झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१० झाँसी की रानी 'ईमान देता हू । खुदा को बीच में करता हूँ ।' 'बदलियेगा नही ।' 'बदलने की बात मन में आते ही अपनी गर्दन छुरी से रेत डालूगा ।' मोतीबाई मुसकराई । अपनी आंखो में उसने जादू पैदा किया । बोली, 'नवाब अलीबहादुर की नौकरी कर सकोगे ?' खुदाबख्श ने उत्तर दिया, 'कर सकूंगा । आपके हुकुम से सब कुछ कर सकू'गा । वैसे किसी की भी नौकरी न करने की ठान रक्खी थी । अब प्रण तोडू गा । काम क्या करना पडेगा ? नवाब साहब या पीरअली ने आज तक नही कहा ।' 'मै कहती हूँ,' मोतीबाई ने आदेश के ढंग पर कहा, 'आपको जासूसी का काम करना होगा ।' 'जासूसी का काम ! कैसी जासूसी ?' 'रानी साहब के पास कौन कौन आते हैं, किस मतलब से आते हैं, क्या बात करते हैं, कौन से ढग रचते है, अगरेज सरकार के खिलाफ कहा क्या हो रहा है इन बातो का पता लगाना होगा । नवाब साहब इस सेवा के बदले में काफी देंगे और अगरेज सरकार से दिलवायेंगे । बडे बडे साहब से हाथ मिलाने का और अपनी तरक्की करने का, आपको मौका मिलेगा ।' खुदाबख्श तमतमा उठा । हिल गया । माथे की नसे फूल गई । कठ रुद्ध हो गया । मोतीबाई ने सन्तुष्ट होकर यह सब देखा । खुदाबख्श मुश्किल से बोला, 'मुझको आपने बहुत कमीना समझा है । मैने सिपाहीगरी की है । अपने राजा की कृपाओ का मेरे ऊपर उतना ही बोझ है जितना उनकी ज्यादती का । मगर मैने आपको ईमान हारा है । अब तक किसी उम्मेद पर जीवन को टिकाये था । अब कोई जरूरत नही । जाता हू । सबेरे खुदाबख्श का नाम भर बाकी रह जावेगा । अगर भूले बिसरे कभी बन पडे, तो मिट्टी की कब्र पर एकाध फूल डाल देना ।'