झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई २११ खुदाबख्श खडा हो गया। मुँह फेर कर जाने को हुआ। मोतीबाई ने लपक कर हाथ पकड लिया। बोली, 'किवाड बन्द कर आइये। फिर सुनिये।' उसने पूछा, 'कुछ बाकी रह गया है ?' मोती ने जल्दी से उत्तर दिया, 'बहुत।' खुदाबख्श काँपते हुये पैरो गया। किवाड बन्द करने के लिये सिर बाहर निकाला। कोई खडा था। भाग गया। खुदाबख्श ने नही पहिचाना। उसने पहिचानने की परवाह भी नही की। बैठक में आकर खडा हो गया। बोला, 'कहिये अब क्या बाकी है ?' 'बैठकर सुनिये।' 'न। इसके लिये ईमान नही दिया।' मोतीबाई हँसी। मोतियो की लडिया सी छुटक गईं। खुदाबख्श पर कोई प्रभाव नही पडा। मोतीबाई ने परख लिया। वह और हँसी। बोली, 'यदि मे अनुरोध करू कि आप रानी लक्ष्मीबाई की नौकरी करे, तो आपके ईमान को कैसा लगेगा ?' 'आप क्या मज़ाक कर रही हैं ?' 'बिलकुल नही। मैं अपने ईमान की सौगन्ध खाती हूँ।' 'फिर वह बात कैसे कही ?' 'बतलाऊँगी। पहले मेरी इस बात का जवाब दीजिये।' 'रानी साहब की सेवा मे तो अपना सिर चढा दूंगा। मगर अब मौका ही क्या आना है ?' 'आयगा। मुझसे पक्की बात करिये।' 'पक्की ही कहता हू। कोई अङ्गरेज पूछे तो उससे भी कह दूंगा।' 'कदापि नही। किसी से मत कहियेगा। नवाब साहब से बिलकुल नही। पीरअली से भी नही।'