झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
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१८८ झांसी की रानी तात्या बोला, 'बाईसाहब, अब आपके शयन का समय आने को है—भोजन तो अभी हुआ ही नही है । जाता हूँ । यहा एकाध दिन रह कर चला जाऊँगा । शीघ्र ही फिर सेवा में उपस्थित होऊँगा अर्थात् जैसे ही कोई महत्व की बात सामने आई, मैं आऊँगा ।' रानी—'भोजन अब मै नही करूँगी । केवल दूध पिऊँगी नही तो कल के कार्य क्रम का व्यतिक्रम हो जावेगा । तुम दीवान रघुनाथसिंह और दीवान जवाहरसिंह से मिले हो ?' तात्या—'पिछली बार आया तब मिला था । अबकी बार नही मिल पाया हू ।' रानी—'उनसे मिलना । रघुनाथसिंह नई बस्ती में गनपत खिडकी बाहर रहते हैं और जवाहरसिंह कटीली गाव में होगे ।' तात्या—'मै इनसे मिलूँगा ।' तात्या चला गया ।