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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

२१२ झाँसी की रानी 'हूँ ।' 'हू क्या ? पक्का वायदा रानी साहब की सेवा के लिये करिये ।' 'मेरी जबान ही क्या वायदा करेगी, मेरा रोम रोम वायदा करता है ।' 'अब मुझको भरोसा हो गया । मैने अलीबहादुर साहब की नौकरी और जासूसी के सम्बन्ध में इसलिये पूछा था कि देखूं आप कितने पानी में हैं । परीक्षा ले ली । आप सफल हुये ।' 'कुछ करके दिखलाऊँगा तब कहियेगा ।' 'तभी और कुछ भी कहूंगी,' मोतीबाई मुसकराई । खुदाबख्श की हसरत जागी । बोला, 'कभी तो कह सकूंगा कि अब मै आपका कैदी हो गया ।' मोतीबाई ने मुस्कराते हुये कहा, 'मगर अभी कैद की घड़ी नही आई है । जिस दिन रानी साहब स्वराज्य कायम करके उत्सव मनायेगी मैं अखीरी बार नाचू गी, और उस दिन आपकी कैद में हो जाऊँगी । तब तक आपकी और मेरी अस्मत — दोनो की — उस देवी के हाथो रहेगी, जो झाँसी की रानी कहलाती है और कहलावेगी ।' उस नर्तकी का मुखमण्डल उस समय दिव्यता से भर गया । खुदाबख्श सिपाही था । उसका खून जोश खा गया । मुट्ठी बाधकर बोला, 'ऐसा ही होगा बाई जी । मुझको कभी चूकते पाओ, तो मेरे मुँह पर थूक देना । महारानी साहब से कह देना कि खुदाबख्श उनका पुराना नौकर — सिपाही है, जब उसकी जरूरत पडे, वे कहला भर दे । अपने सीने पर गोली लेने के लिये तुरन्त आ खडा होगा । वेतन या भत्ते का नाम न लेना । दो वक्त खाने के लिये उन्ही का दिया हुआ मेरे पास अभी काफी है । 'मुझको आज बहुत खुशी है', मोतीबाई ने सयत स्वर मे कहा, 'मैं रानी साहब को कल ही सुनाऊँगी । मगर अर्ज है कि नवाब साहब और पीरअली से मत कहना ।'

लक्ष्मीबाई २१३ खुदाबख्श बोला, 'मुझको किसी से कुछ नही कहना है। यकीन रखिये। परन्तु पीरअली के बावत अन्त में आप देखेगी कि आपका भ्रम था।' खुदाबख्श चला गया। दूसरे दिन रानी को मोतीबाई ने सब समाचार दे दिया।

२१४ झाँसी की रानी

[ ४१ ]

रानी जब से घुडसवारी के लिये बाहर निकलने लगी, तब से वह मर्दानी पोशाक करने लगी थी—सिर पर लोहे का कुला, ऊपर साफा, उसका एक खूंट पीछे फहराता हुआ। कंचुकी के ऊपर सटा हुआ अङ्गरखा। पैजामा। अङ्गरखे और पैजामे पर कसी हुई पेटी। दोनो बगलो में पिस्तौले और दोनो ओर परतलो में तलवारें। कभी कभी इतने सब हथियारो के अलावा नेजा भी हाथ में साध लेती थी। इस पर भी घोडे को बहुत तेज चलाने में कसर नही लगाती थी। उनको काठियावाडी घोड़े अधिक पसन्द थे और सफेद रंग के खास तौर पर। घोडो की उनकी 'विलक्षण पहिचान थी। उन्हे कुला लगाकर साफा बाधने मे एक असुविधा अवगत होती थी—लम्बे केशो की। विधवा थी इसलिये महाराष्ट्र की प्रथा के अनुसार, बाल मुडवाने में कोई बाधा न थी। अपने केशो का कोई मोह था ही नही। सोचा काशी जाकर मुण्डन करा ले। पर्यटन हो जावेगा और काशी में बैठकर उस ओर की राजनैतिक परिस्थिति का आभास मिल जावेगा। एक भावना और थी—जिस घर में माता ने जन्म दिया था उसके दर्शन भी मिल जायेंगे। खोज करने पर मालूम हुआ कि बिना डिप्टी कमिश्नर की अनुमति के काशी यात्रा के लिये नही जा सकती ! अनुमति के लिये गार्डन को अर्जी दी गई। उसके पास दीवान जवाहरसिंह इत्यादि के रानी के पास आने जाने की खबरें पहुच चुकीं थी। वह चिढा हुआ था। दूसरे अपने अधिकार को करारे रूप में लाने का अभ्यासी था। काशी यात्रा के लिये जो अर्जी दी गई थी वह उसने अस्वीकृत कर दी। जिसने सुना उसी के जी को चोट लगी। 'रानी ने प्रण किया, 'मैं केश मुंडन तभी कराऊँगी, जब हिन्दुस्थान 'को स्वराज्य मिल जावेगा, नही तो स्मशान में अग्निदेव मुण्डन करेंगे।'

