झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
१६६ लक्ष्मीबाई बख्शिशअली ने उस आज्ञा का यह अर्थ समझा कि कैदी के साथ पूरी रियायत की जावे । 'स्कीन और गार्डन उधर गये और इधर बख्शिशअली ने कुँवर सागरसिंह की हथकडी-बेडी खोल दी । केवल साधारण पहरा रहने दिया । सागरसिंह ने कहा, 'दरोगा साहब, बहुत भूख लगी है । किसी ब्राह्मण के हाथ अच्छा खाना पकवा दीजिये ।' बख्शिशअली बोला, 'कुँवर साहब, मै तो पूडी-मिठाई से आपका थाल भर देता, परन्तु इन अफसरों के मारे मजबूर हूँ। अब लीजिये, कोई दिक्कत नही रही, हुकुम हो गया है ।' अच्छा खाना बनवाया गया । आदर के साथ परोसा गया । पहरेदारो के मन पर भी कुँवर साहब का आतंक छा गया । शाम हुई । रात हुई । पहरे वाले जागते जागते, सो गये । बख्शिशअली को दिन भर के परिश्रम के मारे थकावट आई । वह भी चैन में सो गया । कुँवर सागरसिंह को सुअवसर प्राप्त हुआ । चन्दवरदाई का दोहार्द्ध याद आया—'फेर न जननी जन्म है, फेर न खेचे कमान' और चुपचाप दीवार लांघकर नौ-दो-ग्यारह हुआ और सवेरा होते होते ऐसे जङ्गल मे पहुच गया, जहा उसके विश्वास के अनुसार, स्कीन और गार्डन के फरिश्ते भी नही पहुँच सकते थे । प्रात.काल जेल भर मे गडबडी फैल गई । बख्शिशअली का होश कपूर हो गया । कभी जेल में हडबडाकर पहुँचता और कभी घर में बीबी- बच्चो के पास आकर सिर पीटता । स्कीन और गार्डन के पास भी खबर पहुंची । वे दोनो तुरन्त आये । क्रोध में डूबते-उतराते । बख्शिशअली ने अत्यन्त विनम्र प्रणाम किया । और अत्यन्त कातर स्वर मे कहा, 'हुजूर हुकुम दे गये थे कि हथकडी-बेडी खोल दो और
लक्ष्मीबाई १६७ अच्छा खाना दो। मैंने वैसा-ही किया। उस पर पहरा रक्खा। फिर भी रात को वह मौका निकालकर भाग गया।' 'बेवकूफ, गधे, नालायक', स्कीन पागल सा होकर बोला, 'हमने यह हुकुम दिया था ?' और तड़ाक से बख्शिशअली को चढ़े जूते की ठोल दी। वह गिर पडा। वैसी हालत में भी स्कीन ने उसको कई ठोकरे और लगाईं। तब कही उसका क्रोध शान्त हुआ। गार्डन ने कहा, 'बख्शिशअली, गनीमत समझो कि कि तुमको साहब बहादुर ने इतने से ही छोड़ दिया। तुमको हम बरखास्त करना चाहते हैं।' बख्शिशअली रोने लगा। स्कीन ने इशारा किया। बख्शिशअली ने नही देखा। गार्डन बोला, 'अच्छा तुमको बरखास्त नही करता हू, मगर उस पहरे वाले को बरखास्त किया जावेगा, जिसके पहरे मे से कैदी छूटकर भागा है।' वह सिपाही बरखास्त कर दिया गया। बख्शिशअली का अपमान पहरेदारो और कैदियो के सामने हुआ था। मारपीट से ज्यादा वह घोर अपमान उसको खला। सीधा घर गया और बहुत रोया। बीबी-बच्चे भी रोये। बख्शिशअली ने कहा, 'जी चाहता है कि तलवार से तुम सबको कतरकर डाल दूँ और गोली मारकर मै भी मर जाऊँ। राजा गंगाधरराव ने या रानी लक्ष्मीबाई ने कभी तू-तड़ाक तक नही किया। आज इन गोरो ने मेरे बुजुर्गो की इज्जत खाक में मिला दी।' बीबी ने रो-रोकर समझाया। मुश्किल से अपने अपमान और क्षोभ को पीकर, बख्शिशअली ने वह दिन भूखो काटा। 'कैसे मुँह दिखलाऊँगा ?' वह बार बार कहता था, 'कहा तो मै आठो फाटको का कोटपाल था और कहा आज यह हालत हुई !' बारबार मन में आत्मघात की, बीबी-बच्चो को मार डालने की प्रतिक्रिया मन मे
१६८ झांसी की रानी उठती थी, परन्तु उनकी रोती हुई, बेबस सूरतो को देख देखकर सहम जाता था । अन्त में आत्मघात का निश्चय उसके मन के किसी कोने में जाकर लीन हो गया । बख्शिशअली फिर यथावत् काम करने लगा । जब कभी स्कीन या गार्डन जेल—निरीक्षण के लिये आता, बख्शिशअली को ऐसा लगता मानो कोई जल्लाद आया हो ।
