भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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२१२ झाँसी की रानी 'हूँ ।' 'हू क्या ? पक्का वायदा रानी साहब की सेवा के लिये करिये ।' 'मेरी जबान ही क्या वायदा करेगी, मेरा रोम रोम वायदा करता है ।' 'अब मुझको भरोसा हो गया । मैने अलीबहादुर साहब की नौकरी और जासूसी के सम्बन्ध में इसलिये पूछा था कि देखूं आप कितने पानी में हैं । परीक्षा ले ली । आप सफल हुये ।' 'कुछ करके दिखलाऊँगा तब कहियेगा ।' 'तभी और कुछ भी कहूंगी,' मोतीबाई मुसकराई । खुदाबख्श की हसरत जागी । बोला, 'कभी तो कह सकूंगा कि अब मै आपका कैदी हो गया ।' मोतीबाई ने मुस्कराते हुये कहा, 'मगर अभी कैद की घड़ी नही आई है । जिस दिन रानी साहब स्वराज्य कायम करके उत्सव मनायेगी मैं अखीरी बार नाचू गी, और उस दिन आपकी कैद में हो जाऊँगी । तब तक आपकी और मेरी अस्मत — दोनो की — उस देवी के हाथो रहेगी, जो झाँसी की रानी कहलाती है और कहलावेगी ।' उस नर्तकी का मुखमण्डल उस समय दिव्यता से भर गया । खुदाबख्श सिपाही था । उसका खून जोश खा गया । मुट्ठी बाधकर बोला, 'ऐसा ही होगा बाई जी । मुझको कभी चूकते पाओ, तो मेरे मुँह पर थूक देना । महारानी साहब से कह देना कि खुदाबख्श उनका पुराना नौकर — सिपाही है, जब उसकी जरूरत पडे, वे कहला भर दे । अपने सीने पर गोली लेने के लिये तुरन्त आ खडा होगा । वेतन या भत्ते का नाम न लेना । दो वक्त खाने के लिये उन्ही का दिया हुआ मेरे पास अभी काफी है । 'मुझको आज बहुत खुशी है', मोतीबाई ने सयत स्वर मे कहा, 'मैं रानी साहब को कल ही सुनाऊँगी । मगर अर्ज है कि नवाब साहब और पीरअली से मत कहना ।'