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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 213

२०२ झांसी की रानी 'और मैं भी यही सोचकर आई हूं। अब पर्दे में गुजर नहीं हो सकती खुले आम तो नाचना गाना मुझसे न होगा, चाहे भूखे भले ही मर जाऊँ। मगर नवाब साहब सरीखे बड़े आदमियो को सुना आने में मुझको कोई उज्ज्र न होगा।' 'नवाब साहब भी यही फरमाते थे। वह महफिल नहीं जोड़ेंगे।' 'आप भी सुना करिये।' 'मैं तो फर्ज और शौक दोनो के लिये मौजूद रहूँगा। उस्ताद मुग़लखां के धुरपद से जब जी भर जाये, तब आपका ख्याल और नाटक के गीत ही मौज पैदा कर सकते हैं। सच पूछिये तो न दिन भर का समय हो और न मुग़लखां साहब को सुना जा सके।' 'तो मैं कितने बजे आऊ ?' 'मेरे ख्याल में शाम का वक्त अच्छा रहेगा।' 'जी हां। लेकिन मैं आठ बजे चली आऊगी।' 'हा ठीक है। दो घंटे क्या कम हैं।' मोतीबाई समय नियुक्त करके चली गई। पीरअली ने सोचा, 'उमर कुछ बढ गई है मगर अब भी झूमती फुलवारियो सा मतमाता योवन है।' पीर अली ने नवाब साहब को सूचना दी। सन्ध्या के छः बजे मोतीबाई आगई। पर्दे की आड टूट गई। प्रारम्भ में जरा शरमाते शरमाते। अलीबहादुर ने सोचा स्वाभाविक है। उनको आश्चर्य यही था कि रंगमञ्च पर बिना किसी शील संकोच के नृत्य गान करने और हाव भाव दिखलाने वाली अभिनेत्री इतने दिनो और ऐसा पर्दे का ढोग क्यो किये रही। नवाब ने रसीलेपन से कहा, 'मैंने रंगशाला में आपकी कला का कमाल देखा है। समझ में नहीं आता था कि इतना नाज संकोच और पर्दा मेरे घर आकर भी आप क्यों करती रही हैं।'