झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०४ झाँसी की रानी मोतीबाई ने मुस्करा कर कहा, 'आते तो बहुत लोग हैं, पर उनको देते लेते मैने नही देखा ।' 'यही क्या कम है कि रानी साहब उनको बातचीत ही के लिये काफी समय देती होगी ।' अलीबहादुर ने सुझाव दिया, 'पूजा-पत्री और सवारी कसरत में भी कई घण्टे निकल जाते हैं ।' मोतीबाई ने तुरन्त कहा, 'न मालूम कहां से दुनिया भर के कामो के लिये वे समय निकाल लेती हैं । सवारी, कसरत कुश्ती करती हैं, औरतों को सिखलाती हैं—पूजा करती हैं, गीताजी को सुनती हैं और न जानें कितने स्त्री-पुरुषो से बातचीत करती हैं । इसी बीच में, कभी कभी मेरा गाना भी सुन लेती हैं ।' 'तुम्हारा गाना तो, बाई जी देवताओ को भी लुभा लेगा,' अलीबहादुर ने दाढी पर हाथ फेरते हुये कहा । मोतीबाई मुस्कराई । झेंप का अभिनय किया । फिर भोलेपन के साथ बोली, 'उन्होने एक काम जरूर बहुत कम कर दिया है । शायद छोड़ ही दिया हो । रामनामी गोलियो का बनाना और अकेले ने बैठ कर मछलियो को खिलाना । यह काम अब उनकी सहेलिया करती हैं ।' 'दासिया, बाई जी ?' 'वह उनको दासिया नही कहती । सहेलिया कहती हैं ।' 'वह बड़ी नेक हैं, बाई जी । अब तो उन्होने पर्दा छोड़ दिया है मैने भी दर्शन किये हैं । न मालूम पहाड़ो और नदियो के घूमने में उनको क्या मज़ा आता है ।' 'मुझसे भी घोड़े की सवारी के लिये कहा था ।' 'सचमुच ? आपने सीखी ?' 'पहने तो बहुत डर लगा, पर अब थोड़ा थोड़ा सीख गई हूँ । उनकी सहेली मुन्दर बड़ी अच्छी सवार है । वही सब औरतों को सिखलाती है ।' 'क्या औरतो को हथियार चलाना भी सिखलाया जाता है ?'