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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

लक्ष्मीबाई २७७ 'जी नही । अभी नही । वे बहुत दिक करते हैं। आपका जैसा मिजाज और कायदा उन्होने नही पाया है ।' पीरअली प्रसन्न भी हुआ और सहमा भी । 'कायदा' शब्द उसको खटका । वह मोतीबाई को महल के फाटक तक पहुँचा कर लौट आया । रानी कथावार्ता का सुनना समाप्त कर चुकी थी । मोतीबाई ने आकर प्रणाम किया । जब सब लोग चले गये रानी ने उससे पूछा, 'क्या हाल है मोती ? मोती ने अनुनय के साथ कहा, 'सरकार को मीरा का एक पद सुना दूँ । तब कुछ निवेदन करूँगी ।' मोती ने तम्बूरे पर मीरा का एक पद सुनाया । फिर तम्बूरा जहां का तहा रखकर बोली, 'सरकार के विरुद्ध एक जासूस और पैदा हो गया है ।' रानी ने शान्त भाष से कहा, 'कौन है मोती ?' नवाब अलीबहादुर ।' 'मुझको सन्देह तो नवाब साहब पर पहले से था । क्या बात हुई ?' मोतीबाई ने ओर से छोर तक सब सुनाया । जनेऊ के सम्बन्ध की बात को सुनकर रानी बोली, 'मुझको तेरी बुद्धि पर अचरज होता है मोती । मेरे मन में दामोदर का जनेऊ करने की और अपने लोगो को निमन्त्रित करके समारोह करने की बात कुछ दिन से उठ रही है । पर मैने उसको प्रगट किसी पर नही किया । तूने कैसे जान लिया ?' 'सरकार' मोतीबाई ने उत्तर दिया, 'एक दिन राजा भैया से आपने कहा था—तुम्हारा जनेऊ होगा । इतना याद था । उसी को मै काम में ले आई ।' रानी ने मुस्कराकर प्रस्ताव किया, 'तुझको खुदाबख्श की भी जाँच करनी है ।'

२०८ झाँसी की रानी मोतीबाई ने जरा सा सिर नवाया । फिर दृढ स्वर मे बोली, 'सरकार मै जाच करूंगी। यदि काम के निकले तो फर्द मे नाम रहने दीजियेगा, नही तो—काट कर अलग कर दीजियेगा ।' 'मुझको विश्वास है मोती', रानी ने कहा, 'लोहा, लोहा ही सिद्ध होगा ।' रानी ने पूछा, 'जूही और दुर्गा कुछ कर रही है ?' मोतीबाई ने उत्तर दिया, 'हा सरकार । दुर्गा फौज के हिन्दुस्थानी अफसरों को नाचना-गाना प्रदर्शित करती है और उनसे भेद लेती है । जूही की परीक्षा बाकी है ।' 'मेरा सम्बन्ध तो प्रकट नही होता ?' रानी ने प्रश्न किया । 'नही सरकार', मोती ने उत्तर दिया । रानी ने कहा, 'मुझको तुम्हारी बुद्धि और अभिनय-कला का भरोसा है ।' मोती ने उत्साह के साथ आश्वासन दिया । 'यदि मेरा अभिनय श्री चरणो की कुछ भी सेवा कर सका, तो मैं अपने जन्म को सार्थक मानू गी ।' मोतीबाई अपने घर चली आई ।

लक्ष्मीबाई २०६ [ ४० ] घर आते ही खुदाबख्श मिला। मोतीबाई ने आड करने का प्रयत्न किया। खुदाबख्श ने कहा, 'मेरे सौभाग्य का संदेशा अभी अभी पीरअली ने दिया, इसीलिये चला आया। बहुत दिनो से कान में मिठास नही पडा। एक बात सुनने को ।' 'पधारिये' कहकर मोतीबाई बैठक मे चली गई। खुदाबख्श बैठक के कोने में बैठ गया। मोतीबाई ने समादान में बत्ती जलाई और इठलाती सी बैठ गई। उसी ने बात शुरू की। मोतीबाई—'मैं थकी मादी हू। इसलिये बात जल्द समाप्त हो जाय, तो मिहरबानी होगी।' खुदाबख्श—'जितने के लिये आया था वह तो पा लिया। अब यह विनती है कि आप घर ही में रहे और मुझे सेवा करने की इजाज़त दें।' मोतीबाई मुस्कराई। आंख के कोने में एक मधुर कलोल हुई और बोली, 'अर्थात् में आपकी कैद मे रहूँ ?' 'खुदाबख्श हर्षोन्मत्त हो गया।' 'मै आपका कैदी बनकर रहूगा।' 'इस प्रकार की बात आपने कितनी स्त्रियो से की है ?' 'खुदा जानता है। मुझको कहने की जरूरत नही।' 'में भी जानती हू। मगर एक वायदा करना होगा। ईमान को बीच मे करके। मै अस्मत इज्जत वाली औरत हू। मेरा भी खुदा जानता है।' 'मुझको मालूम है। इसलिये इतनी बरसो सहा और आसुओ की नदिया बहाई।' 'आसुओ की नदी या नदिया बहाने वालो से मे दूर रहना चाहती हू।' मैं अपना खून बहाने को तैयार हू। 'उसी का ईमान लेना है।'

