भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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२०० झाँसी की रानी

गर्ड । दूल्हा घोडे पर चढा था । यह अगरेजो के नये हिन्दुस्थानी तरीके के खिलाफ था । उसने दूल्हा को घोडे पर से उतरने की आज्ञा दी । बारात वालो ने प्रतिवाद किया । उसने एक नही सुनी । आखें लाल- पीली थी । दूल्हा के पिता ने विनय की, 'हमारे यहा राजा तक दूल्हा का मान रखता है ।' 'चुप' गार्डन ने धमकाया । दूल्हा को घोडे पर से उतरना पडा । नवाब अलीबहादुर गार्डन और स्कीन के पास आया-जाया करते थे । परन्तु गार्डन के पास बहुधा । पैन्शन बढने की आशा अभी जीर्ण नही हुई थी । उनको इधर-उधर की खबर पीरअली दिया करता था । वे इन खवरो को गार्डन के पास पहुँचा देते थे । पीरअली ने दीवान जवाहरसिंह के आने का समाचार नवाब साहब को दिया । परन्तु वह और तात्या जब चले गये तब । नवाब ने कहा, 'कुछ दाल में काला है । जवाहरसिंह कटीली वाले राजा की फौज के एक बडे अफसर रहे हैं । विठूर से उस आदमी का इन्ही दिनो आना इल्लत से खाली नही है । क्या है । क्या कर्नल जमाखा भी इन लोगो से मिले ?' पीरअली ने उत्तर दिया, 'कह नही सकता । अनुमान करता हू कि जरूर मिले होगे । कर्नल साहब की हवेली में ही तो वह बिहूर-वाला ठहरा था । उसको टोपे कहते हैं ।' 'इन लोगो में क्या बात चीत हुई या किस प्रसंग की चर्चा हुई यह जानने की जरूरत है ।' मैने जानने की कोशिश की । लेकिन वे लोग दीवान रघुनाथसिंह के वहा ऐसी जगह बैठे थे कि वहा से सुनाई नहीं पड सकता था ।' 'ये लोग रानी साहब के पास भी गये ।' 'जी हां गये । और हँसते खुश होते हुये लौटे ।'