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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 218

लक्ष्मीबाई २७७ 'जी नही । अभी नही । वे बहुत दिक करते हैं। आपका जैसा मिजाज और कायदा उन्होने नही पाया है ।' पीरअली प्रसन्न भी हुआ और सहमा भी । 'कायदा' शब्द उसको खटका । वह मोतीबाई को महल के फाटक तक पहुँचा कर लौट आया । रानी कथावार्ता का सुनना समाप्त कर चुकी थी । मोतीबाई ने आकर प्रणाम किया । जब सब लोग चले गये रानी ने उससे पूछा, 'क्या हाल है मोती ? मोती ने अनुनय के साथ कहा, 'सरकार को मीरा का एक पद सुना दूँ । तब कुछ निवेदन करूँगी ।' मोती ने तम्बूरे पर मीरा का एक पद सुनाया । फिर तम्बूरा जहां का तहा रखकर बोली, 'सरकार के विरुद्ध एक जासूस और पैदा हो गया है ।' रानी ने शान्त भाष से कहा, 'कौन है मोती ?' नवाब अलीबहादुर ।' 'मुझको सन्देह तो नवाब साहब पर पहले से था । क्या बात हुई ?' मोतीबाई ने ओर से छोर तक सब सुनाया । जनेऊ के सम्बन्ध की बात को सुनकर रानी बोली, 'मुझको तेरी बुद्धि पर अचरज होता है मोती । मेरे मन में दामोदर का जनेऊ करने की और अपने लोगो को निमन्त्रित करके समारोह करने की बात कुछ दिन से उठ रही है । पर मैने उसको प्रगट किसी पर नही किया । तूने कैसे जान लिया ?' 'सरकार' मोतीबाई ने उत्तर दिया, 'एक दिन राजा भैया से आपने कहा था—तुम्हारा जनेऊ होगा । इतना याद था । उसी को मै काम में ले आई ।' रानी ने मुस्कराकर प्रस्ताव किया, 'तुझको खुदाबख्श की भी जाँच करनी है ।'