२१० झाँसी की रानी 'ईमान देता हू । खुदा को बीच में करता हूँ ।' 'बदलियेगा नही ।' 'बदलने की बात मन में आते ही अपनी गर्दन छुरी से रेत डालूगा ।' मोतीबाई मुसकराई । अपनी आंखो में उसने जादू पैदा किया । बोली, 'नवाब अलीबहादुर की नौकरी कर सकोगे ?' खुदाबख्श ने उत्तर दिया, 'कर सकूंगा । आपके हुकुम से सब कुछ कर सकू'गा । वैसे किसी की भी नौकरी न करने की ठान रक्खी थी । अब प्रण तोडू गा । काम क्या करना पडेगा ? नवाब साहब या पीरअली ने आज तक नही कहा ।' 'मै कहती हूँ,' मोतीबाई ने आदेश के ढंग पर कहा, 'आपको जासूसी का काम करना होगा ।' 'जासूसी का काम ! कैसी जासूसी ?' 'रानी साहब के पास कौन कौन आते हैं, किस मतलब से आते हैं, क्या बात करते हैं, कौन से ढग रचते है, अगरेज सरकार के खिलाफ कहा क्या हो रहा है इन बातो का पता लगाना होगा । नवाब साहब इस सेवा के बदले में काफी देंगे और अगरेज सरकार से दिलवायेंगे । बडे बडे साहब से हाथ मिलाने का और अपनी तरक्की करने का, आपको मौका मिलेगा ।' खुदाबख्श तमतमा उठा । हिल गया । माथे की नसे फूल गई । कठ रुद्ध हो गया । मोतीबाई ने सन्तुष्ट होकर यह सब देखा । खुदाबख्श मुश्किल से बोला, 'मुझको आपने बहुत कमीना समझा है । मैने सिपाहीगरी की है । अपने राजा की कृपाओ का मेरे ऊपर उतना ही बोझ है जितना उनकी ज्यादती का । मगर मैने आपको ईमान हारा है । अब तक किसी उम्मेद पर जीवन को टिकाये था । अब कोई जरूरत नही । जाता हू । सबेरे खुदाबख्श का नाम भर बाकी रह जावेगा । अगर भूले बिसरे कभी बन पडे, तो मिट्टी की कब्र पर एकाध फूल डाल देना ।'

लक्ष्मीबाई २११ खुदाबख्श खडा हो गया। मुँह फेर कर जाने को हुआ। मोतीबाई ने लपक कर हाथ पकड लिया। बोली, 'किवाड बन्द कर आइये। फिर सुनिये।' उसने पूछा, 'कुछ बाकी रह गया है ?' मोती ने जल्दी से उत्तर दिया, 'बहुत।' खुदाबख्श काँपते हुये पैरो गया। किवाड बन्द करने के लिये सिर बाहर निकाला। कोई खडा था। भाग गया। खुदाबख्श ने नही पहिचाना। उसने पहिचानने की परवाह भी नही की। बैठक में आकर खडा हो गया। बोला, 'कहिये अब क्या बाकी है ?' 'बैठकर सुनिये।' 'न। इसके लिये ईमान नही दिया।' मोतीबाई हँसी। मोतियो की लडिया सी छुटक गईं। खुदाबख्श पर कोई प्रभाव नही पडा। मोतीबाई ने परख लिया। वह और हँसी। बोली, 'यदि मे अनुरोध करू कि आप रानी लक्ष्मीबाई की नौकरी करे, तो आपके ईमान को कैसा लगेगा ?' 'आप क्या मज़ाक कर रही हैं ?' 'बिलकुल नही। मैं अपने ईमान की सौगन्ध खाती हूँ।' 'फिर वह बात कैसे कही ?' 'बतलाऊँगी। पहले मेरी इस बात का जवाब दीजिये।' 'रानी साहब की सेवा मे तो अपना सिर चढा दूंगा। मगर अब मौका ही क्या आना है ?' 'आयगा। मुझसे पक्की बात करिये।' 'पक्की ही कहता हू। कोई अङ्गरेज पूछे तो उससे भी कह दूंगा।' 'कदापि नही। किसी से मत कहियेगा। नवाब साहब से बिलकुल नही। पीरअली से भी नही।'

