी बोली, 'मुझको इसी लिये झांसी का बहुत अभिमान है ।' तात्या ने कहा, 'बाईसाहब, जब मे ग्वालियर राज्य का हाल लेता हुआ हाल में दक्षिण की ओर गया, तब वहा बाजार में एक फटियल ब्राह्मण मिला । उसने मुझको पहिचान लिया । मैने भी उसको चीन्ह लिया । वह झांसी का रहने वाला नारायण शास्त्री निकला । उसको स्वर्गीय सरकार ने, एक अपराध में देश निकाले की सजा दी थी...।' रानी बोली, 'मैंने उस अपराध के विषय में सुना है ।' तात्या ने कहा, 'नारायण शास्त्री आश्वासन देता था कि जो कुछ भी कार्य भार उसको दिया जायगा, वह प्राणपण से करेगा ।' रानी ने पूछा, 'वह जिस स्त्री को लेकर यहा से गया था, क्या उसको त्याग दिया ?'

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तात्या ने उत्तर दिया, 'नही वाईसाहब । उसने मुझसे स्पष्ट कहा ।' रानी—'समाज ने उसको कैसे ग्रहण किया होगा ?' तात्या—'वह समाज से बाहर है । मूंछ मुडाये, वैरागी वेश में रहता है । साथ में वह स्त्री रहती है ।' रानी—'उसको क्या काम दिया ?' तात्या—'सेना के साथ सम्पर्क रखने का काम । नारायण शास्त्री । ज्योतिष जानता है और कविताये गाता है । उनके प्रयोग से वह सेना । के सम्पर्क में रहेगा ।' 'रानी—'सेना के साथ घनिष्ठ सम्पर्क उत्पन्न करने को बहुत महत्व देना होगा ।' तात्या—'दे रहा हूँ ।' रानी—'तुमको, जान पडता है अकेले ही बहुत काम करना पडता है ।' तात्या—'नही वाईसाहब, नाना साहब, राव साहब इत्यादि बहुत लोग काम में जुटे हुये हैं । दिल्ली और मेरठ इत्यादि प्रदेशो के अनेक मुसलमान भी प्राणो की होड लगा कर निरत हैं ।' रानी—'मुझको ऐसा लगता है कि शीघ्र ही कुछ न हो बैठे परन्तु मैं सोचती हूँ कि अधकचरी तैयारी मे कुछ भी न किया जाना चाहिये । बहुत दिन हुये, मदरास की ओर कुछ सिपाहियो ने अचानक उपद्रव कर डाला था वह व्यर्थ गया । फल यह हुआ कि मदरासी अब सेना में कम भर्ती किये जाते हैं। और अग्रेजो ने अपनी सावधानी को कसकर बढा लिया है ।' तात्या—'कैसी भी सावधानी, कुटिलता और बुद्धि से अङ्गरेज लोग काम लें, हमारी विशाल, असख्य जनता, उनका राज्य नही चाहती । इसलिये राजाओ और नवावो का साथ न पाते हुये भी हमको अपने उत्साह में कमी प्रतीत नही होती ।' रानी ने मुस्कराकर कहा, 'मैं जानती हूँ ।'

१८८ झांसी की रानी तात्या बोला, 'बाईसाहब, अब आपके शयन का समय आने को है—भोजन तो अभी हुआ ही नही है । जाता हूँ । यहा एकाध दिन रह कर चला जाऊँगा । शीघ्र ही फिर सेवा में उपस्थित होऊँगा अर्थात् जैसे ही कोई महत्व की बात सामने आई, मैं आऊँगा ।' रानी—'भोजन अब मै नही करूँगी । केवल दूध पिऊँगी नही तो कल के कार्य क्रम का व्यतिक्रम हो जावेगा । तुम दीवान रघुनाथसिंह और दीवान जवाहरसिंह से मिले हो ?' तात्या—'पिछली बार आया तब मिला था । अबकी बार नही मिल पाया हू ।' रानी—'उनसे मिलना । रघुनाथसिंह नई बस्ती में गनपत खिडकी बाहर रहते हैं और जवाहरसिंह कटीली गाव में होगे ।' तात्या—'मै इनसे मिलूँगा ।' तात्या चला गया ।

