झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८२ झाँसी की रानी
पहुँचा। वे तीनों सहेलियां उनके साथ थी। अबकी बार तात्या ने जो रानी को देखा, तो बहुत सतेज पाया। कुशल वार्ता के बाद बातचीत हुई। 'अबकी बार राजस्थान, पन्जाब इत्यादि भी घूमे ?' रानी ने पूछा। तात्या ने उत्तर दिया, 'अब की बार बहुत घूमा हू और एकाध जगह तो पकडे जाने की ही नौबत आगई।' वे सब सतर्क होकर सुनने लगी। तात्या कहता गया, 'मै अपना हाल राजपूताने से आरम्भ करता हू। बडे बड़े राज्य जैसे जयपुर, जोधपुर, बीकानेर इत्यादि किसी विशेष पक्ष में नही। तटस्थ से हैं परन्तु सब कहते हैं कि झाँसी के साथ अङ्गरेज़ो ने बेईमानी की। हम लोगो के प्रति उनका भाव उदासीन है। इसके लिये हमारा उनका, दोनो में से किसी का भी दोष नही है। हम लोग एकत्र स्वराज्य स्थापित करना चाहते थे और वे लोग अपनी अपनी अलग स्वतन्त्रता की धुन में थे। राजपूताने में एकाध ठिकाना ऐसा भी है जो महाराष्ट्र नाम से ही अप्रसन्न है, परन्तु हिन्दुस्थान की स्वाधीनता के लिये उपयुक्त अवसर आने पर अपना सर्वस्व होमने के लिये तैयार हैं। लेकिन वहाँ के अधिकांश राजा अपने को, अङ्गरेजो की सहायता के कारण ही, निरापद समझते हैं, इसलिये न अपने जागीरदारो की परवाह करते हैं, और न प्रजा की। जैसा ढर्रा चला आया है, मजे में उसको चालू रखने के पक्षपाती हैं। अच्छे नेतृत्व की हीनता में जनता जीवन के साधारण उद्देश्यो में ही लिप्त है। ऐसी अवस्था में वहा से कोई आशा नही करना चाहिये। परन्तु यह विश्वास है कि वहा की सेना अपनी सेना का साथ देगी। पन्जाब का हाल कम आशाजनक है। रणजीतसिंह का पञ्जाब, अङ्गरेजी इलाके और पाच रियासतो में विभक्त हो गया है। इन रियासतो के राजा, हाथ आई रोटी को किसी प्रकार भी फेकने को तैयार नही। जनता नेता-विहीन है, इसलिये विवश सी है। दिल्ली का बादशाह बहादुरशाह वृद्ध है। परन्तु उसकी बेगम तेजस्वी है। मुसलमान लोग