२१२ झाँसी की रानी 'हूँ ।' 'हू क्या ? पक्का वायदा रानी साहब की सेवा के लिये करिये ।' 'मेरी जबान ही क्या वायदा करेगी, मेरा रोम रोम वायदा करता है ।' 'अब मुझको भरोसा हो गया । मैने अलीबहादुर साहब की नौकरी और जासूसी के सम्बन्ध में इसलिये पूछा था कि देखूं आप कितने पानी में हैं । परीक्षा ले ली । आप सफल हुये ।' 'कुछ करके दिखलाऊँगा तब कहियेगा ।' 'तभी और कुछ भी कहूंगी,' मोतीबाई मुसकराई । खुदाबख्श की हसरत जागी । बोला, 'कभी तो कह सकूंगा कि अब मै आपका कैदी हो गया ।' मोतीबाई ने मुस्कराते हुये कहा, 'मगर अभी कैद की घड़ी नही आई है । जिस दिन रानी साहब स्वराज्य कायम करके उत्सव मनायेगी मैं अखीरी बार नाचू गी, और उस दिन आपकी कैद में हो जाऊँगी । तब तक आपकी और मेरी अस्मत — दोनो की — उस देवी के हाथो रहेगी, जो झाँसी की रानी कहलाती है और कहलावेगी ।' उस नर्तकी का मुखमण्डल उस समय दिव्यता से भर गया । खुदाबख्श सिपाही था । उसका खून जोश खा गया । मुट्ठी बाधकर बोला, 'ऐसा ही होगा बाई जी । मुझको कभी चूकते पाओ, तो मेरे मुँह पर थूक देना । महारानी साहब से कह देना कि खुदाबख्श उनका पुराना नौकर — सिपाही है, जब उसकी जरूरत पडे, वे कहला भर दे । अपने सीने पर गोली लेने के लिये तुरन्त आ खडा होगा । वेतन या भत्ते का नाम न लेना । दो वक्त खाने के लिये उन्ही का दिया हुआ मेरे पास अभी काफी है । 'मुझको आज बहुत खुशी है', मोतीबाई ने सयत स्वर मे कहा, 'मैं रानी साहब को कल ही सुनाऊँगी । मगर अर्ज है कि नवाब साहब और पीरअली से मत कहना ।'

लक्ष्मीबाई २१३ खुदाबख्श बोला, 'मुझको किसी से कुछ नही कहना है। यकीन रखिये। परन्तु पीरअली के बावत अन्त में आप देखेगी कि आपका भ्रम था।' खुदाबख्श चला गया। दूसरे दिन रानी को मोतीबाई ने सब समाचार दे दिया।

२१४ झाँसी की रानी

[ ४१ ]

रानी जब से घुडसवारी के लिये बाहर निकलने लगी, तब से वह मर्दानी पोशाक करने लगी थी—सिर पर लोहे का कुला, ऊपर साफा, उसका एक खूंट पीछे फहराता हुआ। कंचुकी के ऊपर सटा हुआ अङ्गरखा। पैजामा। अङ्गरखे और पैजामे पर कसी हुई पेटी। दोनो बगलो में पिस्तौले और दोनो ओर परतलो में तलवारें। कभी कभी इतने सब हथियारो के अलावा नेजा भी हाथ में साध लेती थी। इस पर भी घोडे को बहुत तेज चलाने में कसर नही लगाती थी। उनको काठियावाडी घोड़े अधिक पसन्द थे और सफेद रंग के खास तौर पर। घोडो की उनकी 'विलक्षण पहिचान थी। उन्हे कुला लगाकर साफा बाधने मे एक असुविधा अवगत होती थी—लम्बे केशो की। विधवा थी इसलिये महाराष्ट्र की प्रथा के अनुसार, बाल मुडवाने में कोई बाधा न थी। अपने केशो का कोई मोह था ही नही। सोचा काशी जाकर मुण्डन करा ले। पर्यटन हो जावेगा और काशी में बैठकर उस ओर की राजनैतिक परिस्थिति का आभास मिल जावेगा। एक भावना और थी—जिस घर में माता ने जन्म दिया था उसके दर्शन भी मिल जायेंगे। खोज करने पर मालूम हुआ कि बिना डिप्टी कमिश्नर की अनुमति के काशी यात्रा के लिये नही जा सकती ! अनुमति के लिये गार्डन को अर्जी दी गई। उसके पास दीवान जवाहरसिंह इत्यादि के रानी के पास आने जाने की खबरें पहुच चुकीं थी। वह चिढा हुआ था। दूसरे अपने अधिकार को करारे रूप में लाने का अभ्यासी था। काशी यात्रा के लिये जो अर्जी दी गई थी वह उसने अस्वीकृत कर दी। जिसने सुना उसी के जी को चोट लगी। 'रानी ने प्रण किया, 'मैं केश मुंडन तभी कराऊँगी, जब हिन्दुस्थान 'को स्वराज्य मिल जावेगा, नही तो स्मशान में अग्निदेव मुण्डन करेंगे।'

