भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 200

लक्ष्मीबाइ १८६ [ ३७ ] रानी के पास आठ बजे के लगभग तात्या, रघुनाथसिंह और जवाहरसिंह आये । रघुनाथसिंह पुष्ट देहका बडा बलशाली पुरुष था । जवाहरसिंह जरा छरहरे शरीर का परन्तु काफी बलवान । प्रणाम करके तीनो बैठ गये । रानी ने पूछा, 'दीवान जवाहरसिंह को क्या कटीली से ले आये तात्या ?' हाथ जोडकर जवाहरसिंह ने उत्तर दिया, 'दीवान रघुनाथसिंह का एक साडिनी सवार लिवा लाया । उसने प्रात काल के बहुत पहले ही सोते से जगाया था ।' तात्या ने कहा, 'मै स्वय नही गया । दीवान साहब से प्रार्थना की और इन्होने तुरन्त रात को ही, साडिनी-सवार भेज दिया । घुडसवार जाता तो दीवान साहब को भी घोडे पर ही आना पडता । शायद कोई सन्देह करता, इसलिये ऊँट भेजा ।' जवाहरसिंह बोला, 'श्रीमन्त सरकार, मुझे किसी का भी डर नही है । उस दिन के लिये तरस रहा हूँ, जब झाँसी और अपने स्वामी के लिये अपना शरीर त्याग दू ।' रघुनाथसिंह झूमने लगा । रानी ने मुस्कराकर कहा, 'आप ही लोगो का बल-भरोसा है । एक दिन आवेगा जब आप लोगो के जौहर का उपयोग होगा । तात्या ने कुछ बतलाया होगा ?' रघुनाथसिंह—'बतलाया है सरकार । थोडे में समझ लिया । हम लोगो को ज्यादा सुनने समझने की दरकार ही नही है । अपनी माता के दर्शन करने थे, इसलिये चले आये ।' जवाहरसिंह—'हम लोगो को सरकार के हाथो अपनी तलवार पर गगाजल छिटकवाना है ।'