• लक्ष्मीबाई २१५ उनकी यह भीषण प्रतिज्ञा उनकी सहेलियो को मालूम थी । वे सब इस प्रतिज्ञा पर प्रसन्न थी—उनको पसन्द न था कि ऐसे सुन्दर बालो का कुसमय क्षय हो । दामोदरराव रानी के प्रगाढ स्नेह में पल रहा था, बढ रहा था । कोई निज माता अपने गर्भ-प्रसून को इतना प्यार न करती होगी जितना वह दामोदरराव को चाहती थी । समय अपनी प्राकृतिक गति से चला जा रहा था । इसी में रानी की योजना भी संवृद्धि और पुष्ट होती जा रही थी । कहा क्या हो रहा है, इसके समाचार उनको निरन्तर मिलते रहते थे । वह युद्ध सामग्री तैयार करने वाले कारीगरो को एकत्र करने की योजना पर, बहुत जोर देती थी—और यह हो रहा था । इस ओर रानी के जासूस और विश्वसनीय सहायक काम कर रहे थे । उस ओर नाना और राव के तथा बहादुरशाह और अवध के साथ सहानुभूति रखने वालो के लोग, अपने अपने काम में जुटे हुये थे । बिहार, बगाल में भी स्वाधीनता की आग सुलग रही थी । महाराष्ट्र, मध्यदेश, बुन्देलखण्ड उत्तर हिन्द तो मानो उसके पलने ही थे । यहा तो स्त्रिया भी काम कर रही थी । रानी ने देखा कि लोगो को इकट्ठा करने का समय आ गया है । वह जानती थी कि ऐन मौके पर तुरन्त इकट्ठा करना दुष्कर होगा, इसलिये वे सबको एक बार एकत्र करके तब योजना को आगे बढाना चाहती थी । हर काम की एक योजना वे पहले बना लेती थी, तब व्यवस्था के साथ उसको व्यवहार का रूप देती थी । इसलिये उन्होने दामोदरराव का जनेऊ करना निश्चित किया और उसके समारोह में जगह जगह से प्रमुख लोगो का, जमाव करके, आगे के कदम की बावत परामर्श करना तै किया । इस काम के लिये एक लाख रुपये की जरूरत थी नकद रुपया उनकी गाठ में न था ।

२१६ झाँसी की रानी दामोदरराव छ वर्ष का हो चुका था । सातवी लग गई । इस वर्ष में जनेऊ होना ही चाहिये । योजना भी इस स्थिति में आगई थी कि इस वर्ष मे एक महान सम्मेलन का किया जाना जरूरी था । मोतीबाई इत्यादि ने समाचार दिया कि अङ्गरेजो की हिन्दुस्थानी सेना में, काफी असन्तोष फैल गया है । रानी ने पुरोहित को बुलाकर मुहूर्त सुधवाया । मुहूर्त निकलने पर गार्डन को अर्जी दी कि दामोदरराव के नाम से जो छ लाख रुपया खजाने में जमा है, उसमे से उसके जनेऊ के लिये एक लाख रुपया दे दिया जावे ।' पहले तो गार्डन की इच्छा अर्जी को तुरन्त खारिज कर देने की हुई । फिर सोचा हिन्दुओ की यह कोई जरूरी रस्म है, इसलिये अन्तिम निर्णय को स्थगित कर दिया । उसने लोगो से पूछ ताँछ शुरू कर दी । अलीबहादुर से खोजा । उन्होने कहा, 'ब्राह्मणो में यह रस्म लाज़मी है ।' सेठ साहूकारो से पूछा । उन्होने कहा, 'अनिवार्य है ।' अन्त में फैसले को अपने पेशकार की सम्मति पर छोडा । पूछने पर पेशकार ने कहा, 'हुजूर ऊँची जाति के हिन्दुओ में, विशेष- कर ब्राह्मणो में यह रस्म किसी प्रकार भी नही टाली जा सकती ।' गाडन ने कमिश्नर से, कमिश्नर ने लेफ्टिनेट गवर्नर से पूछा । अन्त में गार्डन की मर्जी पर इस शर्त के साथ छोडा गया कि अगर झासी शहर के चार भले आदमी जमानत दे तो रुपया दे दिया जाय । गार्डन ने रानी को सूचना दी, 'खजाने में जो रुपया जमा है वह दामोदरराव नाबालिग का है। यदि बालिग होने पर दामोदरराव ने सरकार पर दावा कर दिया तो सरकार को रुपया अपनी थैली में से देना पडेगा, इसलिये झासी शहर के ऐसे चार आदमियो की जमानत दीजिये, जिनमें मेरा मन भरे ।'