• लक्ष्मीबाई २१५ उनकी यह भीषण प्रतिज्ञा उनकी सहेलियो को मालूम थी । वे सब इस प्रतिज्ञा पर प्रसन्न थी—उनको पसन्द न था कि ऐसे सुन्दर बालो का कुसमय क्षय हो । दामोदरराव रानी के प्रगाढ स्नेह में पल रहा था, बढ रहा था । कोई निज माता अपने गर्भ-प्रसून को इतना प्यार न करती होगी जितना वह दामोदरराव को चाहती थी । समय अपनी प्राकृतिक गति से चला जा रहा था । इसी में रानी की योजना भी संवृद्धि और पुष्ट होती जा रही थी । कहा क्या हो रहा है, इसके समाचार उनको निरन्तर मिलते रहते थे । वह युद्ध सामग्री तैयार करने वाले कारीगरो को एकत्र करने की योजना पर, बहुत जोर देती थी—और यह हो रहा था । इस ओर रानी के जासूस और विश्वसनीय सहायक काम कर रहे थे । उस ओर नाना और राव के तथा बहादुरशाह और अवध के साथ सहानुभूति रखने वालो के लोग, अपने अपने काम में जुटे हुये थे । बिहार, बगाल में भी स्वाधीनता की आग सुलग रही थी । महाराष्ट्र, मध्यदेश, बुन्देलखण्ड उत्तर हिन्द तो मानो उसके पलने ही थे । यहा तो स्त्रिया भी काम कर रही थी । रानी ने देखा कि लोगो को इकट्ठा करने का समय आ गया है । वह जानती थी कि ऐन मौके पर तुरन्त इकट्ठा करना दुष्कर होगा, इसलिये वे सबको एक बार एकत्र करके तब योजना को आगे बढाना चाहती थी । हर काम की एक योजना वे पहले बना लेती थी, तब व्यवस्था के साथ उसको व्यवहार का रूप देती थी । इसलिये उन्होने दामोदरराव का जनेऊ करना निश्चित किया और उसके समारोह में जगह जगह से प्रमुख लोगो का, जमाव करके, आगे के कदम की बावत परामर्श करना तै किया । इस काम के लिये एक लाख रुपये की जरूरत थी नकद रुपया उनकी गाठ में न था ।

२१६ झाँसी की रानी दामोदरराव छ वर्ष का हो चुका था । सातवी लग गई । इस वर्ष में जनेऊ होना ही चाहिये । योजना भी इस स्थिति में आगई थी कि इस वर्ष मे एक महान सम्मेलन का किया जाना जरूरी था । मोतीबाई इत्यादि ने समाचार दिया कि अङ्गरेजो की हिन्दुस्थानी सेना में, काफी असन्तोष फैल गया है । रानी ने पुरोहित को बुलाकर मुहूर्त सुधवाया । मुहूर्त निकलने पर गार्डन को अर्जी दी कि दामोदरराव के नाम से जो छ लाख रुपया खजाने में जमा है, उसमे से उसके जनेऊ के लिये एक लाख रुपया दे दिया जावे ।' पहले तो गार्डन की इच्छा अर्जी को तुरन्त खारिज कर देने की हुई । फिर सोचा हिन्दुओ की यह कोई जरूरी रस्म है, इसलिये अन्तिम निर्णय को स्थगित कर दिया । उसने लोगो से पूछ ताँछ शुरू कर दी । अलीबहादुर से खोजा । उन्होने कहा, 'ब्राह्मणो में यह रस्म लाज़मी है ।' सेठ साहूकारो से पूछा । उन्होने कहा, 'अनिवार्य है ।' अन्त में फैसले को अपने पेशकार की सम्मति पर छोडा । पूछने पर पेशकार ने कहा, 'हुजूर ऊँची जाति के हिन्दुओ में, विशेष- कर ब्राह्मणो में यह रस्म किसी प्रकार भी नही टाली जा सकती ।' गाडन ने कमिश्नर से, कमिश्नर ने लेफ्टिनेट गवर्नर से पूछा । अन्त में गार्डन की मर्जी पर इस शर्त के साथ छोडा गया कि अगर झासी शहर के चार भले आदमी जमानत दे तो रुपया दे दिया जाय । गार्डन ने रानी को सूचना दी, 'खजाने में जो रुपया जमा है वह दामोदरराव नाबालिग का है। यदि बालिग होने पर दामोदरराव ने सरकार पर दावा कर दिया तो सरकार को रुपया अपनी थैली में से देना पडेगा, इसलिये झासी शहर के ऐसे चार आदमियो की जमानत दीजिये, जिनमें मेरा मन भरे ।'