लक्ष्मीबाई १६६ [ ३६ ] रानी को झासी की लगभग सब घटनाएँ, समय समय पर, विदित होती रहती थी। स्मरण-शक्ति उनकी, इतनी विशाल थी कि लोगो को आश्चर्य होता था। बख्शिशअली वाली घटना का वर्णन उन्होने सुना और आनन्दराय वाली का भी। यद्यपि दाढी वाली घटना-जेल दरोगा की मारपीट वाली घटना के मुकाबले में कुछ नही थी, तो भी रानी को उन घटनाओ का मूल तत्व समझने में देर नही लगी। जिस स्रोत से गार्डन और स्कीन को प्रेरणा मिली थी वह मूल मे एक ही था – हेकड़ी, अवहेलना, उपेक्षा। रानी का प्रशस्त गौर ललाट लाल हो गया। एक आह खींचकर रह गई। ‘पेट के लिये इन लोगो को यह सब सहन करना पड रहा है,’ रानी ने सोचा। इस तरह की अनेक घटनाएँ जब तब होती रहती थी। अङ्ग्रेज लोग शासन को धाक (Bluff) की पुख्ता नीव पर खडा करते चले जाते थे। धाक रोब का रूप पकडती चली जा रही थी। यही रोब हिन्दुस्थानियो के मन में अङ्ग्रेजो के ‘इकबाल’ की सूरत में उत्पन्न होने को था। परन्तु यह धाक या इकबाल हिन्दू-मुसलमानो के हृदय पर वह अधिकार नही कर पा रहे थे जो साधू और फकीर ने जमाने से कर रक्खा था। रानी इस प्रकार की सब घटनाओ को ध्यान और विविध भावों से सुनती रहती थी। गार्डन भी शहर और अपने जिले का हाल लगन के साथ टटोला करता था, परन्तु अहमन्यता और स्वार्थ के कारण वह सही स्थिति नही समझ सकता था। और न अधिकांश अङ्ग्रेज। एक दिन गार्डन घोडे पर सवार शहर की कोतवाली* के निरीक्षण के लिये आ रहा था। एक साधारण हिन्दू गृहस्थ की बरात सामने पड *यह अब पुरानी कोतवाली कहलाती है।
२०० झाँसी की रानी
गर्ड । दूल्हा घोडे पर चढा था । यह अगरेजो के नये हिन्दुस्थानी तरीके के खिलाफ था । उसने दूल्हा को घोडे पर से उतरने की आज्ञा दी । बारात वालो ने प्रतिवाद किया । उसने एक नही सुनी । आखें लाल- पीली थी । दूल्हा के पिता ने विनय की, 'हमारे यहा राजा तक दूल्हा का मान रखता है ।' 'चुप' गार्डन ने धमकाया । दूल्हा को घोडे पर से उतरना पडा । नवाब अलीबहादुर गार्डन और स्कीन के पास आया-जाया करते थे । परन्तु गार्डन के पास बहुधा । पैन्शन बढने की आशा अभी जीर्ण नही हुई थी । उनको इधर-उधर की खबर पीरअली दिया करता था । वे इन खवरो को गार्डन के पास पहुँचा देते थे । पीरअली ने दीवान जवाहरसिंह के आने का समाचार नवाब साहब को दिया । परन्तु वह और तात्या जब चले गये तब । नवाब ने कहा, 'कुछ दाल में काला है । जवाहरसिंह कटीली वाले राजा की फौज के एक बडे अफसर रहे हैं । विठूर से उस आदमी का इन्ही दिनो आना इल्लत से खाली नही है । क्या है । क्या कर्नल जमाखा भी इन लोगो से मिले ?' पीरअली ने उत्तर दिया, 'कह नही सकता । अनुमान करता हू कि जरूर मिले होगे । कर्नल साहब की हवेली में ही तो वह बिहूर-वाला ठहरा था । उसको टोपे कहते हैं ।' 'इन लोगो में क्या बात चीत हुई या किस प्रसंग की चर्चा हुई यह जानने की जरूरत है ।' मैने जानने की कोशिश की । लेकिन वे लोग दीवान रघुनाथसिंह के वहा ऐसी जगह बैठे थे कि वहा से सुनाई नहीं पड सकता था ।' 'ये लोग रानी साहब के पास भी गये ।' 'जी हां गये । और हँसते खुश होते हुये लौटे ।'
