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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई २०३ 'हुजूर' मोतीबाई बोली, 'आदत पड गई थी। अब भी बिल्कुल नही छूटी है। गुजर के लिये पर्दे को कम कर दिया है लेकिन बिलकुल तो न छोड सकूँगी। बहुत लोगो ने अङ्गरेज सरकार की नौकरी करली है। मुझे तो कोई नौकरी मिल नही सकती, इसलिये गाने बजाने से पेट भरना तै कर लिया है। आप सरीखे कुछ रईसो को खुश करना ही मेरी गुजर के लिये काफी होगा।' नवाब ने सोचा मोतीबाई शोख हो गई है उसकी वह शोखी उनको भली मालूम हुई। मोतीबाई ने लगभग एक घन्टा गाया नाचा परन्तु इसके बाद न तो नवाब साहब का मन लगा और न मोतीबाई का। नवाब साहब ने कहा, 'ज़रा सुस्ता लीजिये। फिर देखा जायगा। तब तक बात करें। पीरअली पान लाना।' पीरअली ने पान दिये। नवाब ने पूछा, 'कभी आप महलो में जाती हैं? काम ही क्या पडता होगा।' 'जाती हूँ,' मोतीबाई ने उत्तर दिया, 'रानी साहब भजन सुनती हैं। उनको मीरा के भजन बहुत पसन्द हैं। रोज़ तो नही जाती हूँ। कभी कभी सुना आती हूँ। वहा थोडा बहुत मिल जाता है।' 'रानी साहब की पैन्शन में से बहुत लोगो को सहारा मिलता है इसलिये बिचारी को मुश्किल का सामना करना पडता होगा।' 'ज़रूर, मगर वे बहुत उदार हैं। उनका निजी खर्च तो बहुत कम है। दान पुण्य में बहुत दे डालती हैं।' 'बहुत नेक हैं। और फिर इधर उधर के आने जाने वाले नाते रिश्ते के लोग पुराने मुलाजिम लगे हैं उनको भी कुछ न कुछ देना ही पडता होगा।' मोतीबाई की एक आंख के कोने पर सजगता आई। दरवाजे से सटा हुआ पीरअली कान खडे करके सुनने लगा।