लक्ष्मीबाई २१७ रानी को इस अपमान पर जितना क्षोभ हुआ उसकी मात्रा का माप उस मानसिक बल से लग सकता है, जिसकी सहायता से रानी ने उस क्षोभ को दबाया। अपने ही रुपये के लिये ऐसे चार भले आदमियों की जमानत जिनमें मेरा मन भरे !' अङ्गरेजों के, केन्द्रीकरण के, गार्डन के अहंकार की हद हो गई । झाँसी की प्रमुख जनता कुछ इसी तरह सोच रही थी । झाँसी में चार क्या बावन बड़े बड़े आदमी थे। रानी की जमानत देने के लिये सब तैयार हो गये। कुछ ने तो खुदाबख्श और दीवान रघुनाथसिंह से यहां तक कहा, 'अर्ज़ी देने की क्या अटक पड़ी थी ? इतना रुपया तो हमी लोग नजर कर सकते हैं ।' परन्तु रानी को अपने रुपये के लिये हठ था। उन्होंने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। जो 'भले आदमी' जमानत देने के लिये गार्डन के सामने हाजिर हुये, वे थे— लाला बीमा वाले, मगन गन्धी, मोती खत्री और श्याम चौधरी। गार्डन उनको हतोत्साहित करना चाहता था । बोला, 'सोच-समझकर काम करना। बालिग होने से तीन बरस के भीतर तक दामोदरराव दावा कर सकेगा ।' उन लोगों ने विश्वास दिलाया कि यदि ज़रूरत हो तो हम लोग नकद जमानत दाखिल कर दें । गार्डन को झेप मालूम हुई, इसलिये उन लोगों की साधारण जमानत पर उसने रानी को एक लाख रुपया दे दिया । नियुक्त समय पर समारोह हुआ । दूर दूर के लोग इकट्ठे हुये । झाँसी की जनता की ही बहुत बड़ी संख्या थी। नवाब अलीबहादुर भी शरीक हुये ।

२१८ झाँसी की रानी शुभ मुहूर्त में दामोदरराव का जनेऊ हो गया । लोगो ने खुशी खुशी नजर-भेंट की । काफी रुपया जमा हुआ । दावत-पङ्गत हुई । गायन-वादन और दुर्गा का नृत्य । इसके बाद चुने हुये लोगों की बैठक । रानी लक्ष्मीबाई सफेद साडी पहने एक जरा ऊँचे आसन पर बैठी । आसपास उनकी खास सहेलिया । जरा फासले पर नाना साहब और उनके भाई, तात्या टोपे, जवाहरसिंह, रघुनाथसिंह, खुदाबख्श इत्यादि । रानी ने कहा, 'जिस सफलता के साथ आप लोगो के सहयोग से यह छोटा सा यज्ञ हुआ, उसी सफलता के साथ उस बडे यज्ञ की पूर्ति होनी चाहिये ।' नाना बोला, 'अच्छे कारीगरो और बढिया सामान का प्रबन्ध हो गया हैं । यज्ञ की सामग्री ढोने वाले पशुओ और अश्वमेघ के घोडो का भी इन्तजाम कर लिया गया है ।' तात्या—'मैं जरा सीधी भाषा में बात करना चाहता हूँ ।' रानी—'कर सकते हो, सब अपने ही अपने हैं । बाहर स्त्रियो का कठोर पहरा है । काम की बात करके अधिवेशन को समाप्त कर दिया जावेगा । तात्या—'उत्तरी और पूर्वी हिन्दुस्थान में अथक काम हो रहा है । अङ्गरेजो ने जिन कार्तूसो को अरम्भ मे जारी किया था, प्रतिवाद को देखकर लगभग बन्द कर दिया है । परन्तु उनके कारण जो घृणा उत्पन्न हुई थी, वह बिलकुल कम नही हुई है । अब अङ्गरेज हिन्दू सिपाहियो को तिलक टीका लगाये हुये परेड में नही आने देते, इस कारण हिन्दू सिपाहियो में घोर खिन्नता फैल गई है ।' खुदाबख्श—'यहा की फौज के मुसलमान सिपाहियो में भी बहुत जोश है । उनके दीन को बरबाद करने का जो काम चर्बी वाले कारतूसो ने जारी किया था, वह ऐसा नही है, कि कतई तौर पर बन्द हो गया हो ।'

