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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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१६४ झाँसी की रानी गार्डन के चेहरे पर सन्तोष की मुस्कराहट आगई । बोला, 'अब ठीक है । जाओ ।' उसी समय झाँसी से एक हरकारा कमिश्नर स्क्रीन की चिट्ठी लेकर आया । स्क्रीन ने उसको समाचार दिया था कि सागरसिंह नामक डाकू पकड़ा गया है, जेल में बन्द है । जेल का निरीक्षण करना चाहता हूँ । एक दिन के लिये जल्दी आजाओ । गार्डन ने घोड़ा गाड़ी से झांसी की ओर कूच कर दिया । मार्ग में घोड़े बदलता हुआ दूसरे दिन झाँसी पहुँच गया । उसके दूसरे दिन जेल का मुआइना हुआ । स्कीन और गार्डन साथ थे । बख्शिशअली जेल का दरोगा था बड़े विनम्र भाव से सलामें झुकाता हुआ, उन दोनों के सामने आया । दोनों प्रसन्न हुये । उनको इस प्रकार का शाही अदब कायदा पसन्द था । जेल के भीतर जाकर सागरसिंह को देखा । तगड़ा फुर्तीला आदमी था । आंख तीक्ष्ण और चमकदार, दाढी कानो पर चढी हुई; हथकडी बेडी से जकडा हुआ । स्क्रीन ने पूछा, 'क्या नाम है ?' 'क्या आपको मालूम नहीं ?' 'तुम्हारे मुँह से सुनना चाहता हूँ ।' 'कुँवर सागरसिंह ।' 'कहाँ के रहने वाले हो ?' 'रावली के-बरुआसागर से कुछ दूर ।' 'तुमने यह पेशा क्यों अपनाया ?' 'क्योंकि इससे बढ़िया कुछ और मिला नहीं ।' 'हमारी फौज में नौकरी क्यों नहीं की ? अच्छा वेतन मिलता ।' 'हमारे घराने में अफसरी होती आई है । हम कोरी सिपाहीगीरी कैसे करते ?' 'तुम धीरे धीरे नायक, हवलदार और फिर सूबेदार तक हो सकते थे ।'

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