झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७४ झाँसी की रानी अब बहुत अच्छा सुभीता हो गया है। यहां से लेकर बम्बई तक बेखटके माल आ-जा सकता है। उनको विलायत का माल शहर और देहातो में बेचने से बहुत मुनाफा मिल सकता है। थोड़े दिन में मालामाल हो जावेगे।' एलिस—'आज मैने उनमें से खास खास को बुलवाया है। नवाब अलीबहादुर को इशारा कर दिया था।' स्क्रीन—'मुझको मालूम है। गार्डन ने बतलाया था। उनसे कहना चाहिये कि झाँसी में रेल भी किसी दिन आ जावेगी और महीनो की यात्रा दिनो में हो जाया करेगी। रेल के जरिये वे लोग सहज ही अपने तीर्थों को दर्शन के लिये जा सकते हैं।' एलिस—'कुछ स्कूल खोलना पड़ेंगे।' स्क्रीन—'वह पीछे देखा जायगा। फिलहाल अस्पतालो और अच्छी सड़को की चिन्ता करनी होगी।' गार्डन—'लेकिन मन चाहे सरकारी नौकर, हिन्दुस्थानियो में तभी इस जिले में मिल सकेंगे, जब उन्हे हमारी शिक्षा मिल जाय।' स्क्रीन—'हा कुछ दिनो बाद बाबुओ की जरूरत पड़ेगी।' गार्डन—'परन्तु केवल बाबू वर्ग उत्पन्न करने के लायक शिक्षा देने की नीति को पूरा पूरा स्वीकृत नहीं किया गया है।' स्क्रीन—'हाँ वह बात कलकत्ता, मदरास, आगरा इत्यादि के लिये है। झाँसी सरीखी पिछड़ी हुई जगह और बुन्देलखण्ड़ से वनखण्ड के लिये नही है। यहां तो जो स्कूल खोला जाय, उसे मिडिल से आगे मत ले जाओ। मै नही चाहता कि हिन्दुस्थानी छोकरे, एडमंड बर्क की मदिरा पीकर मतवाले हो जाय। एलिस— तजुर्वा गार्डन को सब सिखला देगा।' सोने की मोटी साकल से ठगी हुई घड़ी को स्क्रीन ने जेब से निकाला। समय देखकर बोला, 'एलिस, तुम्हारे मुलाकाती अभी नही आये हैं। समय हो गया है।'