लक्ष्मीबाई २०१ 'कर्नल साहब के यहा वह टोपी या टोपे क्या किया करता था ?' 'कर्नल साहब की हवेली के नजदीक नाटकशाला वाली जूही रहती है। मुझको मालूम होता है कि उस टोपे के लिये वह चुम्बक है।' 'हो सकता है। और इसीलिये शायद वह कर्नल साहब के यहा ठहरता है। मगर जवाहरसिंह का और इस टोपे का रघुनाथसिंह की भीतरी बैठक में देर तक बातचीत करना, किस मतलब से हुआ होगा ? खुदाबख्श कहां है ?' 'वह तो मोतीबाई के पीछे दीवाने हो रहे हैं।' 'मोतीबाई रानी साहब के पास कभी जाती है ?' 'जी हा, कभी कभी।' 'उससे काम नही निकाला जा सकता ?' 'कोशिश करूंगा।' नवाब साहब सोचने लगे, 'मोतीबाई को मेरे पास लिवा लाओ। गाने के बहाने से।' पीरअली—'लेकिन वह कही भी नही गाती। बहुत कम बाहर निकलती है।' नवाब—'मेरे यहा गायगी। लेकिन खुदाबख्श को खबर न हो। खुदाबख्श से बाद में बातचीत की जावेगी।' पीरअली अपने घर गया। देखा तो मोतीबाई मौजूद। पीरअली ने सोचा बहुत अच्छा शकुन हुआ। आवभगत के बाद उसने मोतीबाई से बातचीत की। 'मैं तो आपके यहाँ आने वाला था,' प्रसन्न होकर पीरअली ने कहा। मोतीबाई ने मधुर मुस्कान के फूल बरसाये। साडी का घूंघट खीचा। गर्दन मोडी। बोली, 'मै खुद आगई। आप किस लिये कष्ट कर रहे थे ?' 'नवाब साहब को गाने का शौक हुआ है। कहा अकेले में सुन लूंगा। महफ़िल न होगी।'
२०२ झांसी की रानी 'और मैं भी यही सोचकर आई हूं। अब पर्दे में गुजर नहीं हो सकती खुले आम तो नाचना गाना मुझसे न होगा, चाहे भूखे भले ही मर जाऊँ। मगर नवाब साहब सरीखे बड़े आदमियो को सुना आने में मुझको कोई उज्ज्र न होगा।' 'नवाब साहब भी यही फरमाते थे। वह महफिल नहीं जोड़ेंगे।' 'आप भी सुना करिये।' 'मैं तो फर्ज और शौक दोनो के लिये मौजूद रहूँगा। उस्ताद मुग़लखां के धुरपद से जब जी भर जाये, तब आपका ख्याल और नाटक के गीत ही मौज पैदा कर सकते हैं। सच पूछिये तो न दिन भर का समय हो और न मुग़लखां साहब को सुना जा सके।' 'तो मैं कितने बजे आऊ ?' 'मेरे ख्याल में शाम का वक्त अच्छा रहेगा।' 'जी हां। लेकिन मैं आठ बजे चली आऊगी।' 'हा ठीक है। दो घंटे क्या कम हैं।' मोतीबाई समय नियुक्त करके चली गई। पीरअली ने सोचा, 'उमर कुछ बढ गई है मगर अब भी झूमती फुलवारियो सा मतमाता योवन है।' पीर अली ने नवाब साहब को सूचना दी। सन्ध्या के छः बजे मोतीबाई आगई। पर्दे की आड टूट गई। प्रारम्भ में जरा शरमाते शरमाते। अलीबहादुर ने सोचा स्वाभाविक है। उनको आश्चर्य यही था कि रंगमञ्च पर बिना किसी शील संकोच के नृत्य गान करने और हाव भाव दिखलाने वाली अभिनेत्री इतने दिनो और ऐसा पर्दे का ढोग क्यो किये रही। नवाब ने रसीलेपन से कहा, 'मैंने रंगशाला में आपकी कला का कमाल देखा है। समझ में नहीं आता था कि इतना नाज संकोच और पर्दा मेरे घर आकर भी आप क्यों करती रही हैं।'
लक्ष्मीबाई २०३ 'हुजूर' मोतीबाई बोली, 'आदत पड गई थी। अब भी बिल्कुल नही छूटी है। गुजर के लिये पर्दे को कम कर दिया है लेकिन बिलकुल तो न छोड सकूँगी। बहुत लोगो ने अङ्गरेज सरकार की नौकरी करली है। मुझे तो कोई नौकरी मिल नही सकती, इसलिये गाने बजाने से पेट भरना तै कर लिया है। आप सरीखे कुछ रईसो को खुश करना ही मेरी गुजर के लिये काफी होगा।' नवाब ने सोचा मोतीबाई शोख हो गई है उसकी वह शोखी उनको भली मालूम हुई। मोतीबाई ने लगभग एक घन्टा गाया नाचा परन्तु इसके बाद न तो नवाब साहब का मन लगा और न मोतीबाई का। नवाब साहब ने कहा, 'ज़रा सुस्ता लीजिये। फिर देखा जायगा। तब तक बात करें। पीरअली पान लाना।' पीरअली ने पान दिये। नवाब ने पूछा, 'कभी आप महलो में जाती हैं? काम ही क्या पडता होगा।' 