लक्ष्मीबाई २१७ रानी को इस अपमान पर जितना क्षोभ हुआ उसकी मात्रा का माप उस मानसिक बल से लग सकता है, जिसकी सहायता से रानी ने उस क्षोभ को दबाया। अपने ही रुपये के लिये ऐसे चार भले आदमियों की जमानत जिनमें मेरा मन भरे !' अङ्गरेजों के, केन्द्रीकरण के, गार्डन के अहंकार की हद हो गई । झाँसी की प्रमुख जनता कुछ इसी तरह सोच रही थी । झाँसी में चार क्या बावन बड़े बड़े आदमी थे। रानी की जमानत देने के लिये सब तैयार हो गये। कुछ ने तो खुदाबख्श और दीवान रघुनाथसिंह से यहां तक कहा, 'अर्ज़ी देने की क्या अटक पड़ी थी ? इतना रुपया तो हमी लोग नजर कर सकते हैं ।' परन्तु रानी को अपने रुपये के लिये हठ था। उन्होंने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। जो 'भले आदमी' जमानत देने के लिये गार्डन के सामने हाजिर हुये, वे थे— लाला बीमा वाले, मगन गन्धी, मोती खत्री और श्याम चौधरी। गार्डन उनको हतोत्साहित करना चाहता था । बोला, 'सोच-समझकर काम करना। बालिग होने से तीन बरस के भीतर तक दामोदरराव दावा कर सकेगा ।' उन लोगों ने विश्वास दिलाया कि यदि ज़रूरत हो तो हम लोग नकद जमानत दाखिल कर दें । गार्डन को झेप मालूम हुई, इसलिये उन लोगों की साधारण जमानत पर उसने रानी को एक लाख रुपया दे दिया । नियुक्त समय पर समारोह हुआ । दूर दूर के लोग इकट्ठे हुये । झाँसी की जनता की ही बहुत बड़ी संख्या थी। नवाब अलीबहादुर भी शरीक हुये ।

२१८ झाँसी की रानी शुभ मुहूर्त में दामोदरराव का जनेऊ हो गया । लोगो ने खुशी खुशी नजर-भेंट की । काफी रुपया जमा हुआ । दावत-पङ्गत हुई । गायन-वादन और दुर्गा का नृत्य । इसके बाद चुने हुये लोगों की बैठक । रानी लक्ष्मीबाई सफेद साडी पहने एक जरा ऊँचे आसन पर बैठी । आसपास उनकी खास सहेलिया । जरा फासले पर नाना साहब और उनके भाई, तात्या टोपे, जवाहरसिंह, रघुनाथसिंह, खुदाबख्श इत्यादि । रानी ने कहा, 'जिस सफलता के साथ आप लोगो के सहयोग से यह छोटा सा यज्ञ हुआ, उसी सफलता के साथ उस बडे यज्ञ की पूर्ति होनी चाहिये ।' नाना बोला, 'अच्छे कारीगरो और बढिया सामान का प्रबन्ध हो गया हैं । यज्ञ की सामग्री ढोने वाले पशुओ और अश्वमेघ के घोडो का भी इन्तजाम कर लिया गया है ।' तात्या—'मैं जरा सीधी भाषा में बात करना चाहता हूँ ।' रानी—'कर सकते हो, सब अपने ही अपने हैं । बाहर स्त्रियो का कठोर पहरा है । काम की बात करके अधिवेशन को समाप्त कर दिया जावेगा । तात्या—'उत्तरी और पूर्वी हिन्दुस्थान में अथक काम हो रहा है । अङ्गरेजो ने जिन कार्तूसो को अरम्भ मे जारी किया था, प्रतिवाद को देखकर लगभग बन्द कर दिया है । परन्तु उनके कारण जो घृणा उत्पन्न हुई थी, वह बिलकुल कम नही हुई है । अब अङ्गरेज हिन्दू सिपाहियो को तिलक टीका लगाये हुये परेड में नही आने देते, इस कारण हिन्दू सिपाहियो में घोर खिन्नता फैल गई है ।' खुदाबख्श—'यहा की फौज के मुसलमान सिपाहियो में भी बहुत जोश है । उनके दीन को बरबाद करने का जो काम चर्बी वाले कारतूसो ने जारी किया था, वह ऐसा नही है, कि कतई तौर पर बन्द हो गया हो ।'