लक्ष्मीबाइ १८६ [ ३७ ] रानी के पास आठ बजे के लगभग तात्या, रघुनाथसिंह और जवाहरसिंह आये । रघुनाथसिंह पुष्ट देहका बडा बलशाली पुरुष था । जवाहरसिंह जरा छरहरे शरीर का परन्तु काफी बलवान । प्रणाम करके तीनो बैठ गये । रानी ने पूछा, 'दीवान जवाहरसिंह को क्या कटीली से ले आये तात्या ?' हाथ जोडकर जवाहरसिंह ने उत्तर दिया, 'दीवान रघुनाथसिंह का एक साडिनी सवार लिवा लाया । उसने प्रात काल के बहुत पहले ही सोते से जगाया था ।' तात्या ने कहा, 'मै स्वय नही गया । दीवान साहब से प्रार्थना की और इन्होने तुरन्त रात को ही, साडिनी-सवार भेज दिया । घुडसवार जाता तो दीवान साहब को भी घोडे पर ही आना पडता । शायद कोई सन्देह करता, इसलिये ऊँट भेजा ।' जवाहरसिंह बोला, 'श्रीमन्त सरकार, मुझे किसी का भी डर नही है । उस दिन के लिये तरस रहा हूँ, जब झाँसी और अपने स्वामी के लिये अपना शरीर त्याग दू ।' रघुनाथसिंह झूमने लगा । रानी ने मुस्कराकर कहा, 'आप ही लोगो का बल-भरोसा है । एक दिन आवेगा जब आप लोगो के जौहर का उपयोग होगा । तात्या ने कुछ बतलाया होगा ?' रघुनाथसिंह—'बतलाया है सरकार । थोडे में समझ लिया । हम लोगो को ज्यादा सुनने समझने की दरकार ही नही है । अपनी माता के दर्शन करने थे, इसलिये चले आये ।' जवाहरसिंह—'हम लोगो को सरकार के हाथो अपनी तलवार पर गगाजल छिटकवाना है ।'

१६० झाँसी की रानी रघुनाथसिंह—'और अपनी माता का आशीर्वाद प्राप्त करना है।' रानी मुस्कराई । बोली, 'आप लोगो को मै अच्छी तरह जानती हू । आप लोग सहज ही प्राणो की होड लगा सकते हैं। परन्तु मै चाहती हूँ कि प्राणो को सहज ही न खोया जाय। अवसर आने पर ही तलवार म्यान से वाहर निकले। छोटी छोटी सी वात पर न खिंच जावे।' तात्या—'इन लोगो को लाट की आज्ञा पर बहुत क्षोभ हुआ । और ये तुरन्त कुछ जवाव देना चाहते थे।' रानी—'अङ्गरेजो के अन्याय बढते जावे तो अच्छा ही है। फिर भगवान हमारी जल्दी सुनेंगे । असल में अभी इन छोटी बातो पर खीझ कसर का निकालना, अच्छा नही है।' उन दोनो ठाकुरो ने स्वीकार किया । फिर उन दोनो ने अपनी चमचमाती हुई तलवारे, रानी के पैरो के पास रखदी और हाथ जोडकर खडे हो गये । रानी ने मुन्दर से कहा, 'गगाजल ला ।' मुन्दर गंगाजल ले आई । रानी ने पहले जवाहरसिंह की तलवार पर छींटे दिये और फिर रघुनाथसिंह की तलवार पर । उन दोनो ने रानी के चरण स्पर्श करके तलवारें म्यान में डाल ली । रानी पुलकित हुई । एक क्षण में अपने को सयत करके बोली, गगाजल की पवित्रता को निभाना । आपस की कलह में इसका प्रयोग मत करना और न किसी कलुषित काम में ।' उन दोनो ने मस्तक नवाये । रघुनाथसिंह ने कहा, 'सरकार अब आशीर्वाद मिलना चाहिये ।' रानी का गला भर आने को हुआ । उन्होने नियन्त्रण कर लिया । बोली, 'तुम्हारे हाथो स्वराज्य के आदर्श का पालन हो । सुखी रहो और अपने पीछे ऐसा नाम छोड जाओ कि आने वाली अन त पीढिया. तुम्हारे स्मरण से अपने को शुद्ध करती रहे ।'