'जाती हूँ,' मोतीबाई ने उत्तर दिया, 'रानी साहब भजन सुनती हैं। उनको मीरा के भजन बहुत पसन्द हैं। रोज़ तो नही जाती हूँ। कभी कभी सुना आती हूँ। वहा थोडा बहुत मिल जाता है।' 'रानी साहब की पैन्शन में से बहुत लोगो को सहारा मिलता है इसलिये बिचारी को मुश्किल का सामना करना पडता होगा।' 'ज़रूर, मगर वे बहुत उदार हैं। उनका निजी खर्च तो बहुत कम है। दान पुण्य में बहुत दे डालती हैं।' 'बहुत नेक हैं। और फिर इधर उधर के आने जाने वाले नाते रिश्ते के लोग पुराने मुलाजिम लगे हैं उनको भी कुछ न कुछ देना ही पडता होगा।' मोतीबाई की एक आंख के कोने पर सजगता आई। दरवाजे से सटा हुआ पीरअली कान खडे करके सुनने लगा।
२०४ झाँसी की रानी मोतीबाई ने मुस्करा कर कहा, 'आते तो बहुत लोग हैं, पर उनको देते लेते मैने नही देखा ।' 'यही क्या कम है कि रानी साहब उनको बातचीत ही के लिये काफी समय देती होगी ।' अलीबहादुर ने सुझाव दिया, 'पूजा-पत्री और सवारी कसरत में भी कई घण्टे निकल जाते हैं ।' मोतीबाई ने तुरन्त कहा, 'न मालूम कहां से दुनिया भर के कामो के लिये वे समय निकाल लेती हैं । सवारी, कसरत कुश्ती करती हैं, औरतों को सिखलाती हैं—पूजा करती हैं, गीताजी को सुनती हैं और न जानें कितने स्त्री-पुरुषो से बातचीत करती हैं । इसी बीच में, कभी कभी मेरा गाना भी सुन लेती हैं ।' 'तुम्हारा गाना तो, बाई जी देवताओ को भी लुभा लेगा,' अलीबहादुर ने दाढी पर हाथ फेरते हुये कहा । मोतीबाई मुस्कराई । झेंप का अभिनय किया । फिर भोलेपन के साथ बोली, 'उन्होने एक काम जरूर बहुत कम कर दिया है । शायद छोड़ ही दिया हो । रामनामी गोलियो का बनाना और अकेले ने बैठ कर मछलियो को खिलाना । यह काम अब उनकी सहेलिया करती हैं ।' 'दासिया, बाई जी ?' 'वह उनको दासिया नही कहती । सहेलिया कहती हैं ।' 'वह बड़ी नेक हैं, बाई जी । अब तो उन्होने पर्दा छोड़ दिया है मैने भी दर्शन किये हैं । न मालूम पहाड़ो और नदियो के घूमने में उनको क्या मज़ा आता है ।' 'मुझसे भी घोड़े की सवारी के लिये कहा था ।' 'सचमुच ? आपने सीखी ?' 'पहने तो बहुत डर लगा, पर अब थोड़ा थोड़ा सीख गई हूँ । उनकी सहेली मुन्दर बड़ी अच्छी सवार है । वही सब औरतों को सिखलाती है ।' 'क्या औरतो को हथियार चलाना भी सिखलाया जाता है ?'
लक्ष्मीबाई २०५ 'वह तो लाजमी है।' 'आपने भी सीखा ?'
- 'सीख रही हू।' 'किस मतलब से ?' 'में तो, अपने हाथ-पैर, अभी बरसो अच्छी हालत में रखना चाहती हू। इसलिये सीखती हूँ। केवल इसी मतलब से रानी साहब सवारी, कसरत इत्यादि करती हैं। और मतलब मुझको मालूम नही।' 'आपको घोडे पर सवार देखकर मुझको बडा अच्छा लगेगा। शायद फुरेरू आ जाय। आपकी तन्दुरुस्ती, रूप, रङ्ग सब पहले से बहुत अच्छे हैं। कारण यही कसरत, सवारी वगैरह है।' अलीबहादुर ने सोचा, स्त्री को पराजित करना हो तो उसकी प्रशसा करो। मोतीबाई पराजित सी जान पडी। मुस्कराकर, झेंपकर, सिमटकर उसने आखो से मादकता उडेली। बोली, 'हुजूर ने तो यो ही बहुत तारीफ कर डाली।' नवाब ने कहा, 'मैने झूठ नही कहा।' फिर हँसने लगे। पान खाया और खिलाया! सतर्कता के साथ पूछा, 'कौन कौन लोग रानी साहब के पास आते हैं, या आये हैं ?' मोतीबाई ने अविलम्ब उत्तर दिया, 'हाल मे बहुत लोग आये हैं। बिठूर से तात्या टोपे, कटीले से दीवान जवाहरसिंह, एक कोई दूल्हाजू, कोई—क्या विनय करूं बहुतो के नाम ही याद नही आ रहे हैं। आगे याद रक्खा करूंगी।' 'जरूर और मुझको बतला दिया करो। रुपये-पैसे की सकुच मत करना आप। जो कुछ थोडा-सा मेरे पास है, वह अपना समझो।' 'आपकी बहुत कृपा है। मैं अहसानो को कभी न भूलूंगी।' 'और ओने-जाने वाले लोग जो कुछ बात किया करे वह भी मुझको सुना जाया करिये। अभी हाल में कोई खास बात हुई हो तो.....।'
