भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 217, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 217

२०६ - झांसी की रानी 'हा कुछ बाते तो मुझको मालूम हैं। निवेदन करूँ?' 'अवश्य । मैं ध्यान से सुनू गा।' 'रानी साहब गोद लिये राजकुमार का जनेऊ करना चाहती हैं। उसी का मश्विरा हो रहा है।' 'दीवान जवाहरसिह और रघुनाथसिह से?' 'जी हा। वे सब पुराने नौकरो को और सब नातेदारो को तथा शहर और देहात के रईसो को उस मौके पर बुलावेगी। चूंकि रानी साहब को अपने पुराने आदमियो के सही पते नही मालूम इसलिये जो लोग आते हैं उनके साथ इसी प्रसङ्ग की चर्चा करती हैं। वे राजकुमार के जनेऊ पर बहुत रुपया खर्च करेगी। हा एक बात भूल गई। उन्होने अपनी अपील को विलायत भिजवाया है, उसके लिये लगभग सबसे कहती हैं और जिद करती हैं कि सब छोटे-बड़े साहबो से मेरी सिफारिश करो।' 'आगे कोई और बात मालूम पडे तो मुझको आप ज़रूर बतलाना।' 'अपना कर्तव्य और सौभाग्य समझूंगी', कहकर मोतीबाई चलने को हुई। उसने मुस्कराकर एक कटाक्ष किया। नवाब साहब ने पान दिया। मोतीबाई ने कहा, 'मै सीधी रानी साहब के पास महल जाऊँगी। उनको एकाध भजन सुनाकर फिर घर पहुँचूँगी। यदि कोई खास बात मालूम पडी तो सेवा में आकर अर्ज़ करूँगी।' पीरअली ने अनुरोध किया, 'मै आपको महल तक पहुँचा आऊँ?' मोतीबाई ने इनकार नही किया। मार्ग की चहल-पहल कम हो गई थी, परन्तु बन्द नही हुई थी। मोतीबाई ने अवसर पाकर पीरअली से कहा, 'नवाब साहब के सामने का पर्दा तोड दिया अब और लोगो के सामने भी निकलने लगूँगी।' पीरअली समझ गया। बोला, 'खुदाबख्श साहब मेरे दोस्त हैं। उनसे कहूगा तो वह मेरा मुँह मीठा कर देगे।'