लक्ष्मीबाई १६१ जवाहरसिंह ने कहा, 'माता का यह आशीर्वाद और वह पवित्र गगाजल सदा हमारे साथ रहेगा।' रघुनाथसिंह बोला, 'मा आज न जाने क्यो ऐसा भास रहा है मानो हम लोग अनेक युद्धो पर विजय प्राप्त कर चुके हो।' रानी ने कहा, 'मुझको सन्देह नही है, युद्धो पर विजय प्राप्त करोगे।' रघुनाथसिंह ज़रा मचलते हुये बोला, 'माता हमको आशीर्वाद तो मिल गया, अव प्रसाद और मिलना चाहिये।' रानी ने तुरन्त मुन्दर से कहा, 'लड्डू ला मुन्दर। मैने अपने हाथो आज ही बनाये हैं।' मुन्दर थाल भर लड्डू ले आई। 'नही सरकार, इतने नही,' जवाहरसिंह हँसकर बोला, 'हम लोग भोजन कर आये हैं।' रानी उठी। दोनो हाथो में एक एक लड्डू लिया। 'अपने हाथ के बनाये लड्डू अपने ही हाथो खिलाऊँगी। तात्या तुम भी खाओ।' रानी ने कहा। उन लोगो ने मुँह खोले। रानी ने आग्रह के साथ खिलाया। बचे हुये लड्डू उन तीनो सहेलियो को खिला दिये। हाथ-मुँह धोकर वे सब बैठ गये। रानी ने कहा, 'आप लोग अभी केवल इतना करे—नातेदारियो में अपना मेल वढायें और उनको अपनावें। सबके काम में पडें और छोटी से छोटी जाति के पुरुष या स्त्री का, गरीव से गरीव, मजदूर या किसान को, कदापि छोटा न समझे। सब जातियो और सब वर्गों को, बिना अपना उद्देश्य बतलाये, हथियार चलाना सिखलाएँ। इस काम के लिये काफी अवसर मिल सकते हैं, जैसे शिकार, उत्सव, ब्याह-बारात इत्यादि। जवाहरसिंह ने कहा, 'बहुत अच्छा।' रघुनाथसिंह ने कहा, 'ऐसा ही होगा।'

१६२ झाँसी की रानी तात्या बोला, 'मैने इनसे कहा है कि ऐसी कोशिश करो कि कोई नातेदार डाका न डाले । ये कहते हैं कि वडी मुश्किल पडेगी । मैंने कहा कि डाके डालने ही हैं तो खजानो पर डालो और थाने लूटो ।' रानी ने निवारण करते हुये कहा, 'नही तात्या, यह उचित नही अनाचार और अत्याचार को प्रोत्साहन एक बार मिला, कि वह बार बार सिर उठाता है । जब स्वराज्य का युद्ध शुरू होगा तब खजाने और थाने सब अपने अधिकार में किये जावेगे । अभी नही ।' जवाहरसिंह और रघुनाथसिंह ने हामी भरी । तात्या बोला, 'अभी तो गार्डन अपना प्रबन्ध पक्का किये जा रहा है । समझता होगा कि जनता को अपनाते चले जा रहे हैं ।' रानी ने कहा, 'जनता मूर्ख नही है ।' तात्या, दीवान जवाहरसिंह और दीवान रघुनाथसिह प्रणाम करके चले गये । रानी ने अपनी सहेलियो से पूछा, 'बतलाओ, इन दोनो मे से, झाँसी की स्वराज्य-सेना का प्रधान सेनानायक बनाने योग्य कौन है ?' मुन्दर—'दीवान रघुनाथसिंह ।' सुन्दर—'मै भी ऐसा ही सोचती हूँ ।' काशीबाई—'जवाहरसिंह ।' फिर वे तीनो रानी का मुँह ताकने लगी । मुन्दर बोली, 'हम दोनो की बात सही निकलेगी ।' सुन्दर ने कहा, 'बाईसाहब देखे क्या कहती हैं ।' काशीबाई हँसकर बोली, 'वे अभी बतला देवेगी ।' रानी ने कहा, 'समय बतलावेगा ।'