लक्ष्मीबाई २१६ तात्या —'एक दिन था जब अङ्गरेजो के प्रतिनिधि अपने मस्तक को वादशाह के पैर रखने की जगह बतलाते थे ।* अब हमारे सबके सिर पायदान बनते जा रहे हैं। कलाकारो की कला, कारीगरो का शिल्प और अनेक लोगो की रोटी गई । अब धर्म ईमान की बारी आई है । देश और जनता की रक्षा का समय आ गया है ।' रानी—'मेरी समझ में अभी थोडा काम और करने की आवश्यकता है ।' रघुनाथसिंह--'आपकी जो आज्ञा हो । वैसे हम लोग बुन्देलखण्ड से ही प्रारम्भ करने को तैयार हैं ।' रानी—'अभी नही । ओर्छा, अजयगढ और छत्रपुर के राजा बालक हैं । इन राज्यो के प्रबन्ध पर अङ्गरेजो की छाप है । इसके सिवाय क्रान्ति का लग्गा लगवाते ही डाकू और बटमार बढ जावेंगे । हमारी जनता ही इन उपद्रवो से पीडित होगी । जब तक हमारे पास मजबूत सेना नही हो गई है, तब तक हम लोगो को प्रारम्भ नही करना चाहिये । अङ्गरेजो को परास्त करने के साथ साथ इन जन-पीडिको का भी तो दमन करना पडेगा, अन्यथा जनता का क्षोभ अङ्गरेजो के सिर से टलकर हम लोगो के सिर आवेगा । हिन्दुस्थानी सैनिको को अपनाने का क्रम जारी रखना चाहिये । जब मन भर जावे, तब हा कही जावेगी ।' रानी की इस सम्मति से लोग सहमत हुये । *सन् १६१२ में जान रसल का भेजा हुआ पत्र । परिशिष्ठ देखिये ।

२२० झाँसी की रानी [ ४३ ] मऊ छावनी से लेकर मेरठ छावनी तक और मेरठ छावनी से लेकर दमदम बारकपूर की छावनियो तक, विविध प्रकार के लक्षण दिखलाई पडने लगे । मऊ मेरठ, बारकपूर इत्यादि छावनियो में साधू और फकीर, विविध प्रकार के वेष और रूपक धारण करके, क्रांति का कार्य करने लगे । ग्वालियर की छावनी में नारायण शास्त्री उस मिहतराणी को गाना गवाते ले गया । सिपाही उसके नाचने-गाने पर रीझे । समाप्ति पर पैसे देने लगे । नर्तकी ने पूछा, 'आप लोग सेंधिया सरकार के नौकर हैं या अङ्गरेज के ?' 'अङ्गरेज के ।' 'अङ्गरेजो का निमक खाने वालो का पैसा नही छूती ।' और वह इठला कर चली गई । उन लोगो ने नारायण से कहा, 'यह कौन है ? बडी घमंडिन मालूम होती है ।' नारायण—'है तो वैरागिन, परन्तु झांसी की बाईसाहब के राज्य की लडकी है ।' 'उनका राज्य तो चला गया ।' 'अङ्गरेजो ने बेईमानी से ले लिया फिर लौटेगा ।' छावनियो के सिपाही समय पर चुपचाप परेड पर जाते । चुपचाप ड्यूटी करते, परन्तु भन्नाये हुये । अङ्गरेजो को ऊपर की तह चिकनी और समतल दिख रही थी । नीचे के कोलाहल का उनको पता न था । हिन्दुस्थान एक सपने में उनकी चुटकी में आया, सपने में ही चुटकी में बना रहेगा और यह सपना कभी न टूटेगा । वे लोग इस बात को नही जानते थे, उन्होने कभी इस बात को नही जाना, कि हिन्दुस्थान जीता भले ही आसानी के साथ जावे लेकिन बहुत समय तक इसको मुट्ठी में रखे रहना असम्भव है । बाहर से आये हुये शासको को इस देश को पराजित करने में बहुत समय नही लगा ।

लक्ष्मीबाई २२१ शान के साथ अपना अभिषेक करवा लिये । राजगद्दिया भी तोडी-मरोडी, परन्तु शासक की हैसियत से उनका इस देश मे रहना केवल छावनी का प्रवास मात्र रहा । असल में, जनता को रुष्ट, असन्तुष्ट और क्षुब्ध करके यहाँ तो क्या ससार के किसी कोने में कोई भी राज्य नही कर सकता । फिर इस देश की जनता व्यक्तित्व-मग्न और महासस्कृतिमयी है । बहुत दिनो तक कदापि विदेशी शासन को सहन नही कर सकती । इसीलिये उसकी अन्तरात्मा आसानी के साथ, उस समय के स्त्री-पुरुष नेताओ की बात सुन रही थी और मनमें गाठो पर गाठें बाघती चली जाती थी, कि कब अवसर मिले और सिर के बोझ को उतार कर फेक दे ।* 'गार्डन और स्कीन इत्यादि अगरेज सोचते थे कि यहा के लोग दब्बू है—जनता एक भेडियाधसान है, थोडा वेतन पाने वाले बहुसख्यक हिन्दुस्थानी मोटी रकमें समेटने वाले अल्पसख्यक अगरेजो को सदा अपना सहयोग देते रहेगे । अगरेजो का सब स्वार्थ-कार्य शास्त्रीय और वैज्ञानिक ढंग पर चल रहा था । केवल चल नही रहा था किसी ढँग पर भी तो वह था मानव प्रकृति का, भारतीय जान-प्रकृति का, अध्ययन और विश्लेषण । रेल तार जारी हो गये । नहरे खुदी, तालाब सुधारे गये । डाकुओ और बटमारो का दमन हुआ । किसान सुभीते से अपनी खेती काटने लगे । व्योपारी अपना रोजगार करने लगे । मन्दिरो, मसजिदो में लोग अपने विश्वास के अनुसार श्रद्धा भेट कर उठे । कुछ पाठशालाये और मदरसे भी खुल गये । सडके बनी । उन पर पेड लगे । पञ्चायते टूटी । अदालते खुली । कानून का बर्ताव हुआ परन्तु अगरेजो ने यह न समझा, कि हिन्दू मुसलमान मन ही मन मना रहे हैं, कि हमारा खोया हुआ अधिकार फिर कब और कैसे हमारे हाथ में आवेगा ।

