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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 183

१७२ झांसी की रानी 'पर यह जरूर है कि अपना अपना ही है।' 'अपने को मार खाते थे तो उनसे लड भी जाते थे। इनलोगो से तो कुछ कह भी नहीं सकते।' मुखिया ने मना किया, 'झंझट की बात मत करो। साहब अपनी भाषा खूब समझता है। सुन लेगा तो तुम्हारी और हमारी जान लेलेगा।' मजदूर सन्ध्या के पहले ही काम समाप्त करके अपनी मजदूरी लेकर चले गये। ठीक समय पर अङ्गरेज अफसरों की बैठक हुई। खानपान के साथ ही काम काज की बात जारी रही। एलिस—'मुझको अन्देशा था कि कही झाँसी की जनता हटाये हुये रियासती सिपाहियो को भडका कर, दंगा न करवादे।' डनलप—'हमारी पलटने तैयार थी।' स्कीन—'बन्दोबस्त अच्छा था।' गार्डन—'मैने सुना है कि वे सब रानी के पास गये थे।' एलिस—'स्वाभाविक है।' गार्डन—'परन्तु रानी ने उनको कोई प्रोत्साहन नही दिया। समझदार स्त्री है।' स्कीन—'मुझको उस स्त्री पर अचरज होता है। सुनता हूँ ऐसी घुड सवार है, कि पुरुष दातो तले उँगली दबाते हैं।' गार्डन—'हिन्दुस्थानी कसरते खूबी के साथ करती है।' एलिस—मुझे शका थी कि कही सती होने की कोशिश न करे। मै गंगाधरराव के दाह के समय कप्तान मार्टिन को ससैन्य ले गया था।' गार्डन—'मै उन दिनो यहा न था।' स्कीन—'इस प्रदेश के लोग शान्ति-प्रिय और कानून-भक्त हैं। यहा पहले दो वार सरकारी अमल रह चुका है, इसलिये हमारा शासन पसन्द करते हैं। न मालूम इस रियासत के सडे और गन्दे वातावरण में यहां की जनता कैसे सास लेती रही?'