लक्ष्मीबाई १६३ [ ३८ ] ब्रिटिश सरकार के शासन की गति-विधि में अफ़सरो का ज़िले भर में दौरा करने, प्रत्येक दफ्तर के काम को बारीकी के साथ देखने भालने, थानो, तहसीलो और जेलखानो का निरीक्षण करने का महत्वपूर्ण स्थान था। ग्राम पञ्चायतो का स्थान अङ्गरेजी अदालते दौरे के साधन द्वारा आसानी के साथ ले सकती थी। इसके सिवाय दौरे का जीवन शिकार देता था, नवीन नवीन प्राकृतिक दृश्यो के दर्शन कराता था और सम्पूर्ण देहात को सम्पर्क में इन लोगो के लाता था। शासन की जडें मजबूत बनती थी। गार्डन दौरा करता हुआ मऊ गया। निरीक्षण के लिये थाने पर पहुचा। नायब थानेदार आनन्दराय रियासती पगडी बांधे, लम्बी दाढी, बीच में से कंधी कर, कानो पर चढाये इन्सपेक्टर और थानेदार सहित स्वागत के लिये आगे बढा। आनन्दराय की वह दाढी गार्डन को खटक गई। उसी समय अपनी आलोचना और आज्ञा प्रकट करना चाहता था, परन्तु ठहर गया। निरीक्षण करने के बाद उसने आनन्दराय को बुलाया। बोला, 'तुम डाकुओ की सी दाढी क्यो रक्खे हो?' आनन्दराय कोई उत्तर नही दे सका। गार्डन ने कहा, 'इस थाने का तेरा कोई अफसर इस तरह की दाढी नही रचाता। क्या अपने को इनसे वडा समझता है?' आनन्दराय का कलेजा जल उठा, परन्तु मुँह से निकला, 'नही तो।' 'बातचीत करने का भी तमीज नही,' गार्डन ने कहा। आनन्दराय ने सिर नीचा कर लिया। गार्डन ने हुकुम दिया, 'दाढी रखनी ही है तो सीधी रख। कानो पर कभी मत चढा। जा सीधी करके आ।' आनन्दराय गया और दाढी को कानो पर से उतार कर सीधी करके आगया। चेहरा बिलकुल पीला पड गया।

१६४ झाँसी की रानी गार्डन के चेहरे पर सन्तोष की मुस्कराहट आगई । बोला, 'अब ठीक है । जाओ ।' उसी समय झाँसी से एक हरकारा कमिश्नर स्क्रीन की चिट्ठी लेकर आया । स्क्रीन ने उसको समाचार दिया था कि सागरसिंह नामक डाकू पकड़ा गया है, जेल में बन्द है । जेल का निरीक्षण करना चाहता हूँ । एक दिन के लिये जल्दी आजाओ । गार्डन ने घोड़ा गाड़ी से झांसी की ओर कूच कर दिया । मार्ग में घोड़े बदलता हुआ दूसरे दिन झाँसी पहुँच गया । उसके दूसरे दिन जेल का मुआइना हुआ । स्कीन और गार्डन साथ थे । बख्शिशअली जेल का दरोगा था बड़े विनम्र भाव से सलामें झुकाता हुआ, उन दोनों के सामने आया । दोनों प्रसन्न हुये । उनको इस प्रकार का शाही अदब कायदा पसन्द था । जेल के भीतर जाकर सागरसिंह को देखा । तगड़ा फुर्तीला आदमी था । आंख तीक्ष्ण और चमकदार, दाढी कानो पर चढी हुई; हथकडी बेडी से जकडा हुआ । स्क्रीन ने पूछा, 'क्या नाम है ?' 'क्या आपको मालूम नहीं ?' 'तुम्हारे मुँह से सुनना चाहता हूँ ।' 'कुँवर सागरसिंह ।' 'कहाँ के रहने वाले हो ?' 'रावली के-बरुआसागर से कुछ दूर ।' 'तुमने यह पेशा क्यों अपनाया ?' 'क्योंकि इससे बढ़िया कुछ और मिला नहीं ।' 'हमारी फौज में नौकरी क्यों नहीं की ? अच्छा वेतन मिलता ।' 'हमारे घराने में अफसरी होती आई है । हम कोरी सिपाहीगीरी कैसे करते ?' 'तुम धीरे धीरे नायक, हवलदार और फिर सूबेदार तक हो सकते थे ।'

