झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८६ झांसी की रानी रानी— मैं सिक्खो की लडाइयो के नकशो का अध्ययन करना चाहती हू ।' तात्या ने कागज़ो पर मानचित्र बनाकर समझाया । रानी ने और उनकी सहेलियो ने भी समझा । तात्या ने अनुरोध किया, 'हमको एक अपने विश्वसनीय जासूसी विभाग की वडी आवश्यकता है ।' रानी ने मुस्कराकर कहा, 'मैने स्थापना कर दी है ।' तात्या ने उत्सुक होकर पूछा, 'कैसे ? कहाँ ?' रानी ने उत्तर दिया, 'यही । मेरी ये तीनो सहेलियां काम सीख रही हैं और कर रही हैं । मे और स्त्रियो को भी तैयार कर रही हू, परन्तु काम सावधानी का है, इसलिये धीरे-धीरे कर रही हू ।' तात्या प्रसन्न हुआ । बोला, 'झांसी में एक विलक्षण बात देखी । जो यहा निवास करता है वह तो आपका भक्त है ही, किन्तु यहा का निवासी जो बाहर चला गया है, वह भी झांसी के लिये अपना तन मन वलिदान करने के लिये प्रस्तुत है ।' रानी बोली, 'मुझको इसी लिये झांसी का बहुत अभिमान है ।' तात्या ने कहा, 'बाईसाहब, जब मे ग्वालियर राज्य का हाल लेता हुआ हाल में दक्षिण की ओर गया, तब वहा बाजार में एक फटियल ब्राह्मण मिला । उसने मुझको पहिचान लिया । मैने भी उसको चीन्ह लिया । वह झांसी का रहने वाला नारायण शास्त्री निकला । उसको स्वर्गीय सरकार ने, एक अपराध में देश निकाले की सजा दी थी...।' रानी बोली, 'मैंने उस अपराध के विषय में सुना है ।' तात्या ने कहा, 'नारायण शास्त्री आश्वासन देता था कि जो कुछ भी कार्य भार उसको दिया जायगा, वह प्राणपण से करेगा ।' रानी ने पूछा, 'वह जिस स्त्री को लेकर यहा से गया था, क्या उसको त्याग दिया ?'