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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई १६३ [ ३८ ] ब्रिटिश सरकार के शासन की गति-विधि में अफ़सरो का ज़िले भर में दौरा करने, प्रत्येक दफ्तर के काम को बारीकी के साथ देखने भालने, थानो, तहसीलो और जेलखानो का निरीक्षण करने का महत्वपूर्ण स्थान था। ग्राम पञ्चायतो का स्थान अङ्गरेजी अदालते दौरे के साधन द्वारा आसानी के साथ ले सकती थी। इसके सिवाय दौरे का जीवन शिकार देता था, नवीन नवीन प्राकृतिक दृश्यो के दर्शन कराता था और सम्पूर्ण देहात को सम्पर्क में इन लोगो के लाता था। शासन की जडें मजबूत बनती थी। गार्डन दौरा करता हुआ मऊ गया। निरीक्षण के लिये थाने पर पहुचा। नायब थानेदार आनन्दराय रियासती पगडी बांधे, लम्बी दाढी, बीच में से कंधी कर, कानो पर चढाये इन्सपेक्टर और थानेदार सहित स्वागत के लिये आगे बढा। आनन्दराय की वह दाढी गार्डन को खटक गई। उसी समय अपनी आलोचना और आज्ञा प्रकट करना चाहता था, परन्तु ठहर गया। निरीक्षण करने के बाद उसने आनन्दराय को बुलाया। बोला, 'तुम डाकुओ की सी दाढी क्यो रक्खे हो?' आनन्दराय कोई उत्तर नही दे सका। गार्डन ने कहा, 'इस थाने का तेरा कोई अफसर इस तरह की दाढी नही रचाता। क्या अपने को इनसे वडा समझता है?' आनन्दराय का कलेजा जल उठा, परन्तु मुँह से निकला, 'नही तो।' 'बातचीत करने का भी तमीज नही,' गार्डन ने कहा। आनन्दराय ने सिर नीचा कर लिया। गार्डन ने हुकुम दिया, 'दाढी रखनी ही है तो सीधी रख। कानो पर कभी मत चढा। जा सीधी करके आ।' आनन्दराय गया और दाढी को कानो पर से उतार कर सीधी करके आगया। चेहरा बिलकुल पीला पड गया।