२०६ - झांसी की रानी 'हा कुछ बाते तो मुझको मालूम हैं। निवेदन करूँ?' 'अवश्य । मैं ध्यान से सुनू गा।' 'रानी साहब गोद लिये राजकुमार का जनेऊ करना चाहती हैं। उसी का मश्विरा हो रहा है।' 'दीवान जवाहरसिह और रघुनाथसिह से?' 'जी हा। वे सब पुराने नौकरो को और सब नातेदारो को तथा शहर और देहात के रईसो को उस मौके पर बुलावेगी। चूंकि रानी साहब को अपने पुराने आदमियो के सही पते नही मालूम इसलिये जो लोग आते हैं उनके साथ इसी प्रसङ्ग की चर्चा करती हैं। वे राजकुमार के जनेऊ पर बहुत रुपया खर्च करेगी। हा एक बात भूल गई। उन्होने अपनी अपील को विलायत भिजवाया है, उसके लिये लगभग सबसे कहती हैं और जिद करती हैं कि सब छोटे-बड़े साहबो से मेरी सिफारिश करो।' 'आगे कोई और बात मालूम पडे तो मुझको आप ज़रूर बतलाना।' 'अपना कर्तव्य और सौभाग्य समझूंगी', कहकर मोतीबाई चलने को हुई। उसने मुस्कराकर एक कटाक्ष किया। नवाब साहब ने पान दिया। मोतीबाई ने कहा, 'मै सीधी रानी साहब के पास महल जाऊँगी। उनको एकाध भजन सुनाकर फिर घर पहुँचूँगी। यदि कोई खास बात मालूम पडी तो सेवा में आकर अर्ज़ करूँगी।' पीरअली ने अनुरोध किया, 'मै आपको महल तक पहुँचा आऊँ?' मोतीबाई ने इनकार नही किया। मार्ग की चहल-पहल कम हो गई थी, परन्तु बन्द नही हुई थी। मोतीबाई ने अवसर पाकर पीरअली से कहा, 'नवाब साहब के सामने का पर्दा तोड दिया अब और लोगो के सामने भी निकलने लगूँगी।' पीरअली समझ गया। बोला, 'खुदाबख्श साहब मेरे दोस्त हैं। उनसे कहूगा तो वह मेरा मुँह मीठा कर देगे।'
लक्ष्मीबाई २७७ 'जी नही । अभी नही । वे बहुत दिक करते हैं। आपका जैसा मिजाज और कायदा उन्होने नही पाया है ।' पीरअली प्रसन्न भी हुआ और सहमा भी । 'कायदा' शब्द उसको खटका । वह मोतीबाई को महल के फाटक तक पहुँचा कर लौट आया । रानी कथावार्ता का सुनना समाप्त कर चुकी थी । मोतीबाई ने आकर प्रणाम किया । जब सब लोग चले गये रानी ने उससे पूछा, 'क्या हाल है मोती ? मोती ने अनुनय के साथ कहा, 'सरकार को मीरा का एक पद सुना दूँ । तब कुछ निवेदन करूँगी ।' मोती ने तम्बूरे पर मीरा का एक पद सुनाया । फिर तम्बूरा जहां का तहा रखकर बोली, 'सरकार के विरुद्ध एक जासूस और पैदा हो गया है ।' रानी ने शान्त भाष से कहा, 'कौन है मोती ?' नवाब अलीबहादुर ।' 'मुझको सन्देह तो नवाब साहब पर पहले से था । क्या बात हुई ?' मोतीबाई ने ओर से छोर तक सब सुनाया । जनेऊ के सम्बन्ध की बात को सुनकर रानी बोली, 'मुझको तेरी बुद्धि पर अचरज होता है मोती । मेरे मन में दामोदर का जनेऊ करने की और अपने लोगो को निमन्त्रित करके समारोह करने की बात कुछ दिन से उठ रही है । पर मैने उसको प्रगट किसी पर नही किया । तूने कैसे जान लिया ?' 'सरकार' मोतीबाई ने उत्तर दिया, 'एक दिन राजा भैया से आपने कहा था—तुम्हारा जनेऊ होगा । इतना याद था । उसी को मै काम में ले आई ।' रानी ने मुस्कराकर प्रस्ताव किया, 'तुझको खुदाबख्श की भी जाँच करनी है ।'
