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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई १६६ [ ३६ ] रानी को झासी की लगभग सब घटनाएँ, समय समय पर, विदित होती रहती थी। स्मरण-शक्ति उनकी, इतनी विशाल थी कि लोगो को आश्चर्य होता था। बख्शिशअली वाली घटना का वर्णन उन्होने सुना और आनन्दराय वाली का भी। यद्यपि दाढी वाली घटना-जेल दरोगा की मारपीट वाली घटना के मुकाबले में कुछ नही थी, तो भी रानी को उन घटनाओ का मूल तत्व समझने में देर नही लगी। जिस स्रोत से गार्डन और स्कीन को प्रेरणा मिली थी वह मूल मे एक ही था – हेकड़ी, अवहेलना, उपेक्षा। रानी का प्रशस्त गौर ललाट लाल हो गया। एक आह खींचकर रह गई। ‘पेट के लिये इन लोगो को यह सब सहन करना पड रहा है,’ रानी ने सोचा। इस तरह की अनेक घटनाएँ जब तब होती रहती थी। अङ्ग्रेज लोग शासन को धाक (Bluff) की पुख्ता नीव पर खडा करते चले जाते थे। धाक रोब का रूप पकडती चली जा रही थी। यही रोब हिन्दुस्थानियो के मन में अङ्ग्रेजो के ‘इकबाल’ की सूरत में उत्पन्न होने को था। परन्तु यह धाक या इकबाल हिन्दू-मुसलमानो के हृदय पर वह अधिकार नही कर पा रहे थे जो साधू और फकीर ने जमाने से कर रक्खा था। रानी इस प्रकार की सब घटनाओ को ध्यान और विविध भावों से सुनती रहती थी। गार्डन भी शहर और अपने जिले का हाल लगन के साथ टटोला करता था, परन्तु अहमन्यता और स्वार्थ के कारण वह सही स्थिति नही समझ सकता था। और न अधिकांश अङ्ग्रेज। एक दिन गार्डन घोडे पर सवार शहर की कोतवाली* के निरीक्षण के लिये आ रहा था। एक साधारण हिन्दू गृहस्थ की बरात सामने पड *यह अब पुरानी कोतवाली कहलाती है।