झाँसी की रानी १६५ 'हमारे तुरखो की मातहती में पाच पाच हज़ार सिपाहियो ने काम किया है । सेनापतियो के घराने के होकर हवलदारी, सूबेदारी करेंगे ?' 'ओ: जनरल बनना चाहता था ?' 'क्यो, जन्डैल बनना कोई बडी बात है ?' 'डाकू से जनरल ! हिन्दुस्थान में सब अजीब ही अजीब होता है । जनरल से डाकू हो जाता है तब डाकू से जनरली की तरक्की मामूली बात है । तुमको मालूम है सागरसिंह... ' 'कुँवर कहिये—मुझको अकेले नाम से कोई नही पुकारता ।' 'अच्छा कुँवर सागरसिंह, तुमको मालूम है कि इसी जेलखाने में फासीघर है और मुझको फासी देने का अधिकार है । और तुम्हारे जो कारनामे सुने गये हैं, वे साबित भी होगे और साबित होने पर तुमको फासी की सज़ा दी जावेगी । मैं कल-परसो में तुम्हारा मुकद्दमा करके उसी दिन फांसी दे दूँगा ।' 'मुझ अकेले कुँवर सागरसिंह को !' 'तुम्हारे साथ और कौन कौन हैं ?' 'बहुत से हैं ।' 'नाम बतलाओगे ?' 'क्यो बतलाऊँ ? क्या पडी है ? मुझको कोई फायदा हो, तो नाम बतला दूँगा ।' 'फायदा होगा । यदि सच सच कहोगे, तो सरकारी गवाह बना लिये जाओगे और छोड़ दिये जाओगे ।' 'बतलाऊँगा, परन्तु इन हथकडियो और बेडियो के बोझ के मारे और भूखो-प्यासो अकल बिगड गई है । आज ज़रा आराम मिल जाय तो कल अवश्य बतला दूँगा, पर अपने वचन पर पक्के रहना ।' 'हा' स्कीन ने जेल-दरोगा को सागरसिंह का बोझ हलका करने की आज्ञा दी और अच्छे भोजन की व्यवस्था के लिये भी कह दिया ।

१६६ लक्ष्मीबाई बख्शिशअली ने उस आज्ञा का यह अर्थ समझा कि कैदी के साथ पूरी रियायत की जावे । 'स्कीन और गार्डन उधर गये और इधर बख्शिशअली ने कुँवर सागरसिंह की हथकडी-बेडी खोल दी । केवल साधारण पहरा रहने दिया । सागरसिंह ने कहा, 'दरोगा साहब, बहुत भूख लगी है । किसी ब्राह्मण के हाथ अच्छा खाना पकवा दीजिये ।' बख्शिशअली बोला, 'कुँवर साहब, मै तो पूडी-मिठाई से आपका थाल भर देता, परन्तु इन अफसरों के मारे मजबूर हूँ। अब लीजिये, कोई दिक्कत नही रही, हुकुम हो गया है ।' अच्छा खाना बनवाया गया । आदर के साथ परोसा गया । पहरेदारो के मन पर भी कुँवर साहब का आतंक छा गया । शाम हुई । रात हुई । पहरे वाले जागते जागते, सो गये । बख्शिशअली को दिन भर के परिश्रम के मारे थकावट आई । वह भी चैन में सो गया । कुँवर सागरसिंह को सुअवसर प्राप्त हुआ । चन्दवरदाई का दोहार्द्ध याद आया—'फेर न जननी जन्म है, फेर न खेचे कमान' और चुपचाप दीवार लांघकर नौ-दो-ग्यारह हुआ और सवेरा होते होते ऐसे जङ्गल मे पहुच गया, जहा उसके विश्वास के अनुसार, स्कीन और गार्डन के फरिश्ते भी नही पहुँच सकते थे । प्रात.काल जेल भर मे गडबडी फैल गई । बख्शिशअली का होश कपूर हो गया । कभी जेल में हडबडाकर पहुँचता और कभी घर में बीबी- बच्चो के पास आकर सिर पीटता । स्कीन और गार्डन के पास भी खबर पहुंची । वे दोनो तुरन्त आये । क्रोध में डूबते-उतराते । बख्शिशअली ने अत्यन्त विनम्र प्रणाम किया । और अत्यन्त कातर स्वर मे कहा, 'हुजूर हुकुम दे गये थे कि हथकडी-बेडी खोल दो और