लक्ष्मीबाई २१६ तात्या —'एक दिन था जब अङ्गरेजो के प्रतिनिधि अपने मस्तक को वादशाह के पैर रखने की जगह बतलाते थे ।* अब हमारे सबके सिर पायदान बनते जा रहे हैं। कलाकारो की कला, कारीगरो का शिल्प और अनेक लोगो की रोटी गई । अब धर्म ईमान की बारी आई है । देश और जनता की रक्षा का समय आ गया है ।' रानी—'मेरी समझ में अभी थोडा काम और करने की आवश्यकता है ।' रघुनाथसिंह--'आपकी जो आज्ञा हो । वैसे हम लोग बुन्देलखण्ड से ही प्रारम्भ करने को तैयार हैं ।' रानी—'अभी नही । ओर्छा, अजयगढ और छत्रपुर के राजा बालक हैं । इन राज्यो के प्रबन्ध पर अङ्गरेजो की छाप है । इसके सिवाय क्रान्ति का लग्गा लगवाते ही डाकू और बटमार बढ जावेंगे । हमारी जनता ही इन उपद्रवो से पीडित होगी । जब तक हमारे पास मजबूत सेना नही हो गई है, तब तक हम लोगो को प्रारम्भ नही करना चाहिये । अङ्गरेजो को परास्त करने के साथ साथ इन जन-पीडिको का भी तो दमन करना पडेगा, अन्यथा जनता का क्षोभ अङ्गरेजो के सिर से टलकर हम लोगो के सिर आवेगा । हिन्दुस्थानी सैनिको को अपनाने का क्रम जारी रखना चाहिये । जब मन भर जावे, तब हा कही जावेगी ।' रानी की इस सम्मति से लोग सहमत हुये । *सन् १६१२ में जान रसल का भेजा हुआ पत्र । परिशिष्ठ देखिये ।

२२० झाँसी की रानी [ ४३ ] मऊ छावनी से लेकर मेरठ छावनी तक और मेरठ छावनी से लेकर दमदम बारकपूर की छावनियो तक, विविध प्रकार के लक्षण दिखलाई पडने लगे । मऊ मेरठ, बारकपूर इत्यादि छावनियो में साधू और फकीर, विविध प्रकार के वेष और रूपक धारण करके, क्रांति का कार्य करने लगे । ग्वालियर की छावनी में नारायण शास्त्री उस मिहतराणी को गाना गवाते ले गया । सिपाही उसके नाचने-गाने पर रीझे । समाप्ति पर पैसे देने लगे । नर्तकी ने पूछा, 'आप लोग सेंधिया सरकार के नौकर हैं या अङ्गरेज के ?' 'अङ्गरेज के ।' 'अङ्गरेजो का निमक खाने वालो का पैसा नही छूती ।' और वह इठला कर चली गई । उन लोगो ने नारायण से कहा, 'यह कौन है ? बडी घमंडिन मालूम होती है ।' नारायण—'है तो वैरागिन, परन्तु झांसी की बाईसाहब के राज्य की लडकी है ।' 'उनका राज्य तो चला गया ।' 'अङ्गरेजो ने बेईमानी से ले लिया फिर लौटेगा ।' छावनियो के सिपाही समय पर चुपचाप परेड पर जाते । चुपचाप ड्यूटी करते, परन्तु भन्नाये हुये । अङ्गरेजो को ऊपर की तह चिकनी और समतल दिख रही थी । नीचे के कोलाहल का उनको पता न था । हिन्दुस्थान एक सपने में उनकी चुटकी में आया, सपने में ही चुटकी में बना रहेगा और यह सपना कभी न टूटेगा । वे लोग इस बात को नही जानते थे, उन्होने कभी इस बात को नही जाना, कि हिन्दुस्थान जीता भले ही आसानी के साथ जावे लेकिन बहुत समय तक इसको मुट्ठी में रखे रहना असम्भव है । बाहर से आये हुये शासको को इस देश को पराजित करने में बहुत समय नही लगा ।

लक्ष्मीबाई २२१ शान के साथ अपना अभिषेक करवा लिये । राजगद्दिया भी तोडी-मरोडी, परन्तु शासक की हैसियत से उनका इस देश मे रहना केवल छावनी का प्रवास मात्र रहा । असल में, जनता को रुष्ट, असन्तुष्ट और क्षुब्ध करके यहाँ तो क्या ससार के किसी कोने में कोई भी राज्य नही कर सकता । फिर इस देश की जनता व्यक्तित्व-मग्न और महासस्कृतिमयी है । बहुत दिनो तक कदापि विदेशी शासन को सहन नही कर सकती । इसीलिये उसकी अन्तरात्मा आसानी के साथ, उस समय के स्त्री-पुरुष नेताओ की बात सुन रही थी और मनमें गाठो पर गाठें बाघती चली जाती थी, कि कब अवसर मिले और सिर के बोझ को उतार कर फेक दे ।* 'गार्डन और स्कीन इत्यादि अगरेज सोचते थे कि यहा के लोग दब्बू है—जनता एक भेडियाधसान है, थोडा वेतन पाने वाले बहुसख्यक हिन्दुस्थानी मोटी रकमें समेटने वाले अल्पसख्यक अगरेजो को सदा अपना सहयोग देते रहेगे । अगरेजो का सब स्वार्थ-कार्य शास्त्रीय और वैज्ञानिक ढंग पर चल रहा था । केवल चल नही रहा था किसी ढँग पर भी तो वह था मानव प्रकृति का, भारतीय जान-प्रकृति का, अध्ययन और विश्लेषण । रेल तार जारी हो गये । नहरे खुदी, तालाब सुधारे गये । डाकुओ और बटमारो का दमन हुआ । किसान सुभीते से अपनी खेती काटने लगे । व्योपारी अपना रोजगार करने लगे । मन्दिरो, मसजिदो में लोग अपने विश्वास के अनुसार श्रद्धा भेट कर उठे । कुछ पाठशालाये और मदरसे भी खुल गये । सडके बनी । उन पर पेड लगे । पञ्चायते टूटी । अदालते खुली । कानून का बर्ताव हुआ परन्तु अगरेजो ने यह न समझा, कि हिन्दू मुसलमान मन ही मन मना रहे हैं, कि हमारा खोया हुआ अधिकार फिर कब और कैसे हमारे हाथ में आवेगा ।

