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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई २०१ 'कर्नल साहब के यहा वह टोपी या टोपे क्या किया करता था ?' 'कर्नल साहब की हवेली के नजदीक नाटकशाला वाली जूही रहती है। मुझको मालूम होता है कि उस टोपे के लिये वह चुम्बक है।' 'हो सकता है। और इसीलिये शायद वह कर्नल साहब के यहा ठहरता है। मगर जवाहरसिंह का और इस टोपे का रघुनाथसिंह की भीतरी बैठक में देर तक बातचीत करना, किस मतलब से हुआ होगा ? खुदाबख्श कहां है ?' 'वह तो मोतीबाई के पीछे दीवाने हो रहे हैं।' 'मोतीबाई रानी साहब के पास कभी जाती है ?' 'जी हा, कभी कभी।' 'उससे काम नही निकाला जा सकता ?' 'कोशिश करूंगा।' नवाब साहब सोचने लगे, 'मोतीबाई को मेरे पास लिवा लाओ। गाने के बहाने से।' पीरअली—'लेकिन वह कही भी नही गाती। बहुत कम बाहर निकलती है।' नवाब—'मेरे यहा गायगी। लेकिन खुदाबख्श को खबर न हो। खुदाबख्श से बाद में बातचीत की जावेगी।' पीरअली अपने घर गया। देखा तो मोतीबाई मौजूद। पीरअली ने सोचा बहुत अच्छा शकुन हुआ। आवभगत के बाद उसने मोतीबाई से बातचीत की। 'मैं तो आपके यहाँ आने वाला था,' प्रसन्न होकर पीरअली ने कहा। मोतीबाई ने मधुर मुस्कान के फूल बरसाये। साडी का घूंघट खीचा। गर्दन मोडी। बोली, 'मै खुद आगई। आप किस लिये कष्ट कर रहे थे ?' 'नवाब साहब को गाने का शौक हुआ है। कहा अकेले में सुन लूंगा। महफ़िल न होगी।'