लक्ष्मीबाई १६७ अच्छा खाना दो। मैंने वैसा-ही किया। उस पर पहरा रक्खा। फिर भी रात को वह मौका निकालकर भाग गया।' 'बेवकूफ, गधे, नालायक', स्कीन पागल सा होकर बोला, 'हमने यह हुकुम दिया था ?' और तड़ाक से बख्शिशअली को चढ़े जूते की ठोल दी। वह गिर पडा। वैसी हालत में भी स्कीन ने उसको कई ठोकरे और लगाईं। तब कही उसका क्रोध शान्त हुआ। गार्डन ने कहा, 'बख्शिशअली, गनीमत समझो कि कि तुमको साहब बहादुर ने इतने से ही छोड़ दिया। तुमको हम बरखास्त करना चाहते हैं।' बख्शिशअली रोने लगा। स्कीन ने इशारा किया। बख्शिशअली ने नही देखा। गार्डन बोला, 'अच्छा तुमको बरखास्त नही करता हू, मगर उस पहरे वाले को बरखास्त किया जावेगा, जिसके पहरे मे से कैदी छूटकर भागा है।' वह सिपाही बरखास्त कर दिया गया। बख्शिशअली का अपमान पहरेदारो और कैदियो के सामने हुआ था। मारपीट से ज्यादा वह घोर अपमान उसको खला। सीधा घर गया और बहुत रोया। बीबी-बच्चे भी रोये। बख्शिशअली ने कहा, 'जी चाहता है कि तलवार से तुम सबको कतरकर डाल दूँ और गोली मारकर मै भी मर जाऊँ। राजा गंगाधरराव ने या रानी लक्ष्मीबाई ने कभी तू-तड़ाक तक नही किया। आज इन गोरो ने मेरे बुजुर्गो की इज्जत खाक में मिला दी।' बीबी ने रो-रोकर समझाया। मुश्किल से अपने अपमान और क्षोभ को पीकर, बख्शिशअली ने वह दिन भूखो काटा। 'कैसे मुँह दिखलाऊँगा ?' वह बार बार कहता था, 'कहा तो मै आठो फाटको का कोटपाल था और कहा आज यह हालत हुई !' बारबार मन में आत्मघात की, बीबी-बच्चो को मार डालने की प्रतिक्रिया मन मे

१६८ झांसी की रानी उठती थी, परन्तु उनकी रोती हुई, बेबस सूरतो को देख देखकर सहम जाता था । अन्त में आत्मघात का निश्चय उसके मन के किसी कोने में जाकर लीन हो गया । बख्शिशअली फिर यथावत् काम करने लगा । जब कभी स्कीन या गार्डन जेल—निरीक्षण के लिये आता, बख्शिशअली को ऐसा लगता मानो कोई जल्लाद आया हो ।

लक्ष्मीबाई १६६ [ ३६ ] रानी को झासी की लगभग सब घटनाएँ, समय समय पर, विदित होती रहती थी। स्मरण-शक्ति उनकी, इतनी विशाल थी कि लोगो को आश्चर्य होता था। बख्शिशअली वाली घटना का वर्णन उन्होने सुना और आनन्दराय वाली का भी। यद्यपि दाढी वाली घटना-जेल दरोगा की मारपीट वाली घटना के मुकाबले में कुछ नही थी, तो भी रानी को उन घटनाओ का मूल तत्व समझने में देर नही लगी। जिस स्रोत से गार्डन और स्कीन को प्रेरणा मिली थी वह मूल मे एक ही था – हेकड़ी, अवहेलना, उपेक्षा। रानी का प्रशस्त गौर ललाट लाल हो गया। एक आह खींचकर रह गई। ‘पेट के लिये इन लोगो को यह सब सहन करना पड रहा है,’ रानी ने सोचा। इस तरह की अनेक घटनाएँ जब तब होती रहती थी। अङ्ग्रेज लोग शासन को धाक (Bluff) की पुख्ता नीव पर खडा करते चले जाते थे। धाक रोब का रूप पकडती चली जा रही थी। यही रोब हिन्दुस्थानियो के मन में अङ्ग्रेजो के ‘इकबाल’ की सूरत में उत्पन्न होने को था। परन्तु यह धाक या इकबाल हिन्दू-मुसलमानो के हृदय पर वह अधिकार नही कर पा रहे थे जो साधू और फकीर ने जमाने से कर रक्खा था। रानी इस प्रकार की सब घटनाओ को ध्यान और विविध भावों से सुनती रहती थी। गार्डन भी शहर और अपने जिले का हाल लगन के साथ टटोला करता था, परन्तु अहमन्यता और स्वार्थ के कारण वह सही स्थिति नही समझ सकता था। और न अधिकांश अङ्ग्रेज। एक दिन गार्डन घोडे पर सवार शहर की कोतवाली* के निरीक्षण के लिये आ रहा था। एक साधारण हिन्दू गृहस्थ की बरात सामने पड *यह अब पुरानी कोतवाली कहलाती है।