  • परिशिष्ट में सर जान मालकम का वक्तव्य देखिये ।

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मध्याह्न [ ४४ ] सं० १६१३ की दीवाली की गई। रीति निभाने के लिये लक्ष्मी जी का पूजन हुआ। दिये जलाये गये। नगर का बाहरी रूप जगमगा उठा। किले पर भी कुछ दिये हिन्दू मुसलमान सिपाहियो ने जलाये। लक्ष्मीबाई के शहरी महल पर भी रोशनी हुई, परन्तु हृदय सुनसान थे-वहा कोई जगमगाहट न थी। अबकी बार अङ्गरेजो के बगलो पर दिये नही जलाये गये, क्योकि अङ्गरेजो ने सोचा इस सम्पर्क से ईसाइयत को धब्बा लग जाने का अन्देशा है। इससे जनता की धारणा और पक्की हो गई—अङ्गरेज हमारे नही हैं, हमारे कभी हो ही नही सकते। मकान के बाहर दिये धरने की रस्म के बाद जूही मोतीबाई के घर आई। जूही यौवन के बसन्त में थी। बडी आँखो में चमक। नीचे देखने के समय लम्बी बरौनिया लाज के पावडे से डालने वाली। परन्तु कुछ उदास थी। मोतीबाई ने नौकरानी को पौर में बिठला दिया और जूही के साथ एकान्त में बातचीत करने लगी। पूछा, 'आज उदास क्यो हो ? क्या बात है ?'

२२४ झाँसी की रानी जूही ने उत्तर दिया, 'वे आये हुये हैं—बिठूर वाले सरदार।' मोतीबाई—'तब तो तुम्हे प्रसन्न होना चाहिये था। देखती हू बिलकुल उल्टा। मुँह लटका हुआ।' जूही—'आज पहली बार ही बात हुई और रूखे बोले।' मोतीबाई—'किस प्रसंग पर।' जूही—'उन्होने अपने निवास स्थान पर बुलवाया। पहले कभी ऐसा नही हुआ था। मुझे संकोच हुआ। परन्तु हिम्मत करके चली गई। सामने पहुचने पर मैं शरम मे डूबने लगी। मुश्किल से मुस्कराकर हाथ जोडे और चुपचाप खडी हो गई।' मोतीबाई — 'अभिनय तो बुरा नही था?' जूही— अभिनय ही तो नही था—अभिनय करना चाहा, नही कर सकी। मैं अपने को भूल गई। उन्होने भोहे सिकोड़ कर कहा क्या सेना में जाकर ऐसी ही खडी हो जाती हो? मैने तब कुछ निवेदन किया।' मोतीबाई—'वे जल्दी में होगे। उतावली कर गए......' जूही—'मुझे तो अचरज हुआ। पहले कई बार देखा-देखी हुई थी।' मोतीबाई—'आजकल मे?' जूही—'नही, कई महीने पहले जब वे कर्नल साहब के यहा आकर ठहरे थे।' मोतीबाई—'तब क्या हुआ था, मे समझी नही।' जूही—'उनको देखकर न जाने मन मे कैसी उथल-पुथल हो जाया करती थी। उन्होने देखा एक क्षण भर। उसी क्षण के भीतर कुछ इस प्रकार हेरे कि मुझको ऐसा लगा मानो घण्टो देखते रहे हो। मैने तो शीघ्र आँख हटा ली थी। फिर मकान के पास से निकले। मे आहट पाकर उनकी आँख के रास्ते में आ गई। उन्होने बहुत कम देखा, परन्तु मैं बहुत देर, बार बार, देखती रही। वे चले गये। मुझे बहुत खला। मोतीबाई—'होता है। फिर क्या हुआ?'

