भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 203

१६२ झाँसी की रानी तात्या बोला, 'मैने इनसे कहा है कि ऐसी कोशिश करो कि कोई नातेदार डाका न डाले । ये कहते हैं कि वडी मुश्किल पडेगी । मैंने कहा कि डाके डालने ही हैं तो खजानो पर डालो और थाने लूटो ।' रानी ने निवारण करते हुये कहा, 'नही तात्या, यह उचित नही अनाचार और अत्याचार को प्रोत्साहन एक बार मिला, कि वह बार बार सिर उठाता है । जब स्वराज्य का युद्ध शुरू होगा तब खजाने और थाने सब अपने अधिकार में किये जावेगे । अभी नही ।' जवाहरसिंह और रघुनाथसिंह ने हामी भरी । तात्या बोला, 'अभी तो गार्डन अपना प्रबन्ध पक्का किये जा रहा है । समझता होगा कि जनता को अपनाते चले जा रहे हैं ।' रानी ने कहा, 'जनता मूर्ख नही है ।' तात्या, दीवान जवाहरसिंह और दीवान रघुनाथसिह प्रणाम करके चले गये । रानी ने अपनी सहेलियो से पूछा, 'बतलाओ, इन दोनो मे से, झाँसी की स्वराज्य-सेना का प्रधान सेनानायक बनाने योग्य कौन है ?' मुन्दर—'दीवान रघुनाथसिंह ।' सुन्दर—'मै भी ऐसा ही सोचती हूँ ।' काशीबाई—'जवाहरसिंह ।' फिर वे तीनो रानी का मुँह ताकने लगी । मुन्दर बोली, 'हम दोनो की बात सही निकलेगी ।' सुन्दर ने कहा, 'बाईसाहब देखे क्या कहती हैं ।' काशीबाई हँसकर बोली, 'वे अभी बतला देवेगी ।' रानी ने कहा, 'समय बतलावेगा ।'