  • परिशिष्ट में सर जान मालकम का वक्तव्य देखिये ।

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मध्याह्न [ ४४ ] सं० १६१३ की दीवाली की गई। रीति निभाने के लिये लक्ष्मी जी का पूजन हुआ। दिये जलाये गये। नगर का बाहरी रूप जगमगा उठा। किले पर भी कुछ दिये हिन्दू मुसलमान सिपाहियो ने जलाये। लक्ष्मीबाई के शहरी महल पर भी रोशनी हुई, परन्तु हृदय सुनसान थे-वहा कोई जगमगाहट न थी। अबकी बार अङ्गरेजो के बगलो पर दिये नही जलाये गये, क्योकि अङ्गरेजो ने सोचा इस सम्पर्क से ईसाइयत को धब्बा लग जाने का अन्देशा है। इससे जनता की धारणा और पक्की हो गई—अङ्गरेज हमारे नही हैं, हमारे कभी हो ही नही सकते। मकान के बाहर दिये धरने की रस्म के बाद जूही मोतीबाई के घर आई। जूही यौवन के बसन्त में थी। बडी आँखो में चमक। नीचे देखने के समय लम्बी बरौनिया लाज के पावडे से डालने वाली। परन्तु कुछ उदास थी। मोतीबाई ने नौकरानी को पौर में बिठला दिया और जूही के साथ एकान्त में बातचीत करने लगी। पूछा, 'आज उदास क्यो हो ? क्या बात है ?'

२२४ झाँसी की रानी जूही ने उत्तर दिया, 'वे आये हुये हैं—बिठूर वाले सरदार।' मोतीबाई—'तब तो तुम्हे प्रसन्न होना चाहिये था। देखती हू बिलकुल उल्टा। मुँह लटका हुआ।' जूही—'आज पहली बार ही बात हुई और रूखे बोले।' मोतीबाई—'किस प्रसंग पर।' जूही—'उन्होने अपने निवास स्थान पर बुलवाया। पहले कभी ऐसा नही हुआ था। मुझे संकोच हुआ। परन्तु हिम्मत करके चली गई। सामने पहुचने पर मैं शरम मे डूबने लगी। मुश्किल से मुस्कराकर हाथ जोडे और चुपचाप खडी हो गई।' मोतीबाई — 'अभिनय तो बुरा नही था?' जूही— अभिनय ही तो नही था—अभिनय करना चाहा, नही कर सकी। मैं अपने को भूल गई। उन्होने भोहे सिकोड़ कर कहा क्या सेना में जाकर ऐसी ही खडी हो जाती हो? मैने तब कुछ निवेदन किया।' मोतीबाई—'वे जल्दी में होगे। उतावली कर गए......' जूही—'मुझे तो अचरज हुआ। पहले कई बार देखा-देखी हुई थी।' मोतीबाई—'आजकल मे?' जूही—'नही, कई महीने पहले जब वे कर्नल साहब के यहा आकर ठहरे थे।' मोतीबाई—'तब क्या हुआ था, मे समझी नही।' जूही—'उनको देखकर न जाने मन मे कैसी उथल-पुथल हो जाया करती थी। उन्होने देखा एक क्षण भर। उसी क्षण के भीतर कुछ इस प्रकार हेरे कि मुझको ऐसा लगा मानो घण्टो देखते रहे हो। मैने तो शीघ्र आँख हटा ली थी। फिर मकान के पास से निकले। मे आहट पाकर उनकी आँख के रास्ते में आ गई। उन्होने बहुत कम देखा, परन्तु मैं बहुत देर, बार बार, देखती रही। वे चले गये। मुझे बहुत खला। मोतीबाई—'होता है। फिर क्या हुआ?'

