झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई १६१ जवाहरसिंह ने कहा, 'माता का यह आशीर्वाद और वह पवित्र गगाजल सदा हमारे साथ रहेगा।' रघुनाथसिंह बोला, 'मा आज न जाने क्यो ऐसा भास रहा है मानो हम लोग अनेक युद्धो पर विजय प्राप्त कर चुके हो।' रानी ने कहा, 'मुझको सन्देह नही है, युद्धो पर विजय प्राप्त करोगे।' रघुनाथसिंह ज़रा मचलते हुये बोला, 'माता हमको आशीर्वाद तो मिल गया, अव प्रसाद और मिलना चाहिये।' रानी ने तुरन्त मुन्दर से कहा, 'लड्डू ला मुन्दर। मैने अपने हाथो आज ही बनाये हैं।' मुन्दर थाल भर लड्डू ले आई। 'नही सरकार, इतने नही,' जवाहरसिंह हँसकर बोला, 'हम लोग भोजन कर आये हैं।' रानी उठी। दोनो हाथो में एक एक लड्डू लिया। 'अपने हाथ के बनाये लड्डू अपने ही हाथो खिलाऊँगी। तात्या तुम भी खाओ।' रानी ने कहा। उन लोगो ने मुँह खोले। रानी ने आग्रह के साथ खिलाया। बचे हुये लड्डू उन तीनो सहेलियो को खिला दिये। हाथ-मुँह धोकर वे सब बैठ गये। रानी ने कहा, 'आप लोग अभी केवल इतना करे—नातेदारियो में अपना मेल वढायें और उनको अपनावें। सबके काम में पडें और छोटी से छोटी जाति के पुरुष या स्त्री का, गरीव से गरीव, मजदूर या किसान को, कदापि छोटा न समझे। सब जातियो और सब वर्गों को, बिना अपना उद्देश्य बतलाये, हथियार चलाना सिखलाएँ। इस काम के लिये काफी अवसर मिल सकते हैं, जैसे शिकार, उत्सव, ब्याह-बारात इत्यादि। जवाहरसिंह ने कहा, 'बहुत अच्छा।' रघुनाथसिंह ने कहा, 'ऐसा ही होगा।'