लक्ष्मीबाई २५५ जूही—'वे यहा दो-तीन दिन रहे। मैने निरन्तर उनको अच्छी तरह देख भर लेने की कोशिश की। उन्होने देखा। मैं अघा गई। मैने फिर उनकी दृष्टि को पकडने का प्रयास किया, परन्तु वह किसी ख्याल में ऐसे मस्त थे, कि उनको जूही के मकान का भी स्मरण न रहा होगा। जिस दिन जाने लगे, मैने खिडकी में से निर्लज होकर उनको नमस्ते किया। उन्होने विना किसी लिहाज के मुस्कराकर मेरी नमस्ते का जवाव दिया।' मोतीबाई—'तब और क्या होता?' जूही—'उनको जाते-जाते कुछ सयम मिल गया। घर पर आने की कृपा की।' मोतीबाई—'यह तुमने बतलाया था।' जूही—'मै सहम गई। सिर नीचा किये खडी रह गई। बोले, यदि मुझको खुश करना चाहती हो, तो मोतीबाई जी जो कुछ काम बतलावें, उसको बहुत होशियारी के साथ किया करो। मैने हामी का सिर हिला दिया, परन्तु मुँह से बोल नही निकला। उन्होने कहा, हृदय की बात जीभ को न मालूम होने पावे। मुझको तुम्हारा हाल मालूम होता रहेगा। ईश्वर तुम्हारी मदद करे और वे चले गये। मैने बहुतेरा उनकी आंख के चमत्कार को देखने का प्रयत्न किया, पर वे नही मुडे। मैने उनकी पीठ को इस तरह निगाह गडाकर देखा जैसे वे देख ही रहे हो। चले गये। उसके बाद जो कुछ करती रही हू, आपको मालूम है।' मोतीबाई—'मै महारानी साहव को सुनाती रही हूँ। वे सरदार साहव को सूचना देती रहती हैं।' जूही—'अभी बीच में एक दिन के लिये और आये थे।' मोतीबाई—'हू।' जूही—'तब भी घर पर आये थे—बहुत थोडी देर के लिये। मैने निश्चय कर लिया था—उनको जी भरकर देखूंगी। न देख पाया। उन्होने कुछ बाते पूछीं। कुछ बतलाई। मेरा सिर और आंखे इतनी भारी हो गई थी, कि उठा न पाई। उनकी सुनती गई और मन्जूर करती

२२६ झाँसी की रानी चली गई । नीचे नीचे जरा सा देख लेती थी, वे बात करते मुसकराते थे और मुझको मनमें गुदगुदी सी झकझोरती थी, मैं खूब हँस कर कुछ कहना चाहती थी । हँस कतई नही पाई, बात भी कम कर पाई । जो कुछ बात हुई आपको सुना दी थी, परन्तु और सब कहने का उस दिन मौका न आया था ।' मोतीबाई—'अरी पगली, इसमें उदास होने की कौनसी बात हुई ?' जूही—'नही बाई जी ! मैं जो कुछ कर रही हूँ आपके-हुकम से और अपने राजा-रानी के नमक से अदा होने के लिये । चाहे मैं मार भले ही डाली जाऊँ, परन्तु क्या वे मेरे सिर पर एक वार हाथ भी नही फेर सकते थे ?' मोतीबाई—'यह उनकी गलती है । काम करने वालो का मन रखने के लिये, बढावा देने के लिये बहुत मिठास बरसाना चाहिये ।' जूही—'वह तो आप से मुझको बहुत मिल जाता है ।' मोतीबाई—'किसी दिन रानी साहब के सामने तुमको पेश करू गी । वह बहुत देर बात करेगी ।' जूही—'मेरा जिकर तो आता होगा ?' मोतीबाई—'बहुत वार, परन्तु वे अभी बहुत लोगो से मिलना उचित नही समझती । एक दिन आवेगा, जब तुम उनकी सहेली-सेना में भर्ती हो जाओगी ।' जूही— मैं चाहती हूँ उनके कदमो में मेरा सिर कटकर गिरे ।' मोतीबाई—'सरदार साहब के पूछने पर तुमने क्या निवेदन किया ?' जूही — उनकी रुखाई से मन टूट सा गया था । इसलिये पहले तो मैं जिमीन को अँगूठे से खोदने लगी, फिर हिम्मत करके बतलाया कि फौज के हिन्दू मुसलमानो को ईसाई बनाने की कोशिश की जा रही है, उन्होने ब्योरा मागा । मैने कहा कि सिपाहियो को लोभ दिया जा रहा है, कि यदि वे ईसाई हो जायें तो उनका वेतन भत्ता बढा दिया जावेगा और जो सिपाही पहले ईसाई होगा उसको तुरन्त हवलदार का पद दे दिया

