भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई १८१ का शौक हुआ । झासी के आसपास पहाडिया हैं ही, उस समय जंगल और विषम स्थल भी थे । रानी तेजी के साथ सहेलियो सहित इन पर आश्वारोहण करती । झासी के आसपास की भूमि का उनको राई-रत्ती परिचय प्राप्त हो गया । इस भौगोलिक परिचय के क्षेत्र को वे निरन्तर, अनवरत बढ़ाती रहती थी । जो स्त्री-पुरुष उनके पास भेंट के लिये आते उन सबसे कहती— ‘शरीर को इतना कमाओ कि फौलाद हो जावे, तभी मन दृढता पूर्वक भगवान की ओर जायगा ।’ उनका कसरतो का शौक शीघ्र विख्यात हो गया । अमीरखाँ, वज़ीरखा दो नामी उस्ताद उनको मिले । बाला गुरु भी बिठूर से आये और मल्लविद्या के सूक्ष्मतम दाव-पेच बतला कर चले गये । नरसिंहराव टौरिया के नीचे दक्षिणियो के मुहल्ले में, वे एक अखाडा जारी कर गये । रानी कुश्ती का अभ्यास अपनी सहेलियो के साथ करती थी । तीर, बन्दूक, छुरी, बिछुआ, रैंकला इत्यादि चलाने में पहले दर्जे की श्रेष्ठता, उन्होने अमीरखा, वजीरखा, के निर्देशन से प्राप्त की—ऐसी और इतनी कि उनकी कुशाग्रबुद्धि, शक्ति और हस्त-कुशलता पर वे दोनो नामी उस्ताद विस्मय में डूब जाते थे । वे जानते थे । कि रानी उद्दण्ड प्रकृति हैं, इसलिये कभी कभी लगता था कि हथियार चलाने या परीक्षा के लिये, ललकार न बैठें । यह उनका भ्रम था । रानी का वाह्य रूप प्रचण्ड तेज पूर्ण था, परन्तु अन्तर बहुत कोमल और उदार । इस प्रकार महीनो पर महीने बीत गये । एक दिन तात्या टोपे आया । रानी की सेना बहुत दिन पहले समाप्त कर दी गई थी, परन्तु सैनिक और उनके नायक, अपने कौशल को न भूले थे । और न उनका स्वाभिमान गारत हुआ था । मुहम्मद जमाखा अपने को कर्नल अब भी कहता था, अठवारे पखवारे रानी को वह प्रणाम कर आया करता था । उसी की हवेली के एक भाग में तात्या पूर्ववत ठहरा । रात के आठ बजे के बाद तात्या रानी के पास