झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 220, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई २०६ [ ४० ] घर आते ही खुदाबख्श मिला। मोतीबाई ने आड करने का प्रयत्न किया। खुदाबख्श ने कहा, 'मेरे सौभाग्य का संदेशा अभी अभी पीरअली ने दिया, इसीलिये चला आया। बहुत दिनो से कान में मिठास नही पडा। एक बात सुनने को ।' 'पधारिये' कहकर मोतीबाई बैठक मे चली गई। खुदाबख्श बैठक के कोने में बैठ गया। मोतीबाई ने समादान में बत्ती जलाई और इठलाती सी बैठ गई। उसी ने बात शुरू की। मोतीबाई—'मैं थकी मादी हू। इसलिये बात जल्द समाप्त हो जाय, तो मिहरबानी होगी।' खुदाबख्श—'जितने के लिये आया था वह तो पा लिया। अब यह विनती है कि आप घर ही में रहे और मुझे सेवा करने की इजाज़त दें।' मोतीबाई मुस्कराई। आंख के कोने में एक मधुर कलोल हुई और बोली, 'अर्थात् में आपकी कैद मे रहूँ ?' 'खुदाबख्श हर्षोन्मत्त हो गया।' 'मै आपका कैदी बनकर रहूगा।' 'इस प्रकार की बात आपने कितनी स्त्रियो से की है ?' 'खुदा जानता है। मुझको कहने की जरूरत नही।' 'में भी जानती हू। मगर एक वायदा करना होगा। ईमान को बीच मे करके। मै अस्मत इज्जत वाली औरत हू। मेरा भी खुदा जानता है।' 'मुझको मालूम है। इसलिये इतनी बरसो सहा और आसुओ की नदिया बहाई।' 'आसुओ की नदी या नदिया बहाने वालो से मे दूर रहना चाहती हू।' मैं अपना खून बहाने को तैयार हू। 'उसी का ईमान लेना है।'