भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 207, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 207

१६६ लक्ष्मीबाई बख्शिशअली ने उस आज्ञा का यह अर्थ समझा कि कैदी के साथ पूरी रियायत की जावे । 'स्कीन और गार्डन उधर गये और इधर बख्शिशअली ने कुँवर सागरसिंह की हथकडी-बेडी खोल दी । केवल साधारण पहरा रहने दिया । सागरसिंह ने कहा, 'दरोगा साहब, बहुत भूख लगी है । किसी ब्राह्मण के हाथ अच्छा खाना पकवा दीजिये ।' बख्शिशअली बोला, 'कुँवर साहब, मै तो पूडी-मिठाई से आपका थाल भर देता, परन्तु इन अफसरों के मारे मजबूर हूँ। अब लीजिये, कोई दिक्कत नही रही, हुकुम हो गया है ।' अच्छा खाना बनवाया गया । आदर के साथ परोसा गया । पहरेदारो के मन पर भी कुँवर साहब का आतंक छा गया । शाम हुई । रात हुई । पहरे वाले जागते जागते, सो गये । बख्शिशअली को दिन भर के परिश्रम के मारे थकावट आई । वह भी चैन में सो गया । कुँवर सागरसिंह को सुअवसर प्राप्त हुआ । चन्दवरदाई का दोहार्द्ध याद आया—'फेर न जननी जन्म है, फेर न खेचे कमान' और चुपचाप दीवार लांघकर नौ-दो-ग्यारह हुआ और सवेरा होते होते ऐसे जङ्गल मे पहुच गया, जहा उसके विश्वास के अनुसार, स्कीन और गार्डन के फरिश्ते भी नही पहुँच सकते थे । प्रात.काल जेल भर मे गडबडी फैल गई । बख्शिशअली का होश कपूर हो गया । कभी जेल में हडबडाकर पहुँचता और कभी घर में बीबी- बच्चो के पास आकर सिर पीटता । स्कीन और गार्डन के पास भी खबर पहुंची । वे दोनो तुरन्त आये । क्रोध में डूबते-उतराते । बख्शिशअली ने अत्यन्त विनम्र प्रणाम किया । और अत्यन्त कातर स्वर मे कहा, 'हुजूर हुकुम दे गये थे कि हथकडी-बेडी खोल दो और