२०८ झाँसी की रानी मोतीबाई ने जरा सा सिर नवाया । फिर दृढ स्वर मे बोली, 'सरकार मै जाच करूंगी। यदि काम के निकले तो फर्द मे नाम रहने दीजियेगा, नही तो—काट कर अलग कर दीजियेगा ।' 'मुझको विश्वास है मोती', रानी ने कहा, 'लोहा, लोहा ही सिद्ध होगा ।' रानी ने पूछा, 'जूही और दुर्गा कुछ कर रही है ?' मोतीबाई ने उत्तर दिया, 'हा सरकार । दुर्गा फौज के हिन्दुस्थानी अफसरों को नाचना-गाना प्रदर्शित करती है और उनसे भेद लेती है । जूही की परीक्षा बाकी है ।' 'मेरा सम्बन्ध तो प्रकट नही होता ?' रानी ने प्रश्न किया । 'नही सरकार', मोती ने उत्तर दिया । रानी ने कहा, 'मुझको तुम्हारी बुद्धि और अभिनय-कला का भरोसा है ।' मोती ने उत्साह के साथ आश्वासन दिया । 'यदि मेरा अभिनय श्री चरणो की कुछ भी सेवा कर सका, तो मैं अपने जन्म को सार्थक मानू गी ।' मोतीबाई अपने घर चली आई ।
लक्ष्मीबाई २०६ [ ४० ] घर आते ही खुदाबख्श मिला। मोतीबाई ने आड करने का प्रयत्न किया। खुदाबख्श ने कहा, 'मेरे सौभाग्य का संदेशा अभी अभी पीरअली ने दिया, इसीलिये चला आया। बहुत दिनो से कान में मिठास नही पडा। एक बात सुनने को ।' 'पधारिये' कहकर मोतीबाई बैठक मे चली गई। खुदाबख्श बैठक के कोने में बैठ गया। मोतीबाई ने समादान में बत्ती जलाई और इठलाती सी बैठ गई। उसी ने बात शुरू की। मोतीबाई—'मैं थकी मादी हू। इसलिये बात जल्द समाप्त हो जाय, तो मिहरबानी होगी।' खुदाबख्श—'जितने के लिये आया था वह तो पा लिया। अब यह विनती है कि आप घर ही में रहे और मुझे सेवा करने की इजाज़त दें।' मोतीबाई मुस्कराई। आंख के कोने में एक मधुर कलोल हुई और बोली, 'अर्थात् में आपकी कैद मे रहूँ ?' 'खुदाबख्श हर्षोन्मत्त हो गया।' 'मै आपका कैदी बनकर रहूगा।' 'इस प्रकार की बात आपने कितनी स्त्रियो से की है ?' 'खुदा जानता है। मुझको कहने की जरूरत नही।' 'में भी जानती हू। मगर एक वायदा करना होगा। ईमान को बीच मे करके। मै अस्मत इज्जत वाली औरत हू। मेरा भी खुदा जानता है।' 'मुझको मालूम है। इसलिये इतनी बरसो सहा और आसुओ की नदिया बहाई।' 'आसुओ की नदी या नदिया बहाने वालो से मे दूर रहना चाहती हू।' मैं अपना खून बहाने को तैयार हू। 'उसी का ईमान लेना है।'
२१० झाँसी की रानी 'ईमान देता हू । खुदा को बीच में करता हूँ ।' 'बदलियेगा नही ।' 'बदलने की बात मन में आते ही अपनी गर्दन छुरी से रेत डालूगा ।' मोतीबाई मुसकराई । अपनी आंखो में उसने जादू पैदा किया । बोली, 'नवाब अलीबहादुर की नौकरी कर सकोगे ?' खुदाबख्श ने उत्तर दिया, 'कर सकूंगा । आपके हुकुम से सब कुछ कर सकू'गा । वैसे किसी की भी नौकरी न करने की ठान रक्खी थी । अब प्रण तोडू गा । काम क्या करना पडेगा ? नवाब साहब या पीरअली ने आज तक नही कहा ।' 'मै कहती हूँ,' मोतीबाई ने आदेश के ढंग पर कहा, 'आपको जासूसी का काम करना होगा ।' 'जासूसी का काम ! कैसी जासूसी ?' 'रानी साहब के पास कौन कौन आते हैं, किस मतलब से आते हैं, क्या बात करते हैं, कौन से ढग रचते है, अगरेज सरकार के खिलाफ कहा क्या हो रहा है इन बातो का पता लगाना होगा । नवाब साहब इस सेवा के बदले में काफी देंगे और अगरेज सरकार से दिलवायेंगे । बडे बडे साहब से हाथ मिलाने का और अपनी तरक्की करने का, आपको मौका मिलेगा ।' खुदाबख्श तमतमा उठा । हिल गया । माथे की नसे फूल गई । कठ रुद्ध हो गया । मोतीबाई ने सन्तुष्ट होकर यह सब देखा । खुदाबख्श मुश्किल से बोला, 'मुझको आपने बहुत कमीना समझा है । मैने सिपाहीगरी की है । अपने राजा की कृपाओ का मेरे ऊपर उतना ही बोझ है जितना उनकी ज्यादती का । मगर मैने आपको ईमान हारा है । अब तक किसी उम्मेद पर जीवन को टिकाये था । अब कोई जरूरत नही । जाता हू । सबेरे खुदाबख्श का नाम भर बाकी रह जावेगा । अगर भूले बिसरे कभी बन पडे, तो मिट्टी की कब्र पर एकाध फूल डाल देना ।'