२०० झाँसी की रानी

गर्ड । दूल्हा घोडे पर चढा था । यह अगरेजो के नये हिन्दुस्थानी तरीके के खिलाफ था । उसने दूल्हा को घोडे पर से उतरने की आज्ञा दी । बारात वालो ने प्रतिवाद किया । उसने एक नही सुनी । आखें लाल- पीली थी । दूल्हा के पिता ने विनय की, 'हमारे यहा राजा तक दूल्हा का मान रखता है ।' 'चुप' गार्डन ने धमकाया । दूल्हा को घोडे पर से उतरना पडा । नवाब अलीबहादुर गार्डन और स्कीन के पास आया-जाया करते थे । परन्तु गार्डन के पास बहुधा । पैन्शन बढने की आशा अभी जीर्ण नही हुई थी । उनको इधर-उधर की खबर पीरअली दिया करता था । वे इन खवरो को गार्डन के पास पहुँचा देते थे । पीरअली ने दीवान जवाहरसिंह के आने का समाचार नवाब साहब को दिया । परन्तु वह और तात्या जब चले गये तब । नवाब ने कहा, 'कुछ दाल में काला है । जवाहरसिंह कटीली वाले राजा की फौज के एक बडे अफसर रहे हैं । विठूर से उस आदमी का इन्ही दिनो आना इल्लत से खाली नही है । क्या है । क्या कर्नल जमाखा भी इन लोगो से मिले ?' पीरअली ने उत्तर दिया, 'कह नही सकता । अनुमान करता हू कि जरूर मिले होगे । कर्नल साहब की हवेली में ही तो वह बिहूर-वाला ठहरा था । उसको टोपे कहते हैं ।' 'इन लोगो में क्या बात चीत हुई या किस प्रसंग की चर्चा हुई यह जानने की जरूरत है ।' मैने जानने की कोशिश की । लेकिन वे लोग दीवान रघुनाथसिंह के वहा ऐसी जगह बैठे थे कि वहा से सुनाई नहीं पड सकता था ।' 'ये लोग रानी साहब के पास भी गये ।' 'जी हां गये । और हँसते खुश होते हुये लौटे ।'

लक्ष्मीबाई २०१ 'कर्नल साहब के यहा वह टोपी या टोपे क्या किया करता था ?' 'कर्नल साहब की हवेली के नजदीक नाटकशाला वाली जूही रहती है। मुझको मालूम होता है कि उस टोपे के लिये वह चुम्बक है।' 'हो सकता है। और इसीलिये शायद वह कर्नल साहब के यहा ठहरता है। मगर जवाहरसिंह का और इस टोपे का रघुनाथसिंह की भीतरी बैठक में देर तक बातचीत करना, किस मतलब से हुआ होगा ? खुदाबख्श कहां है ?' 'वह तो मोतीबाई के पीछे दीवाने हो रहे हैं।' 'मोतीबाई रानी साहब के पास कभी जाती है ?' 'जी हा, कभी कभी।' 'उससे काम नही निकाला जा सकता ?' 'कोशिश करूंगा।' नवाब साहब सोचने लगे, 'मोतीबाई को मेरे पास लिवा लाओ। गाने के बहाने से।' पीरअली—'लेकिन वह कही भी नही गाती। बहुत कम बाहर निकलती है।' नवाब—'मेरे यहा गायगी। लेकिन खुदाबख्श को खबर न हो। खुदाबख्श से बाद में बातचीत की जावेगी।' पीरअली अपने घर गया। देखा तो मोतीबाई मौजूद। पीरअली ने सोचा बहुत अच्छा शकुन हुआ। आवभगत के बाद उसने मोतीबाई से बातचीत की। 'मैं तो आपके यहाँ आने वाला था,' प्रसन्न होकर पीरअली ने कहा। मोतीबाई ने मधुर मुस्कान के फूल बरसाये। साडी का घूंघट खीचा। गर्दन मोडी। बोली, 'मै खुद आगई। आप किस लिये कष्ट कर रहे थे ?' 'नवाब साहब को गाने का शौक हुआ है। कहा अकेले में सुन लूंगा। महफ़िल न होगी।'