लक्ष्मीबाई २२७ जावेगा । बाकी कुछ नही कह सकी, क्योकि रो डालने को जी चाहता था । यह कहकर चली आई कि फिर सुनाऊँगी, अभी पूजा करनी है । मुश्किल से लक्ष्मी-पूजन करके दिए धर कर आपके पास चली आई हूं ।' मोतीबाई ने जूही को लिपटा लिया । उसने जूही को रोने नही दिया । बोली, 'योही फुसफुसा नही जाना चाहिये देखो वे कितना कठिन और कितना नाजुक कामकर रहे हैं। नाटकशाला में जो लोग तमाशा देखने आते थे, क्या वे घर से हँसते हँसते आते थे ? ससार के दर्द को विसारने के लिये लोग नाटकशाला में बैठ जाते हैं । उनकी रुखाई या अवहेला को देखकर यदि हम लोग रंगमञ्च पर उदास या उदासीन हो जाय, तो खेल बनेगा या बिगडेगा ?' जूही ने मोतीबाई के कन्धे पर अपनी आखें छिपाकर कहा, 'रंगमंच पर हम अपने असली रूप में जाते ही कब हैं ?' मोतीबाई ने जूही की ठेस को समझ लिया । बोली, 'मै उनका जवाब तलब करूँ ?' जूही ने तुरन्त आंखे गडाकर कहा, 'आपसे कैसे बनेगा ?' मोतीबाई—'अपने को भूल जाऊँगी और अभिनेत्री बन जाऊँगी । तुम सिपाहियो के सामने क्या किसी प्रकार का भी लाज संकोच करती हो ?' जूही—'बिलकुल नही । मुझको मालूम ही नही पडता कि मै ऐरो- गैरो से बात कर रही हू और क्या खुराफातबके जा रही हू । आखें मेरी कुछ नही देखती-कान अलबत्ता खूब खुले रहते हैं ।' मोतीबाई—'और उनके सामने ?' जूही ने भोलेपन के साथ कहा, 'उनके सामने तो रोमाञ्च हो हो आता है-पसीना सा आ जाता है । सिट्टी सी भूल जाती है। क्या आप उनसे कुछ कहोगी ?' मोतीबाई बोली, 'आज ही मिलूँगी और कहूँगी ।' जूही ने अनुनय के साथ कहा, 'नही मेरी ओर से कुछ न कहियेगा,— कम से कम, मैने जो कुछ कहा है, वह न बतलाइयेगा । शायद मेरा भ्रम

२३८ झाँसी की रानी ही हो । वे बुरा मान जायंगे । शायद रानी साहब बुरा मान जावें । मैं रानी साहब को अपना देवी देवता समझती हूँ ।' 'मैं मूर्ख नही हू । इस तरह न कहूँगी कि वे समझे तुमने कोई शिकायत की है । तुम्हारा काम व्योरेवार बतलाऊँगी । खुश होगे और तुमसे मिलेगे ।' 'कर्नल साहब की हवेली पर ?' मोतीबाई—'फिर कहा ? तुम्हारे मकान पर ?' जूही—'आपके मकान पर आ जाऊँगी ।' मोतीबाई—'देखू गी, वे जहा उचित समझे ।'

लक्ष्मीबाई २२६ [ ४५ ] उसी समय मोतीबाई चादर ओढकर महल गई । रानी पूजन में थी। उनको लक्ष्मी जी का इष्ट था, इसलिये और लोगो की अपेक्षा इस पूजन को वे अधिक समय देती थी। ड्योढी के एक भाग में तात्या और नाना साहब बैठे हुये थे। तात्या ने मोतीबाई को पहिचान लिया और वह तुरन्त उसको एकान्त में ले जाकर बातचीत करने लगा। तात्या ने प्रश्न किया, 'यहा का हाल अभी ठीक ठीक मालूम नही हुआ। जूही थोडी देर पहले मिली थी, परन्तु वह तो कुछ ऐसी गड गई कि कुछ कह ही नही सकी। केवल यह आश्वासन दे गई कि फिर बतलाऊँगी।' मोतीबाई ने निस्सकोच भाव के साथ उत्तर दिया, 'आप स्त्रियो की प्रकृति को नही जानते।' तात्या ने कहा, 'सुना है कि उनकी प्रकृति टेढी होती है। अभी तक इस विषय के अध्ययन करने का समय नही मिला। जब अवसर आवेगा तब समझने का प्रयत्न करूँगा।' मोतीबाई मुस्कराकर बोली, 'आप शायद ही कभी समझ सकें। परन्तु जरूरत न पडे तो अच्छा ही है। अब काम की बात सुनिये।' तात्या—'मै ध्यान लगाये हू ।' मोतीबाई — फौज के सिपाहियो को ज़बरदस्ती ईसाई बनाये जाने की कोशिश की जा रही है। रामचन्द्रजी और मुहम्मद साहब, दोनो को खुलेग्राम गालियाँ दी जाती हैं। ईसाई बनने के लिये तरह-तरह के प्रलोभन दिये जाते हैं एक अङ्गरेज अफसर तो यहा तक कहता था, कुछ दिनो में सारा हिन्दुस्थान ईसाई हो जावेगा। न एक मन्दिर बचेगा और न एक मस्जिद रहेगी।' तात्या—'इस तरह के समाचार सब तरफ से आ रहे हैं।' मोतीबाई—'क्या सचमुच ऐसा दिन आने वाला है ?'

