झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० झाँसी की रानी रघुनाथसिंह—'और अपनी माता का आशीर्वाद प्राप्त करना है।' रानी मुस्कराई । बोली, 'आप लोगो को मै अच्छी तरह जानती हू । आप लोग सहज ही प्राणो की होड लगा सकते हैं। परन्तु मै चाहती हूँ कि प्राणो को सहज ही न खोया जाय। अवसर आने पर ही तलवार म्यान से वाहर निकले। छोटी छोटी सी वात पर न खिंच जावे।' तात्या—'इन लोगो को लाट की आज्ञा पर बहुत क्षोभ हुआ । और ये तुरन्त कुछ जवाव देना चाहते थे।' रानी—'अङ्गरेजो के अन्याय बढते जावे तो अच्छा ही है। फिर भगवान हमारी जल्दी सुनेंगे । असल में अभी इन छोटी बातो पर खीझ कसर का निकालना, अच्छा नही है।' उन दोनो ठाकुरो ने स्वीकार किया । फिर उन दोनो ने अपनी चमचमाती हुई तलवारे, रानी के पैरो के पास रखदी और हाथ जोडकर खडे हो गये । रानी ने मुन्दर से कहा, 'गगाजल ला ।' मुन्दर गंगाजल ले आई । रानी ने पहले जवाहरसिंह की तलवार पर छींटे दिये और फिर रघुनाथसिंह की तलवार पर । उन दोनो ने रानी के चरण स्पर्श करके तलवारें म्यान में डाल ली । रानी पुलकित हुई । एक क्षण में अपने को सयत करके बोली, गगाजल की पवित्रता को निभाना । आपस की कलह में इसका प्रयोग मत करना और न किसी कलुषित काम में ।' उन दोनो ने मस्तक नवाये । रघुनाथसिंह ने कहा, 'सरकार अब आशीर्वाद मिलना चाहिये ।' रानी का गला भर आने को हुआ । उन्होने नियन्त्रण कर लिया । बोली, 'तुम्हारे हाथो स्वराज्य के आदर्श का पालन हो । सुखी रहो और अपने पीछे ऐसा नाम छोड जाओ कि आने वाली अन त पीढिया. तुम्हारे स्मरण से अपने को शुद्ध करती रहे ।'