झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८० झांसी की रानी पावे । तभी तो अङ्गरेजी राज्य निर्विघ्न चल सकता था । उन लोगो ने हिन्दू नरेशो और मुसलमान बादशाहो के उत्थान-पतन के इतिहास पढे- गुने थे, इसलिये वे अपने शासन को उन सब गड्ढो से बचाना चाहते थे, जिनमें नरेशो और वादशाहो के सूबेदार और अन्य कर्मचारी मौका पाते ही उसको ढकेल दिया करते थे । समय समय पर गार्डन शहर के बडे आदमियो को मुलाकात के आकर्षण देता रहा । चिरौरी करना तो वे जानते ही थे, इसकी भी करते थे, परन्तु जब वे इसके सामने झुकते थे उनकी रीढ में दर्द हो उठता था और माथे पर बल पड जाते थे । घर आकर लाभ-हानि को आकने के साथ वे साहब की हेकडी पर जलते थे और अपनी चिरौरी पर हँसते थे । रानी को भी समाचार दे आते थे । वे चुपचाप सुन लेती थी और उनके बाल-बच्चो के समाचार विस्तृत ब्योरे के साथ पूछ लेती थी । अन्य कोई बात न कहने का उन्होने अपने मन पर बन्धेज कर रक्खा था । शहर वाले महल के ठीक सामने राजकीय पुस्तकालय था । वह उन्हीके हाथ में था । पुस्तकालय के पीछे एक ढाल था और ढाल के नीचे उनका सुन्दर बडा बाग ।* इस बाग में वह घुडसवारी इत्यादि व्यायाम किया करती थी । नगर की जो स्त्रिया उनके पास आती थी, उनको वह बडी निष्ठा के साथ इसी बाग में कसरते सिखलाती थी । अब तो सुन्दर, मुन्दर और काशीबाई इतना सीख गई थी, कि दूसरो को सिखाने में रानी को इनसे बडी सहायता मिलने लगी । फिर भी रानी सोचती थी कि अश्वारोहण और शस्त्र-चालन में मै सर्वश्रेष्ठ नही हुई हूँ । पुरानी लडाइयो के नकशे उनके महल में थे । वे उनका बारीकी के साथ अध्ययन करती थी । बनावटी लडाइयो के नकशे कागज़ पर बनाती और बिगाडती । अपनी सहेलियो के साथ भिन्न भिन्न प्रकार की अनेक युद्ध-परिस्थितियो पर वाद-विवाद करती । उनको पहाडियो पर अश्वारोहण *यह बाग अब हार्डिगञ्ज हो गया है ।