भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई १८७

तात्या ने उत्तर दिया, 'नही वाईसाहब । उसने मुझसे स्पष्ट कहा ।' रानी—'समाज ने उसको कैसे ग्रहण किया होगा ?' तात्या—'वह समाज से बाहर है । मूंछ मुडाये, वैरागी वेश में रहता है । साथ में वह स्त्री रहती है ।' रानी—'उसको क्या काम दिया ?' तात्या—'सेना के साथ सम्पर्क रखने का काम । नारायण शास्त्री । ज्योतिष जानता है और कविताये गाता है । उनके प्रयोग से वह सेना । के सम्पर्क में रहेगा ।' 'रानी—'सेना के साथ घनिष्ठ सम्पर्क उत्पन्न करने को बहुत महत्व देना होगा ।' तात्या—'दे रहा हूँ ।' रानी—'तुमको, जान पडता है अकेले ही बहुत काम करना पडता है ।' तात्या—'नही वाईसाहब, नाना साहब, राव साहब इत्यादि बहुत लोग काम में जुटे हुये हैं । दिल्ली और मेरठ इत्यादि प्रदेशो के अनेक मुसलमान भी प्राणो की होड लगा कर निरत हैं ।' रानी—'मुझको ऐसा लगता है कि शीघ्र ही कुछ न हो बैठे परन्तु मैं सोचती हूँ कि अधकचरी तैयारी मे कुछ भी न किया जाना चाहिये । बहुत दिन हुये, मदरास की ओर कुछ सिपाहियो ने अचानक उपद्रव कर डाला था वह व्यर्थ गया । फल यह हुआ कि मदरासी अब सेना में कम भर्ती किये जाते हैं। और अग्रेजो ने अपनी सावधानी को कसकर बढा लिया है ।' तात्या—'कैसी भी सावधानी, कुटिलता और बुद्धि से अङ्गरेज लोग काम लें, हमारी विशाल, असख्य जनता, उनका राज्य नही चाहती । इसलिये राजाओ और नवावो का साथ न पाते हुये भी हमको अपने उत्साह में कमी प्रतीत नही होती ।' रानी ने मुस्कराकर कहा, 'मैं जानती हूँ ।'