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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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२०८ झाँसी की रानी मोतीबाई ने जरा सा सिर नवाया । फिर दृढ स्वर मे बोली, 'सरकार मै जाच करूंगी। यदि काम के निकले तो फर्द मे नाम रहने दीजियेगा, नही तो—काट कर अलग कर दीजियेगा ।' 'मुझको विश्वास है मोती', रानी ने कहा, 'लोहा, लोहा ही सिद्ध होगा ।' रानी ने पूछा, 'जूही और दुर्गा कुछ कर रही है ?' मोतीबाई ने उत्तर दिया, 'हा सरकार । दुर्गा फौज के हिन्दुस्थानी अफसरों को नाचना-गाना प्रदर्शित करती है और उनसे भेद लेती है । जूही की परीक्षा बाकी है ।' 'मेरा सम्बन्ध तो प्रकट नही होता ?' रानी ने प्रश्न किया । 'नही सरकार', मोती ने उत्तर दिया । रानी ने कहा, 'मुझको तुम्हारी बुद्धि और अभिनय-कला का भरोसा है ।' मोती ने उत्साह के साथ आश्वासन दिया । 'यदि मेरा अभिनय श्री चरणो की कुछ भी सेवा कर सका, तो मैं अपने जन्म को सार्थक मानू गी ।' मोतीबाई अपने घर चली आई ।