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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 216

लक्ष्मीबाई २०५ 'वह तो लाजमी है।' 'आपने भी सीखा ?'

  • 'सीख रही हू।' 'किस मतलब से ?' 'में तो, अपने हाथ-पैर, अभी बरसो अच्छी हालत में रखना चाहती हू। इसलिये सीखती हूँ। केवल इसी मतलब से रानी साहब सवारी, कसरत इत्यादि करती हैं। और मतलब मुझको मालूम नही।' 'आपको घोडे पर सवार देखकर मुझको बडा अच्छा लगेगा। शायद फुरेरू आ जाय। आपकी तन्दुरुस्ती, रूप, रङ्ग सब पहले से बहुत अच्छे हैं। कारण यही कसरत, सवारी वगैरह है।' अलीबहादुर ने सोचा, स्त्री को पराजित करना हो तो उसकी प्रशसा करो। मोतीबाई पराजित सी जान पडी। मुस्कराकर, झेंपकर, सिमटकर उसने आखो से मादकता उडेली। बोली, 'हुजूर ने तो यो ही बहुत तारीफ कर डाली।' नवाब ने कहा, 'मैने झूठ नही कहा।' फिर हँसने लगे। पान खाया और खिलाया! सतर्कता के साथ पूछा, 'कौन कौन लोग रानी साहब के पास आते हैं, या आये हैं ?' मोतीबाई ने अविलम्ब उत्तर दिया, 'हाल मे बहुत लोग आये हैं। बिठूर से तात्या टोपे, कटीले से दीवान जवाहरसिंह, एक कोई दूल्हाजू, कोई—क्या विनय करूं बहुतो के नाम ही याद नही आ रहे हैं। आगे याद रक्खा करूंगी।' 'जरूर और मुझको बतला दिया करो। रुपये-पैसे की सकुच मत करना आप। जो कुछ थोडा-सा मेरे पास है, वह अपना समझो।' 'आपकी बहुत कृपा है। मैं अहसानो को कभी न भूलूंगी।' 'और ओने-जाने वाले लोग जो कुछ बात किया करे वह भी मुझको सुना जाया करिये। अभी हाल में कोई खास बात हुई हो तो.....।'