२०२ झांसी की रानी 'और मैं भी यही सोचकर आई हूं। अब पर्दे में गुजर नहीं हो सकती खुले आम तो नाचना गाना मुझसे न होगा, चाहे भूखे भले ही मर जाऊँ। मगर नवाब साहब सरीखे बड़े आदमियो को सुना आने में मुझको कोई उज्ज्र न होगा।' 'नवाब साहब भी यही फरमाते थे। वह महफिल नहीं जोड़ेंगे।' 'आप भी सुना करिये।' 'मैं तो फर्ज और शौक दोनो के लिये मौजूद रहूँगा। उस्ताद मुग़लखां के धुरपद से जब जी भर जाये, तब आपका ख्याल और नाटक के गीत ही मौज पैदा कर सकते हैं। सच पूछिये तो न दिन भर का समय हो और न मुग़लखां साहब को सुना जा सके।' 'तो मैं कितने बजे आऊ ?' 'मेरे ख्याल में शाम का वक्त अच्छा रहेगा।' 'जी हां। लेकिन मैं आठ बजे चली आऊगी।' 'हा ठीक है। दो घंटे क्या कम हैं।' मोतीबाई समय नियुक्त करके चली गई। पीरअली ने सोचा, 'उमर कुछ बढ गई है मगर अब भी झूमती फुलवारियो सा मतमाता योवन है।' पीर अली ने नवाब साहब को सूचना दी। सन्ध्या के छः बजे मोतीबाई आगई। पर्दे की आड टूट गई। प्रारम्भ में जरा शरमाते शरमाते। अलीबहादुर ने सोचा स्वाभाविक है। उनको आश्चर्य यही था कि रंगमञ्च पर बिना किसी शील संकोच के नृत्य गान करने और हाव भाव दिखलाने वाली अभिनेत्री इतने दिनो और ऐसा पर्दे का ढोग क्यो किये रही। नवाब ने रसीलेपन से कहा, 'मैंने रंगशाला में आपकी कला का कमाल देखा है। समझ में नहीं आता था कि इतना नाज संकोच और पर्दा मेरे घर आकर भी आप क्यों करती रही हैं।'

लक्ष्मीबाई २०३ 'हुजूर' मोतीबाई बोली, 'आदत पड गई थी। अब भी बिल्कुल नही छूटी है। गुजर के लिये पर्दे को कम कर दिया है लेकिन बिलकुल तो न छोड सकूँगी। बहुत लोगो ने अङ्गरेज सरकार की नौकरी करली है। मुझे तो कोई नौकरी मिल नही सकती, इसलिये गाने बजाने से पेट भरना तै कर लिया है। आप सरीखे कुछ रईसो को खुश करना ही मेरी गुजर के लिये काफी होगा।' नवाब ने सोचा मोतीबाई शोख हो गई है उसकी वह शोखी उनको भली मालूम हुई। मोतीबाई ने लगभग एक घन्टा गाया नाचा परन्तु इसके बाद न तो नवाब साहब का मन लगा और न मोतीबाई का। नवाब साहब ने कहा, 'ज़रा सुस्ता लीजिये। फिर देखा जायगा। तब तक बात करें। पीरअली पान लाना।' पीरअली ने पान दिये। नवाब ने पूछा, 'कभी आप महलो में जाती हैं? काम ही क्या पडता होगा।' 'जाती हूँ,' मोतीबाई ने उत्तर दिया, 'रानी साहब भजन सुनती हैं। उनको मीरा के भजन बहुत पसन्द हैं। रोज़ तो नही जाती हूँ। कभी कभी सुना आती हूँ। वहा थोडा बहुत मिल जाता है।' 'रानी साहब की पैन्शन में से बहुत लोगो को सहारा मिलता है इसलिये बिचारी को मुश्किल का सामना करना पडता होगा।' 'ज़रूर, मगर वे बहुत उदार हैं। उनका निजी खर्च तो बहुत कम है। दान पुण्य में बहुत दे डालती हैं।' 'बहुत नेक हैं। और फिर इधर उधर के आने जाने वाले नाते रिश्ते के लोग पुराने मुलाजिम लगे हैं उनको भी कुछ न कुछ देना ही पडता होगा।' मोतीबाई की एक आंख के कोने पर सजगता आई। दरवाजे से सटा हुआ पीरअली कान खडे करके सुनने लगा।