लक्ष्मीबाई २११ खुदाबख्श खडा हो गया। मुँह फेर कर जाने को हुआ। मोतीबाई ने लपक कर हाथ पकड लिया। बोली, 'किवाड बन्द कर आइये। फिर सुनिये।' उसने पूछा, 'कुछ बाकी रह गया है ?' मोती ने जल्दी से उत्तर दिया, 'बहुत।' खुदाबख्श काँपते हुये पैरो गया। किवाड बन्द करने के लिये सिर बाहर निकाला। कोई खडा था। भाग गया। खुदाबख्श ने नही पहिचाना। उसने पहिचानने की परवाह भी नही की। बैठक में आकर खडा हो गया। बोला, 'कहिये अब क्या बाकी है ?' 'बैठकर सुनिये।' 'न। इसके लिये ईमान नही दिया।' मोतीबाई हँसी। मोतियो की लडिया सी छुटक गईं। खुदाबख्श पर कोई प्रभाव नही पडा। मोतीबाई ने परख लिया। वह और हँसी। बोली, 'यदि मे अनुरोध करू कि आप रानी लक्ष्मीबाई की नौकरी करे, तो आपके ईमान को कैसा लगेगा ?' 'आप क्या मज़ाक कर रही हैं ?' 'बिलकुल नही। मैं अपने ईमान की सौगन्ध खाती हूँ।' 'फिर वह बात कैसे कही ?' 'बतलाऊँगी। पहले मेरी इस बात का जवाब दीजिये।' 'रानी साहब की सेवा मे तो अपना सिर चढा दूंगा। मगर अब मौका ही क्या आना है ?' 'आयगा। मुझसे पक्की बात करिये।' 'पक्की ही कहता हू। कोई अङ्गरेज पूछे तो उससे भी कह दूंगा।' 'कदापि नही। किसी से मत कहियेगा। नवाब साहब से बिलकुल नही। पीरअली से भी नही।'
२१२ झाँसी की रानी 'हूँ ।' 'हू क्या ? पक्का वायदा रानी साहब की सेवा के लिये करिये ।' 'मेरी जबान ही क्या वायदा करेगी, मेरा रोम रोम वायदा करता है ।' 'अब मुझको भरोसा हो गया । मैने अलीबहादुर साहब की नौकरी और जासूसी के सम्बन्ध में इसलिये पूछा था कि देखूं आप कितने पानी में हैं । परीक्षा ले ली । आप सफल हुये ।' 'कुछ करके दिखलाऊँगा तब कहियेगा ।' 'तभी और कुछ भी कहूंगी,' मोतीबाई मुसकराई । खुदाबख्श की हसरत जागी । बोला, 'कभी तो कह सकूंगा कि अब मै आपका कैदी हो गया ।' मोतीबाई ने मुस्कराते हुये कहा, 'मगर अभी कैद की घड़ी नही आई है । जिस दिन रानी साहब स्वराज्य कायम करके उत्सव मनायेगी मैं अखीरी बार नाचू गी, और उस दिन आपकी कैद में हो जाऊँगी । तब तक आपकी और मेरी अस्मत — दोनो की — उस देवी के हाथो रहेगी, जो झाँसी की रानी कहलाती है और कहलावेगी ।' उस नर्तकी का मुखमण्डल उस समय दिव्यता से भर गया । खुदाबख्श सिपाही था । उसका खून जोश खा गया । मुट्ठी बाधकर बोला, 'ऐसा ही होगा बाई जी । मुझको कभी चूकते पाओ, तो मेरे मुँह पर थूक देना । महारानी साहब से कह देना कि खुदाबख्श उनका पुराना नौकर — सिपाही है, जब उसकी जरूरत पडे, वे कहला भर दे । अपने सीने पर गोली लेने के लिये तुरन्त आ खडा होगा । वेतन या भत्ते का नाम न लेना । दो वक्त खाने के लिये उन्ही का दिया हुआ मेरे पास अभी काफी है । 'मुझको आज बहुत खुशी है', मोतीबाई ने सयत स्वर मे कहा, 'मैं रानी साहब को कल ही सुनाऊँगी । मगर अर्ज है कि नवाब साहब और पीरअली से मत कहना ।'
लक्ष्मीबाई २१३ खुदाबख्श बोला, 'मुझको किसी से कुछ नही कहना है। यकीन रखिये। परन्तु पीरअली के बावत अन्त में आप देखेगी कि आपका भ्रम था।' खुदाबख्श चला गया। दूसरे दिन रानी को मोतीबाई ने सब समाचार दे दिया।
