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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई १६७ अच्छा खाना दो। मैंने वैसा-ही किया। उस पर पहरा रक्खा। फिर भी रात को वह मौका निकालकर भाग गया।' 'बेवकूफ, गधे, नालायक', स्कीन पागल सा होकर बोला, 'हमने यह हुकुम दिया था ?' और तड़ाक से बख्शिशअली को चढ़े जूते की ठोल दी। वह गिर पडा। वैसी हालत में भी स्कीन ने उसको कई ठोकरे और लगाईं। तब कही उसका क्रोध शान्त हुआ। गार्डन ने कहा, 'बख्शिशअली, गनीमत समझो कि कि तुमको साहब बहादुर ने इतने से ही छोड़ दिया। तुमको हम बरखास्त करना चाहते हैं।' बख्शिशअली रोने लगा। स्कीन ने इशारा किया। बख्शिशअली ने नही देखा। गार्डन बोला, 'अच्छा तुमको बरखास्त नही करता हू, मगर उस पहरे वाले को बरखास्त किया जावेगा, जिसके पहरे मे से कैदी छूटकर भागा है।' वह सिपाही बरखास्त कर दिया गया। बख्शिशअली का अपमान पहरेदारो और कैदियो के सामने हुआ था। मारपीट से ज्यादा वह घोर अपमान उसको खला। सीधा घर गया और बहुत रोया। बीबी-बच्चे भी रोये। बख्शिशअली ने कहा, 'जी चाहता है कि तलवार से तुम सबको कतरकर डाल दूँ और गोली मारकर मै भी मर जाऊँ। राजा गंगाधरराव ने या रानी लक्ष्मीबाई ने कभी तू-तड़ाक तक नही किया। आज इन गोरो ने मेरे बुजुर्गो की इज्जत खाक में मिला दी।' बीबी ने रो-रोकर समझाया। मुश्किल से अपने अपमान और क्षोभ को पीकर, बख्शिशअली ने वह दिन भूखो काटा। 'कैसे मुँह दिखलाऊँगा ?' वह बार बार कहता था, 'कहा तो मै आठो फाटको का कोटपाल था और कहा आज यह हालत हुई !' बारबार मन में आत्मघात की, बीबी-बच्चो को मार डालने की प्रतिक्रिया मन मे