३. १८५७ का स्वातन्त्र्य समर, झाँसी दुर्ग रक्षा एवं सर ह्यूरोज से भीषण संग्राम

२३० झाँसी की रानी तात्या—'विश्वास रक्खो, वह दिन कभी नही आवेगा। मुझको यह बतलाओ कि यहा के सिपाही खुद क्या भावना रखते हैं?' मोतीबाई—'मुझको पक्का भरोसा है कि एक फी सदी भी हिन्दू या मुसलमान सिपाही किसी भी लालच में आकर अपने धर्म-ईमान को नही बिगाडेगा।' तात्या—'यह तो हम सब लोग जानते हैं। मुझको यह बतलाओ कि गोरो की इस हरकत का यहा की फौज पर असर क्या पडा है?' मोतीबाई—'उनमें से कुछ तुरन्त मारना-मरना चाहते थे, परन्तु धीरज धरकर रुक गये।' तात्या—'अभी मारने-मरने का समय नही आया है। मै चाहता हूँ प्रत्येक पल्टन में से तीन अफसर, जो बिलकुल विश्वास के योग्य हो चुन लिये जावे। उनको कब और क्या करना होगा, वह दो-एक महीने पीछे बतलाया जावेगा। उनमे कह दिया जाय कि वे ईसाई तो होगे ही नही पर इस समय अपना सब्र न खो बैठें। क्रोध भरे रहे, परन्तु उसको निकलने किसी प्रकार न दे, नही तो सब किया-कराया मिट्टी में मिल जावेगा। अबकी बार आऊँगा तब जो कुछ करना है, उसकी तारीख और समय बतला जाऊँगा। आप या जूही इस काम को कर सकेंगी?' मोतीबाई—'मेरे लिये मशहूर है कि मैं बाहर बहुत कम निकलती हूँ। महलो में आती-जाती हूँ। फौज में नृत्य-गान के लिये, मेरा आना जाना तुरन्त सन्देह उत्पन्न करेगा और बाईसाहब भी यह पसन्द न करेंगी। जूही को इसी कारण महल में नही बुलाया जाता। वह बहुत अच्छा नाचती-गाती है, ईश्वर ने उसको रूप भी दिया है और ज़बरदस्त सयम। वह आपको चाहती है।' तात्या—'मुझको? मोतीबाई, यह ज़माना बुद्धि और तलवार को माजने का है, न कि मन को रस में डुबोने का।' मोतीबाई—'तब आप उसको अपने रस में डूबा रहने दीजिये। तभी तो मैंने कहा कि आप नारी-प्रकृति को नही जानते।'

लक्ष्मीबाई २३१ तात्या—'क्या नारी-प्रकृति पुरुष-प्रकृति से बहुत भिन्न होती है ?' मोतीबाई—'कह नही सकती। शायद किसी दिन आप इस विषय को समझे।' तात्या—'ऐसा नही है कि मैं नारी-प्रकृति को बिलकुल ही नही जानता हू। परन्तु सामने इतने महत्व का बड़ा काम है कि और कुछ सूझता ही नही।' मोतीबाई—'आप कृपा करके जूही से ज़रा मीठा बोलिये। एक बार उसके सिर पर शाबाशी का हाथ फेर दीजिये। वह अपने काम का कमाल कर दिखलावेगी।' तात्या—'मैने आपसे सबक लिया और गांठ बाध ली।' मोतीबाई ने हँसकर कहा, 'आपको औरतो से अभी बहुत सीखना है।' तात्या ने देखा—मोतीबाई के प्रबल सौन्दर्य में विलक्षण शोखी है और शोखी में कोई दृढ़ सत्य । हँसकर बोला, 'मानता हूँ। पर आपकी जूही को वह काम करते देखना है, जो मैंने बतलाया है।' मोतीबाई ने भी हँसकर कहा, 'मेरी नही आपकी—आप लोगो की जूही।' 'बेशक। बेशक।' बतलाइये फौज के देशी अफ़सरो पर उसका प्रभाव हो गया है ?' 'हो गया है अनेक पर।' 'इस प्रभाव को बढ़ाना है।' 'बढ़ जायगा।' 'और कोशिश यह करनी है कि अभी भड़क न उठें। जो तारीख और समय नियुक्त होगा, उसकी बाट जोहे।' 'हो सकेगा।' 'एक पल्टन के तीन अफ़सरो को खास तौर पर चुनना है।' 'मुझको जूही की बुद्धि का भरोसा है।'