झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंझाँसी की रानी १६५ 'हमारे तुरखो की मातहती में पाच पाच हज़ार सिपाहियो ने काम किया है । सेनापतियो के घराने के होकर हवलदारी, सूबेदारी करेंगे ?' 'ओ: जनरल बनना चाहता था ?' 'क्यो, जन्डैल बनना कोई बडी बात है ?' 'डाकू से जनरल ! हिन्दुस्थान में सब अजीब ही अजीब होता है । जनरल से डाकू हो जाता है तब डाकू से जनरली की तरक्की मामूली बात है । तुमको मालूम है सागरसिंह... ' 'कुँवर कहिये—मुझको अकेले नाम से कोई नही पुकारता ।' 'अच्छा कुँवर सागरसिंह, तुमको मालूम है कि इसी जेलखाने में फासीघर है और मुझको फासी देने का अधिकार है । और तुम्हारे जो कारनामे सुने गये हैं, वे साबित भी होगे और साबित होने पर तुमको फासी की सज़ा दी जावेगी । मैं कल-परसो में तुम्हारा मुकद्दमा करके उसी दिन फांसी दे दूँगा ।' 'मुझ अकेले कुँवर सागरसिंह को !' 'तुम्हारे साथ और कौन कौन हैं ?' 'बहुत से हैं ।' 'नाम बतलाओगे ?' 'क्यो बतलाऊँ ? क्या पडी है ? मुझको कोई फायदा हो, तो नाम बतला दूँगा ।' 'फायदा होगा । यदि सच सच कहोगे, तो सरकारी गवाह बना लिये जाओगे और छोड़ दिये जाओगे ।' 'बतलाऊँगा, परन्तु इन हथकडियो और बेडियो के बोझ के मारे और भूखो-प्यासो अकल बिगड गई है । आज ज़रा आराम मिल जाय तो कल अवश्य बतला दूँगा, पर अपने वचन पर पक्के रहना ।' 'हा' स्कीन ने जेल-दरोगा को सागरसिंह का बोझ हलका करने की आज्ञा दी और अच्छे भोजन की व्यवस्था के लिये भी कह दिया ।