२१४ झाँसी की रानी
[ ४१ ]
रानी जब से घुडसवारी के लिये बाहर निकलने लगी, तब से वह मर्दानी पोशाक करने लगी थी—सिर पर लोहे का कुला, ऊपर साफा, उसका एक खूंट पीछे फहराता हुआ। कंचुकी के ऊपर सटा हुआ अङ्गरखा। पैजामा। अङ्गरखे और पैजामे पर कसी हुई पेटी। दोनो बगलो में पिस्तौले और दोनो ओर परतलो में तलवारें। कभी कभी इतने सब हथियारो के अलावा नेजा भी हाथ में साध लेती थी। इस पर भी घोडे को बहुत तेज चलाने में कसर नही लगाती थी। उनको काठियावाडी घोड़े अधिक पसन्द थे और सफेद रंग के खास तौर पर। घोडो की उनकी 'विलक्षण पहिचान थी। उन्हे कुला लगाकर साफा बाधने मे एक असुविधा अवगत होती थी—लम्बे केशो की। विधवा थी इसलिये महाराष्ट्र की प्रथा के अनुसार, बाल मुडवाने में कोई बाधा न थी। अपने केशो का कोई मोह था ही नही। सोचा काशी जाकर मुण्डन करा ले। पर्यटन हो जावेगा और काशी में बैठकर उस ओर की राजनैतिक परिस्थिति का आभास मिल जावेगा। एक भावना और थी—जिस घर में माता ने जन्म दिया था उसके दर्शन भी मिल जायेंगे। खोज करने पर मालूम हुआ कि बिना डिप्टी कमिश्नर की अनुमति के काशी यात्रा के लिये नही जा सकती ! अनुमति के लिये गार्डन को अर्जी दी गई। उसके पास दीवान जवाहरसिंह इत्यादि के रानी के पास आने जाने की खबरें पहुच चुकीं थी। वह चिढा हुआ था। दूसरे अपने अधिकार को करारे रूप में लाने का अभ्यासी था। काशी यात्रा के लिये जो अर्जी दी गई थी वह उसने अस्वीकृत कर दी। जिसने सुना उसी के जी को चोट लगी। 'रानी ने प्रण किया, 'मैं केश मुंडन तभी कराऊँगी, जब हिन्दुस्थान 'को स्वराज्य मिल जावेगा, नही तो स्मशान में अग्निदेव मुण्डन करेंगे।'
• लक्ष्मीबाई २१५ उनकी यह भीषण प्रतिज्ञा उनकी सहेलियो को मालूम थी । वे सब इस प्रतिज्ञा पर प्रसन्न थी—उनको पसन्द न था कि ऐसे सुन्दर बालो का कुसमय क्षय हो । दामोदरराव रानी के प्रगाढ स्नेह में पल रहा था, बढ रहा था । कोई निज माता अपने गर्भ-प्रसून को इतना प्यार न करती होगी जितना वह दामोदरराव को चाहती थी । समय अपनी प्राकृतिक गति से चला जा रहा था । इसी में रानी की योजना भी संवृद्धि और पुष्ट होती जा रही थी । कहा क्या हो रहा है, इसके समाचार उनको निरन्तर मिलते रहते थे । वह युद्ध सामग्री तैयार करने वाले कारीगरो को एकत्र करने की योजना पर, बहुत जोर देती थी—और यह हो रहा था । इस ओर रानी के जासूस और विश्वसनीय सहायक काम कर रहे थे । उस ओर नाना और राव के तथा बहादुरशाह और अवध के साथ सहानुभूति रखने वालो के लोग, अपने अपने काम में जुटे हुये थे । बिहार, बगाल में भी स्वाधीनता की आग सुलग रही थी । महाराष्ट्र, मध्यदेश, बुन्देलखण्ड उत्तर हिन्द तो मानो उसके पलने ही थे । यहा तो स्त्रिया भी काम कर रही थी । रानी ने देखा कि लोगो को इकट्ठा करने का समय आ गया है । वह जानती थी कि ऐन मौके पर तुरन्त इकट्ठा करना दुष्कर होगा, इसलिये वे सबको एक बार एकत्र करके तब योजना को आगे बढाना चाहती थी । हर काम की एक योजना वे पहले बना लेती थी, तब व्यवस्था के साथ उसको व्यवहार का रूप देती थी । इसलिये उन्होने दामोदरराव का जनेऊ करना निश्चित किया और उसके समारोह में जगह जगह से प्रमुख लोगो का, जमाव करके, आगे के कदम की बावत परामर्श करना तै किया । इस काम के लिये एक लाख रुपये की जरूरत थी नकद रुपया उनकी गाठ में न था ।