लक्ष्मीबाई २५५ जूही—'वे यहा दो-तीन दिन रहे। मैने निरन्तर उनको अच्छी तरह देख भर लेने की कोशिश की। उन्होने देखा। मैं अघा गई। मैने फिर उनकी दृष्टि को पकडने का प्रयास किया, परन्तु वह किसी ख्याल में ऐसे मस्त थे, कि उनको जूही के मकान का भी स्मरण न रहा होगा। जिस दिन जाने लगे, मैने खिडकी में से निर्लज होकर उनको नमस्ते किया। उन्होने विना किसी लिहाज के मुस्कराकर मेरी नमस्ते का जवाव दिया।' मोतीबाई—'तब और क्या होता?' जूही—'उनको जाते-जाते कुछ सयम मिल गया। घर पर आने की कृपा की।' मोतीबाई—'यह तुमने बतलाया था।' जूही—'मै सहम गई। सिर नीचा किये खडी रह गई। बोले, यदि मुझको खुश करना चाहती हो, तो मोतीबाई जी जो कुछ काम बतलावें, उसको बहुत होशियारी के साथ किया करो। मैने हामी का सिर हिला दिया, परन्तु मुँह से बोल नही निकला। उन्होने कहा, हृदय की बात जीभ को न मालूम होने पावे। मुझको तुम्हारा हाल मालूम होता रहेगा। ईश्वर तुम्हारी मदद करे और वे चले गये। मैने बहुतेरा उनकी आंख के चमत्कार को देखने का प्रयत्न किया, पर वे नही मुडे। मैने उनकी पीठ को इस तरह निगाह गडाकर देखा जैसे वे देख ही रहे हो। चले गये। उसके बाद जो कुछ करती रही हू, आपको मालूम है।' मोतीबाई—'मै महारानी साहव को सुनाती रही हूँ। वे सरदार साहव को सूचना देती रहती हैं।' जूही—'अभी बीच में एक दिन के लिये और आये थे।' मोतीबाई—'हू।' जूही—'तब भी घर पर आये थे—बहुत थोडी देर के लिये। मैने निश्चय कर लिया था—उनको जी भरकर देखूंगी। न देख पाया। उन्होने कुछ बाते पूछीं। कुछ बतलाई। मेरा सिर और आंखे इतनी भारी हो गई थी, कि उठा न पाई। उनकी सुनती गई और मन्जूर करती

२२६ झाँसी की रानी चली गई । नीचे नीचे जरा सा देख लेती थी, वे बात करते मुसकराते थे और मुझको मनमें गुदगुदी सी झकझोरती थी, मैं खूब हँस कर कुछ कहना चाहती थी । हँस कतई नही पाई, बात भी कम कर पाई । जो कुछ बात हुई आपको सुना दी थी, परन्तु और सब कहने का उस दिन मौका न आया था ।' मोतीबाई—'अरी पगली, इसमें उदास होने की कौनसी बात हुई ?' जूही—'नही बाई जी ! मैं जो कुछ कर रही हूँ आपके-हुकम से और अपने राजा-रानी के नमक से अदा होने के लिये । चाहे मैं मार भले ही डाली जाऊँ, परन्तु क्या वे मेरे सिर पर एक वार हाथ भी नही फेर सकते थे ?' मोतीबाई—'यह उनकी गलती है । काम करने वालो का मन रखने के लिये, बढावा देने के लिये बहुत मिठास बरसाना चाहिये ।' जूही—'वह तो आप से मुझको बहुत मिल जाता है ।' मोतीबाई—'किसी दिन रानी साहब के सामने तुमको पेश करू गी । वह बहुत देर बात करेगी ।' जूही—'मेरा जिकर तो आता होगा ?' मोतीबाई—'बहुत वार, परन्तु वे अभी बहुत लोगो से मिलना उचित नही समझती । एक दिन आवेगा, जब तुम उनकी सहेली-सेना में भर्ती हो जाओगी ।' जूही— मैं चाहती हूँ उनके कदमो में मेरा सिर कटकर गिरे ।' मोतीबाई—'सरदार साहब के पूछने पर तुमने क्या निवेदन किया ?' जूही — उनकी रुखाई से मन टूट सा गया था । इसलिये पहले तो मैं जिमीन को अँगूठे से खोदने लगी, फिर हिम्मत करके बतलाया कि फौज के हिन्दू मुसलमानो को ईसाई बनाने की कोशिश की जा रही है, उन्होने ब्योरा मागा । मैने कहा कि सिपाहियो को लोभ दिया जा रहा है, कि यदि वे ईसाई हो जायें तो उनका वेतन भत्ता बढा दिया जावेगा और जो सिपाही पहले ईसाई होगा उसको तुरन्त हवलदार का पद दे दिया